ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे ही अनेक प्रकार । बनाकर मानवाकार । करके ज्ञानपे अंधार । विपरीत ज्ञानसे ॥ ७१ ॥ मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ मैं अंधोंके हाथमें पड़ा मोति-सा हूं- इसीलिए जन्मना ही मोघ । जैसे वर्षाके बिन ही मेघ । अथवा मृगजल तरंग । देखना दूरसे ही ॥ ७२ ॥ या मृत्तिकाके घुड़सवार । या कलंदरके अलंकार । गंधर्व-नगरका आवार । आभास जो ॥ ७३ ॥ जैसे थूहरका बडा सरल । अंदर खोकला ना है फल । लटकते स्तन जैसे गला- । में बकरीके ॥ ७४ ॥ मूर्खका जीवन है व्यर्थ । जैसे सेमल फल पार्थ । धिक् उसके कर्म समस्त । जो हैं निरर्थक ॥ ७५ ॥ फिर मानो है उसका पढना । मर्कटका नारियल तोडना । अथवा अंधेका हाथ पडना । मोति जैसे ॥ ७६ ॥ वास्तवमें उनके शस्त्र । कुम्हारके हाथमें शंख । या कहा अशौचको मंत्र- । बीज किसीने ॥ ७७ ॥ वैसे उसका ज्ञान-जात । औ' आचरण क्रिया पार्थ । वह संपूर्ण गया व्यर्थ । चित्तहीन ॥ ७८ ॥ तमो-गुण राक्षसी । जो है सद्बुद्धि ग्रासी । विवेक-मूल नासी । निशाचरी ॥ ७९ ॥ उस प्रकृतिके आधीन हुये । इसीलिए चिंताका ग्रास भये । इस तामसीके कलेऊ हुये । मुखमें ही ॥ १८० ॥ वे आशावाद मूढोंके व्यर्थ हैं ज्ञान-कर्म भी । जिन्होंने संपदा पायी आसुरी मोह-कारक ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी २६४