भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अजी ! राजाने बसाया नगर । सच कहनेका यह प्रकार । थक गया क्या राजाका शरीर । नगर बसाके ॥ ११० ॥ मैं प्रकृति-अधिष्ठान कैसे । कोई स्वप्नमें रहता जैसे । फिर वही प्रवेशता जैसे । जागृतावस्थामें ॥ ११ ॥ स्वप्नसे जागृतिमें आते । उसके क्या पैर दुखते । अथवा स्वप्नमें रहते । होता क्या प्रवास ॥ १२ ॥ इसका है यह अभिप्राय । जो यह भूत-सृष्टिका कार्य । चलता उसमें करणीय । मुझे कुछ भी नहीं ॥ १३ ॥ या राजाकी आश्रित प्रजा जैसे । बरतती अपने लिए वैसे । प्रकृतिके साथ मेरा भी वैसे । संबंध है यहां ॥ १४ ॥ पूर्णचंद्रसे मिलकर । आता सिंधु उमडकर । तत्र चंद्रको धनुर्धर । श्रमना है क्या ॥ १५ ॥ पासका लोह जो अ-चेतन । हिलता रहता यथा-स्थान । उससे चुंबकको सहन । करना क्या कष्ट ॥ १६ ॥ ऐसा निज-प्रकृति स्वीकार । करता हूं मैं पांडुकुमार । ऐसी भूत-सृष्टि सरासर । प्रसवती जाती ॥ १७ ॥ जो है यह भूतग्राम संपूर्ण । रहता है प्रकृतिके आधीन । जैसे बीजसे अंकुर अर्जुन । उपजाती भूमि ॥ १८ ॥ अथवा बाल्यादि अवस्थात्रय । लेकर शरीरका ही आश्रय । गगनकी मेघावली प्रश्रय । लेती वर्षा-ऋतुका ॥ १९ ॥ या स्वप्नका कारण निद्रा । वैसी प्रकृति है नरेंद्र । जो सम्पूर्ण भूत समुद्र । स्वामिनी प्रकृति ॥ १२० ॥ स्थावर औ' जंगम । स्थूल अथवा सूक्ष्म । ऐसा जो भूत ग्राम । प्रकृति मूल ॥ २१ ॥ इसलिए भूतमात्रोंका सृजन । या सृजित भूतोंका प्रतिपालन । करना नहीं पडता अर्जुन । हमको कभी ॥ २२ ॥ जलमें फैलती चन्द्रिकाकी लता । उसे चन्द्रको फैलाना न पडता । वैसे मुझसे दूर ही है रहता । कर्मजाल ॥ २३ ॥ २५९ राज-विद्या-समर्पणयोग