भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 333

मुझ आकारशून्यको आकार । औ' निरुपाधिकको उपचार । विधि विवर्जितको व्यवहार । आचारादिक ॥ ५७ ॥ मुझ वर्ण-हीनको वर्ण । तथा गुणातीतको गुण । औ' अ-चरणको चरण । अ-पाणिको पाणी ॥ ५८ ॥ अमर्यादको मान । सर्वगतको स्थान । शय्यापे लेटे जान । देखते हैं ॥ ५९ ॥ वैसे अ-श्रवणको श्रोत्र । मुझ अ-चक्षुको नेत्र । तथा अ-गोत्रको गोत्र । रूप अ-रूपको ॥ १६० ॥ मुझ अव्यक्तको व्यक्ति । तथा अनार्तको आर्ति । सर्व तृप्तिको है तृप्ति । सोचते सब ॥ ६१ ॥ अनावरणको प्रावरण । भूषण-अतीतको भूषण । सकल कारणको कारण । देखते मुझको ॥ ६२ ॥ मुझ सहजको रचते । स्वयंभूको हैं प्रतिष्ठते । निरंतरको आह्वानते । तथा विसर्जते हैं ॥ ६३ ॥ सर्वदा मैं स्वयं-सिद्ध । बाल तरुण और वृद्ध । एक रूपका संबंध । जानते वे मुझे ॥ ६४ ॥ मुझ अद्वयको द्वैत । अकर्ताको माने कर्ता । तथा अभोक्तकों भोक्ता । कह जानते ॥ ६५ ॥ अकुलका करते कुल-वर्णन । नित्यके निधनसे व्याकुल-मन । अंतर्यामिका शत्रु-मित्र अर्जुन । मानते हैं वे ॥ ६६ ॥ मैं हूं सर्वदा स्वानंदाभिराम । मुझे माने सकल-सुखकाम । सर्वत्र व्याप्त हूं संपूर्ण सम । मानतें मुझ स्थानिक ॥ ६७ ॥ आत्मा मैं चराचरमें बसता । कहते एकका पक्ष लेता । दूसरेका शत्रु बन मारता । बढाचढाके गाते यह ॥ ६८ ॥ अजी ! प्रायः ऐसे समस्त । मनुष्य-धर्म जो प्राकृत । लगाते मुझे विपरीत । यही उनका ज्ञान ॥ ६९ ॥ आकार कोई जब देखते । देव भावसे पूजा करते । वह बिगडनेपे कहते । नहीं रहा अब ॥ १७० ॥ २६३ राज-विद्या-समर्पणयोग