भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इसीलिए तू धनंजय । भूलेगा यह अभिप्राय । स्थूल दृष्टिका ज्ञानाशय । होगा व्यर्थ ॥ ४३ ॥ स्थूल-दृष्टिसे मुझे पार्थ । देखना है जान तू व्यर्थ । स्वप्नमें पीनेसे अमृत । न होता अमर ॥ ४४ ॥ वैसे स्थूल-दृष्टि है मूढ । जानते समझके दृढ । वह जानना होता आड । स्वरूप ज्ञानके ॥ ४५ ॥ होनेसे जैसा नक्षत्रका आभास । अपना ही घात कर लेता हंस । नीरमें रत्न-बुद्धिकी कर आस । मारकर चोंच ॥ ४६ ॥ गंगा जान गया मृगजल । उस जानेसे मिला क्या फल । सुरतरु समझ बबूल । लगानेसे क्या होगा ? ॥ ४७ ॥ हार मान नीलमणिका दुहरा । पकड लिया विषैला फणिधर । अथवा रत्न मानकर पत्थर । चुनना जैसे ॥ ४८ ॥ या प्रकट हुआ स्वर्ण-भंडार । कहकर उठा लिया अंगार । कूपमें कूदा छाया देखकर । अपनी सिंह ॥ ४९ ॥ मुझको देहधारी मानकर । निश्चय किया है धनुर्धर । उसने चंद्र समझकर । पकडा प्रतिबिंब ॥ १५० ॥ वैसे कृत-निश्चय गया व्यर्थ । कोयी जैसे मांड पीकर पार्थ । देखने लगा सुपरिणामार्थ । अमृतके मानो ॥ ५१ ॥ वैसे नाशवंत स्थूलाकार । चितमें निश्चय बांधकर । परखा अविनाश अक्षर । दीखूंगा मैं कैसे ॥ ५२ ॥ कोयी पश्चिम समुद्रका तट । चलके पहुंचे पूर्वकी बाट । चोकर कूट करके सुभट । मिलेंगे क्या दाने ॥ ५३ ॥ वैसे विकृत जो स्थूल । जानकर मैं केवल । जैसे फेन पीके जल । कैसे पायेगा ? ॥ ५४ ॥ ऐसे मोहग्रस्त मनसे । यही मैं मान संभ्रमसे । देहके जन्मादि कर्मोंसे । लादते मुझे ॥ ५५ ॥ जिससे अनामको नाम । मुझ क्रिया-शून्यको कर्म । अ-शरीरको देह धर्म । आरोपते ॥ ५६ ॥ ज्ञानेश्वरी २६२

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