ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥ उमडता जब ज्वार सिंधु-जलका । रोक न सकता तब बांध नूनका वैसे मैं हूं सकल कर्मोंकी पूर्णता । यह क्या बांधेंगे मुझे ॥ २४ ॥ धूम्र रजका छतनार । रोके यदि वायुका जोर । या सूर्यबिंबमें अंधार । करे प्रवेश ॥ २५ ॥ जैसे पर्वतके उदरस्थ । न करे पर्जन्य-धार त्रस्त । वैसे प्रकृतिके कर्मजात । मुझे न करते स्पर्श ॥ २६ ॥ विकारोंमें यहां प्रकृतिके । मैं ही हूं जान तू समझके । किंतु उदासीन ही रहके । न करता न करता ॥ २७ ॥ घरमें रखी दीप-ज्योती । जो न प्रेरती या रोकती । कौन है यह न जानती । कौन क्या करता ॥ २८ ॥ जैसा होता वह साक्षीभूत । गृह-व्यापार प्रवृत्ति हेत । भूत कर्ममें मैं अनासक्त । वैसा रहता भूतोंमें ॥ २९ ॥ यह एक ही विचार । क्या कहूं मैं फिर फिर । पार्थ यहां एक बार । इतना जान तू ॥ १३० ॥ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥ जैसा लोक-चेष्टामें समस्त । निमित्त मात्र होता सवित । जगत प्रभवमें पांडुसुत । कारण मैं हूं ॥ ३१ ॥ किया मैंने प्रकृतिका अंगीकार । जिससे हुआ उत्पन्न स-चराचर । तब कारण मैं हुआ स-चराचर । यह है उपपत्ति ॥ ३२ ॥ किंतु जो ये सभी कर्म न बांध सकते मुझे । रहता मैं उदासीन तथा आसक्ति हीन भी ॥ ९ ॥ साक्षी मैं प्रकृति-द्वारा उठाता स-चराचर । उससे सब सृष्टीका होता है परिवर्तन ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी २६०