भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 331

इस प्रकाशमें तू निश्चित । निहार ऐश्वर्य योग नित । मुझमें है सब भूतजात । उसमें मैं नहीं ॥ ३३ ॥ या भूतमात्र नहीं मुझमें । तथा मैं नहीं भूतमात्रमें । इस रहस्यको जाननेमें । भूल न कर तू ॥ ३४ ॥ आकारके परे देखनेसे ही मेरा अनुभव आयेगा— है यह हमारा सर्वस्व गूढ । दिखाया तुझको मैंने उघड़ । लगाकर इन्द्रियोंका किवाड़ । भोग तू हृदयमें ॥ ३५ ॥ रहस्य यह करमें नहीं आता । तब तक मेरा स्वरूप जो पार्था । नहीं समझेगा तुझको सर्वथा । भूसेमें जैसे दाना ॥ ३६ ॥ अन्यथा कभी अनुमानसे । लगे समझमें आयी ऐसे । क्या मृगजळके सींचनेसे । भीगती है खेती ॥ ३७ ॥ जलमें जब जाल फैलता । चन्द्रबिंब उसमें दीखता । जाल जब खींच लिया जाता । तब बिंब कहां ॥ ३८ ॥ शब्द चातुर्यसे वक्तृत्वके । मूँदते नयन प्रतीतिके । समय आने पर बोधके । रहते कोरे ॥ ३९ ॥ अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । 'परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ यदि कोई संसारसे डरता । मेरी स्वरूप प्राप्तिको चाहता । तो हमारेमें जो विचार पार्थ । ध्यानमें रखले ॥ १४० ॥ जिसकी दृष्टिमें हुयी कामली । देखता वह चांदनी भी पीली । वैसा मेरा स्वरूप जो निर्मळ । देखते हैं मलिन ॥ ४१ ॥ या ज्वरसे दूषित जो मुख । दूधको कहे कडुआ विष । वैसे अमानुषको मानुष । कहेंगे मुझको ॥ ४२ ॥ तुच्छतासे मुझे मूढ देख मानव रूपमें । न जानते महा-रूप मेरा जो विश्व-चालक ॥ ११ ॥ २६१ राज-विद्या-समर्पणयोग