भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे नानाविध व्यक्ति । नाना नाम तथा वृत्ति । उसमें मैं अभेद-मूर्ति । भेदमें जानते ॥ ५२ ॥ ऐसे भिन्नत्वमें धनुर्धर । करते ज्ञानयज्ञ सुन्दर । बोध न होता नाना प्रकार । जाननेसे ॥ ५३ ॥ या जहां जो कुछ है देखते । मेरे बिन अन्य न जानते । सदा मेरी प्रतीति करते । यह बोध उनका ॥ ५४ ॥ बुल्ले जहां तथा जितने होते । जलके आधारसे ही बनते । फिर रहते या घुल जाते । पानीमें ही ॥ ५५ ॥ मानो आंधीने परमाणु उडाये । वे भूमित्वसे अलग नहीं गये । वे जब पुनः नीचे ही गिर गये । तो पृथ्वी पर ही ॥ ५६ ॥ वैसे कहीं कुछ भी हो जाये । या कहो कुछ भी ना हो जाये । सब ही "मैं" बोध लेते गये । सर्व-भावसे ॥ ५७ ॥ अजी ! जहां जितनी मेरी व्याप्ति । उतनी ही है उनकी प्रतीति । बहुधाकारकी वर्तन स्थिति । बहुरूप उनकी ॥ ५८ ॥ जैसे भानु-बिंब नित्य । सबके सम्मुख दिव्य । वैसे वे विश्वके भव्य । सदा सम्मुख ॥ ५९ ॥ अजी ! उनका वह जो ज्ञान । आगे पीछे न जाने अर्जुन । वायु जैसा सदैव गगन । रहे सर्वत्र ॥ २६० ॥ वैसे जितना हूं मैं संपूर्ण । उतना उनका भाव-पूर्ण । इससे न करते अर्जुन । भजन होता है ॥ ६१ ॥ वैसे मैं हूं सर्वत्र पूर्ण रूपसे । कहां मेरा भजन न होता कैसे । किंतु यहां ऐसा ज्ञान होनेसे । भजन न होता ॥ ६२ ॥ यहां जो उचित रूपसे । भजते हैं ज्ञान-यज्ञसे । कही बात मैंने तुझसे । उनकी पार्थ ॥ ६३ ॥ जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं— यह सब है सतत सबकी ओरसे । अर्पण होता मुझे सहज भावसे । यह नहीं जाननेसे अज्ञानियोंसे । न होता मुझे अर्पण ॥ ६४ ॥ २७१ राज-विद्या-समर्पणयोग