भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ उदय होगा जब ज्ञानका । तब वेद ही "मैं हूँ" इसका । "मैं" ही तज्जन्य-ऋतु होनेका । अनुभव होगा ॥ ६५ ॥ तब यज्ञ जन्य सकल । सांगोपांग कर्म निर्मल । यज्ञ भी "मैं" यह निखिल । होगा बोध पार्थ ॥ ६६ ॥ स्वाहा "मैं" हूँ तथा स्वधा । सोमादि दिव्य विविध । आज्य और "मैं" समिधा । मंत्र औ, हवि भी ॥ ६७ ॥ होता मैं हवन करता । अग्नि स्वरूप मैं रहता । हवन-वस्तु जो जो होता । वह सब मैं हूँ ॥ ६८ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ अजी ! जिसके अंग-संगसे । यहां प्रकृति के अष्टांगसे । जन्म होता विश्वका जिससे । पिता वह मैं हूँ ॥ ६९ ॥ अर्धनारी नटेश्वरी । जो पुरुष वह नारी । वैसा मैं सचराचरीं । माता भी हूँ ॥ २७० ॥ जगत जहांसे होता औ' रहता । जिससे जीवन लेकर बढता । मेरे बिना वह कछु नहीं होता । अन्य धनुर्धर ॥ ७१ ॥ प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको यहां । जनम दिया हमने मनमें जहां । वह पितामह त्रिभुवनमें यहां । मैं हूँ विश्वका ॥ ७२ ॥ जहां ज्ञान-रूप सभी बाट । जिस स्थान आती हैं सुभठ ! उन वेदोंकी वेद्य जो गोष्ठ । कहलाती है ॥ ७३ ॥ मैं ही संकल्प मैं यज्ञ स्वावउंबन अन्न मैं । मंत्र मैं हव्य भी मैं हू अग्नि मैं आहुती तथा ॥ १६ ॥ जगदाधार ही मैं हूं माता पिता पितामह । मैं तीनों वेद ॐकार जानने योग्य पावन ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी २७२