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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अजी ! राजाने बसाया नगर । सच कहनेका यह प्रकार । थक गया क्या राजाका शरीर । नगर बसाके ॥ ११० ॥ मैं प्रकृति-अधिष्ठान कैसे । कोई स्वप्नमें रहता जैसे । फिर वही प्रवेशता जैसे । जागृतावस्थामें ॥ ११ ॥ स्वप्नसे जागृतिमें आते । उसके क्या पैर दुखते । अथवा स्वप्नमें रहते । होता क्या प्रवास ॥ १२ ॥ इसका है यह अभिप्राय । जो यह भूत-सृष्टिका कार्य । चलता उसमें करणीय । मुझे कुछ भी नहीं ॥ १३ ॥ या राजाकी आश्रित प्रजा जैसे । बरतती अपने लिए वैसे । प्रकृतिके साथ मेरा भी वैसे । संबंध है यहां ॥ १४ ॥ पूर्णचंद्रसे मिलकर । आता सिंधु उमडकर । तत्र चंद्रको धनुर्धर । श्रमना है क्या ॥ १५ ॥ पासका लोह जो अ-चेतन । हिलता रहता यथा-स्थान । उससे चुंबकको सहन । करना क्या कष्ट ॥ १६ ॥ ऐसा निज-प्रकृति स्वीकार । करता हूं मैं पांडुकुमार । ऐसी भूत-सृष्टि सरासर । प्रसवती जाती ॥ १७ ॥ जो है यह भूतग्राम संपूर्ण । रहता है प्रकृतिके आधीन । जैसे बीजसे अंकुर अर्जुन । उपजाती भूमि ॥ १८ ॥ अथवा बाल्यादि अवस्थात्रय । लेकर शरीरका ही आश्रय । गगनकी मेघावली प्रश्रय । लेती वर्षा-ऋतुका ॥ १९ ॥ या स्वप्नका कारण निद्रा । वैसी प्रकृति है नरेंद्र । जो सम्पूर्ण भूत समुद्र । स्वामिनी प्रकृति ॥ १२० ॥ स्थावर औ' जंगम । स्थूल अथवा सूक्ष्म । ऐसा जो भूत ग्राम । प्रकृति मूल ॥ २१ ॥ इसलिए भूतमात्रोंका सृजन । या सृजित भूतोंका प्रतिपालन । करना नहीं पडता अर्जुन । हमको कभी ॥ २२ ॥ जलमें फैलती चन्द्रिकाकी लता । उसे चन्द्रको फैलाना न पडता । वैसे मुझसे दूर ही है रहता । कर्मजाल ॥ २३ ॥ २५९ राज-विद्या-समर्पणयोग

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥ उमडता जब ज्वार सिंधु-जलका । रोक न सकता तब बांध नूनका वैसे मैं हूं सकल कर्मोंकी पूर्णता । यह क्या बांधेंगे मुझे ॥ २४ ॥ धूम्र रजका छतनार । रोके यदि वायुका जोर । या सूर्यबिंबमें अंधार । करे प्रवेश ॥ २५ ॥ जैसे पर्वतके उदरस्थ । न करे पर्जन्य-धार त्रस्त । वैसे प्रकृतिके कर्मजात । मुझे न करते स्पर्श ॥ २६ ॥ विकारोंमें यहां प्रकृतिके । मैं ही हूं जान तू समझके । किंतु उदासीन ही रहके । न करता न करता ॥ २७ ॥ घरमें रखी दीप-ज्योती । जो न प्रेरती या रोकती । कौन है यह न जानती । कौन क्या करता ॥ २८ ॥ जैसा होता वह साक्षीभूत । गृह-व्यापार प्रवृत्ति हेत । भूत कर्ममें मैं अनासक्त । वैसा रहता भूतोंमें ॥ २९ ॥ यह एक ही विचार । क्या कहूं मैं फिर फिर । पार्थ यहां एक बार । इतना जान तू ॥ १३० ॥ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥ जैसा लोक-चेष्टामें समस्त । निमित्त मात्र होता सवित । जगत प्रभवमें पांडुसुत । कारण मैं हूं ॥ ३१ ॥ किया मैंने प्रकृतिका अंगीकार । जिससे हुआ उत्पन्न स-चराचर । तब कारण मैं हुआ स-चराचर । यह है उपपत्ति ॥ ३२ ॥ किंतु जो ये सभी कर्म न बांध सकते मुझे । रहता मैं उदासीन तथा आसक्ति हीन भी ॥ ९ ॥ साक्षी मैं प्रकृति-द्वारा उठाता स-चराचर । उससे सब सृष्टीका होता है परिवर्तन ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी २६०

इस प्रकाशमें तू निश्चित । निहार ऐश्वर्य योग नित । मुझमें है सब भूतजात । उसमें मैं नहीं ॥ ३३ ॥ या भूतमात्र नहीं मुझमें । तथा मैं नहीं भूतमात्रमें । इस रहस्यको जाननेमें । भूल न कर तू ॥ ३४ ॥ आकारके परे देखनेसे ही मेरा अनुभव आयेगा— है यह हमारा सर्वस्व गूढ । दिखाया तुझको मैंने उघड़ । लगाकर इन्द्रियोंका किवाड़ । भोग तू हृदयमें ॥ ३५ ॥ रहस्य यह करमें नहीं आता । तब तक मेरा स्वरूप जो पार्था । नहीं समझेगा तुझको सर्वथा । भूसेमें जैसे दाना ॥ ३६ ॥ अन्यथा कभी अनुमानसे । लगे समझमें आयी ऐसे । क्या मृगजळके सींचनेसे । भीगती है खेती ॥ ३७ ॥ जलमें जब जाल फैलता । चन्द्रबिंब उसमें दीखता । जाल जब खींच लिया जाता । तब बिंब कहां ॥ ३८ ॥ शब्द चातुर्यसे वक्तृत्वके । मूँदते नयन प्रतीतिके । समय आने पर बोधके । रहते कोरे ॥ ३९ ॥ अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । 'परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ यदि कोई संसारसे डरता । मेरी स्वरूप प्राप्तिको चाहता । तो हमारेमें जो विचार पार्थ । ध्यानमें रखले ॥ १४० ॥ जिसकी दृष्टिमें हुयी कामली । देखता वह चांदनी भी पीली । वैसा मेरा स्वरूप जो निर्मळ । देखते हैं मलिन ॥ ४१ ॥ या ज्वरसे दूषित जो मुख । दूधको कहे कडुआ विष । वैसे अमानुषको मानुष । कहेंगे मुझको ॥ ४२ ॥ तुच्छतासे मुझे मूढ देख मानव रूपमें । न जानते महा-रूप मेरा जो विश्व-चालक ॥ ११ ॥ २६१ राज-विद्या-समर्पणयोग

इसीलिए तू धनंजय । भूलेगा यह अभिप्राय । स्थूल दृष्टिका ज्ञानाशय । होगा व्यर्थ ॥ ४३ ॥ स्थूल-दृष्टिसे मुझे पार्थ । देखना है जान तू व्यर्थ । स्वप्नमें पीनेसे अमृत । न होता अमर ॥ ४४ ॥ वैसे स्थूल-दृष्टि है मूढ । जानते समझके दृढ । वह जानना होता आड । स्वरूप ज्ञानके ॥ ४५ ॥ होनेसे जैसा नक्षत्रका आभास । अपना ही घात कर लेता हंस । नीरमें रत्न-बुद्धिकी कर आस । मारकर चोंच ॥ ४६ ॥ गंगा जान गया मृगजल । उस जानेसे मिला क्या फल । सुरतरु समझ बबूल । लगानेसे क्या होगा ? ॥ ४७ ॥ हार मान नीलमणिका दुहरा । पकड लिया विषैला फणिधर । अथवा रत्न मानकर पत्थर । चुनना जैसे ॥ ४८ ॥ या प्रकट हुआ स्वर्ण-भंडार । कहकर उठा लिया अंगार । कूपमें कूदा छाया देखकर । अपनी सिंह ॥ ४९ ॥ मुझको देहधारी मानकर । निश्चय किया है धनुर्धर । उसने चंद्र समझकर । पकडा प्रतिबिंब ॥ १५० ॥ वैसे कृत-निश्चय गया व्यर्थ । कोयी जैसे मांड पीकर पार्थ । देखने लगा सुपरिणामार्थ । अमृतके मानो ॥ ५१ ॥ वैसे नाशवंत स्थूलाकार । चितमें निश्चय बांधकर । परखा अविनाश अक्षर । दीखूंगा मैं कैसे ॥ ५२ ॥ कोयी पश्चिम समुद्रका तट । चलके पहुंचे पूर्वकी बाट । चोकर कूट करके सुभट । मिलेंगे क्या दाने ॥ ५३ ॥ वैसे विकृत जो स्थूल । जानकर मैं केवल । जैसे फेन पीके जल । कैसे पायेगा ? ॥ ५४ ॥ ऐसे मोहग्रस्त मनसे । यही मैं मान संभ्रमसे । देहके जन्मादि कर्मोंसे । लादते मुझे ॥ ५५ ॥ जिससे अनामको नाम । मुझ क्रिया-शून्यको कर्म । अ-शरीरको देह धर्म । आरोपते ॥ ५६ ॥ ज्ञानेश्वरी २६२

मुझ आकारशून्यको आकार । औ' निरुपाधिकको उपचार । विधि विवर्जितको व्यवहार । आचारादिक ॥ ५७ ॥ मुझ वर्ण-हीनको वर्ण । तथा गुणातीतको गुण । औ' अ-चरणको चरण । अ-पाणिको पाणी ॥ ५८ ॥ अमर्यादको मान । सर्वगतको स्थान । शय्यापे लेटे जान । देखते हैं ॥ ५९ ॥ वैसे अ-श्रवणको श्रोत्र । मुझ अ-चक्षुको नेत्र । तथा अ-गोत्रको गोत्र । रूप अ-रूपको ॥ १६० ॥ मुझ अव्यक्तको व्यक्ति । तथा अनार्तको आर्ति । सर्व तृप्तिको है तृप्ति । सोचते सब ॥ ६१ ॥ अनावरणको प्रावरण । भूषण-अतीतको भूषण । सकल कारणको कारण । देखते मुझको ॥ ६२ ॥ मुझ सहजको रचते । स्वयंभूको हैं प्रतिष्ठते । निरंतरको आह्वानते । तथा विसर्जते हैं ॥ ६३ ॥ सर्वदा मैं स्वयं-सिद्ध । बाल तरुण और वृद्ध । एक रूपका संबंध । जानते वे मुझे ॥ ६४ ॥ मुझ अद्वयको द्वैत । अकर्ताको माने कर्ता । तथा अभोक्तकों भोक्ता । कह जानते ॥ ६५ ॥ अकुलका करते कुल-वर्णन । नित्यके निधनसे व्याकुल-मन । अंतर्यामिका शत्रु-मित्र अर्जुन । मानते हैं वे ॥ ६६ ॥ मैं हूं सर्वदा स्वानंदाभिराम । मुझे माने सकल-सुखकाम । सर्वत्र व्याप्त हूं संपूर्ण सम । मानतें मुझ स्थानिक ॥ ६७ ॥ आत्मा मैं चराचरमें बसता । कहते एकका पक्ष लेता । दूसरेका शत्रु बन मारता । बढाचढाके गाते यह ॥ ६८ ॥ अजी ! प्रायः ऐसे समस्त । मनुष्य-धर्म जो प्राकृत । लगाते मुझे विपरीत । यही उनका ज्ञान ॥ ६९ ॥ आकार कोई जब देखते । देव भावसे पूजा करते । वह बिगडनेपे कहते । नहीं रहा अब ॥ १७० ॥ २६३ राज-विद्या-समर्पणयोग

ऐसे ही अनेक प्रकार । बनाकर मानवाकार । करके ज्ञानपे अंधार । विपरीत ज्ञानसे ॥ ७१ ॥ मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ मैं अंधोंके हाथमें पड़ा मोति-सा हूं- इसीलिए जन्मना ही मोघ । जैसे वर्षाके बिन ही मेघ । अथवा मृगजल तरंग । देखना दूरसे ही ॥ ७२ ॥ या मृत्तिकाके घुड़सवार । या कलंदरके अलंकार । गंधर्व-नगरका आवार । आभास जो ॥ ७३ ॥ जैसे थूहरका बडा सरल । अंदर खोकला ना है फल । लटकते स्तन जैसे गला- । में बकरीके ॥ ७४ ॥ मूर्खका जीवन है व्यर्थ । जैसे सेमल फल पार्थ । धिक् उसके कर्म समस्त । जो हैं निरर्थक ॥ ७५ ॥ फिर मानो है उसका पढना । मर्कटका नारियल तोडना । अथवा अंधेका हाथ पडना । मोति जैसे ॥ ७६ ॥ वास्तवमें उनके शस्त्र । कुम्हारके हाथमें शंख । या कहा अशौचको मंत्र- । बीज किसीने ॥ ७७ ॥ वैसे उसका ज्ञान-जात । औ' आचरण क्रिया पार्थ । वह संपूर्ण गया व्यर्थ । चित्तहीन ॥ ७८ ॥ तमो-गुण राक्षसी । जो है सद्बुद्धि ग्रासी । विवेक-मूल नासी । निशाचरी ॥ ७९ ॥ उस प्रकृतिके आधीन हुये । इसीलिए चिंताका ग्रास भये । इस तामसीके कलेऊ हुये । मुखमें ही ॥ १८० ॥ वे आशावाद मूढोंके व्यर्थ हैं ज्ञान-कर्म भी । जिन्होंने संपदा पायी आसुरी मोह-कारक ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी २६४

जहां लारमें आशाकी । लोटती जिह्वा हिंसाकी । जुगाली करें कौरकी । मोदसे नित ॥ ८१ ॥ जो हैं कान तक अनर्थके । चाटती जीभ बाहर लाके । कोह बन प्रमाद गिरिके । हुई उन्मत्त ॥ ८२ ॥ जहां हैं क्रूर दांत द्वेषके । पीसते हैं बीजको ज्ञानके । आवरण डालते तमके । मूढ-बुद्धि पर ॥ ८३ ॥ आसुरी बुद्धिके मुखमें ऐसे । पडते हैं भूत बलिके कौरसे । भ्रमजालके कुण्डमें पड़नेसे । सुन धनंजय ॥ ८४ ॥ पडे वे ऐसे गर्तमें तमके । न लगते हाथमें विचारके । जहां गये उस स्थानके । निशान भी नहीं ॥ ८५ ॥ मैं भक्तोंके कीर्तन-मेलेमें रहता हूं— यह निष्फल वर्णन तदर्थ । रहने दो मूर्खोंकी बात पार्थ । विस्तार करनेसे वाणी व्यर्थ । थकेगी इससे ॥ ८६ ॥ ऐसे बोले तब देव । "जी" कहा सुन पांडव । सुन वाचा ही नीरव । साधु-कथासे ॥ ८७ ॥ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ अजी ! जिनका है निर्मल मानस । बसता वहां मैं ले क्षेत्र-सन्यास । नींदमें भी वे करते स-उल्लास । वैराग्याराधना ॥ ८८ ॥ जिनका सद्भाव आलंबन । रहता धर्मका सिंहासन । जिनके मनका है जीवन । विवेकमात्र ॥ ८९ ॥ जो हैं ज्ञान गंगामें स्नात । पूर्णता-भोजनसे तृप्त । शांति-लताके नव-पात । है अति कोमल ॥ १९० ॥ जुटाके संपदा दैवी महात्मा भजते मुझे । अनन्य भावसे जान मैं विश्वारंभ शाश्वत ॥ १३ ॥ (34) २६५ राज-विद्या-समर्पणयोग

पूर्णावस्थामें जो फूटे अंकुर । तथा धर्म-मंडपके आधार । शांति-सागरसे लिये हैं भर । पूर्ण-कुम्भ जैसे ॥ ९१ ॥ भक्तिकी हुई इन्हें इतनी प्राप्ति । कहते वे परे हठो तुम मुक्ति । उनके आचरणसे है नीति । खिलती सदा ॥ ९२ ॥ उनकी इंद्रियां भी संपूर्ण । पहने हैं शांतिका भूषण । उनका चित्त है आभरण । मुझ व्यापकको ॥ ९३ ॥ ऐसे जो महानुभाव । दैवी प्रकृतिके देव । जान करके वे सर्व । मेरा ही रूप है ॥ ९४ ॥ बढता हुआ उनका प्रेम । मुझे भजता है जो निष्काम । किंतु भिन्नताका मनोधर्म । छूता भी नहीं ॥ ९५ ॥ स्वयं मैं होकर पांडव । करते हैं वे मेरी सेवा । किंतु आश्चर्य है जो भाव । अब मैं कहता ॥ ९६ ॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥ उत्कर्षसे उन्होंने कीर्तनके । नाशे व्यवसाय प्रायश्चित्तके । नाम भी न रहे सब पापके । ऐसा ही किया ॥ ९७ ॥ निस्तेज किये सब यम-दम । तीर्थ उठाये पदसे उत्तम । थमे यमलोकके उपक्रम । अनेक प्रकारके ॥ ९८ ॥ यम कहें क्या यमना । दम पूछे किसे दमना । तीर्थ कहते हैं क्या खाना । दोष नहीं नाम-मात्र ॥ ९९ ॥ ऐसा है मेरा नाम-घोष । मिटाते हैं विश्वके दुःख । सारे जगमें महासुख । गूंज-महकता ॥ २०० ॥ दिखाते वे सूर्योदय बिन । जिलाते हैं अमृतके बिन । तथा वे देते योगके बिन । दर्शन-कैवल्यको ॥ १ ॥ नित्य कीर्तनमें मेरे यत्नसे लीन जो व्रती । भक्तिसे नित्य हो युक्त पूजते नम्र भावसे ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी २६६

राजा रंकका भेद नहीं करते । बाल-वृद्ध यह भी नहीं देखते । जगतको आनंदमें भर देते । पूर्ण-रूपसे ॥ २ ॥ अजी ! कभी कोई जाता है वैकुण्ठ । इन्होंने किया है विश्व ही वैकुण्ठ । मेरे नाम गौरवसे हे सुभट । उजलाया विश्व ॥ ३ ॥ तेजमें होते सूर्य-से उज्ज्वल । किन्तु सूर्यमें अस्तका काजल । पूर्ण-चन्द्र रहता एक काल । ये सदा पूर्णत्वमें ही ॥ ४ ॥ बरसनेमें मेघ उदार । घटनेमें हैं वह अपूर । ये निःसंदेह कृपालु वीर । पंचानन ॥ ५ ॥ उनकी जिह्वा पर सतत । नाम रहे मेरा नृत्य-रत । पानेमें जो जाते जन्मजात । सहस्रावधि ॥ ६ ॥ तब मैं वैकुण्ठमें नहीं रहता । भानु-बिम्बमें तब नहीं दीखता । योगियोंके हृदयके पार जाता । मैं उस समय ॥ ७ ॥ किंतु उनके पास धनुर्धर । करते जो नाम-घोष मधुर । रहता हूँ मैं निश्चित सादर । जो है खोया हुआ ॥ ८ ॥ मेरे गुणगानमें ही हैं वे तृप्त । देशकाल भूलते जो नामरत । कीर्तन सुखमें हुए सतत । स्वरूप रूप ॥ ९ ॥ कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । नामके निखिल प्रबंध । तथा आत्म-चर्चा विशद । खोते हैं उसमें ही ॥ १० ॥ नमस्कार भक्तिसे मद्रूप होते हैं-- रहने दो अब ये अर्जुन । सुन करके वे मेरा कीर्तन । तथा विचरते हैं अनुदिन । चराचरमें ॥ ११ ॥ ऐसे अनेक हैं पार्थ । कर सहज सिद्धता । मन-प्राणको ले साथ । पथ-दर्शक ॥ १२ ॥ बाहर लगायी यम नियमकी बाड़ । भीतर वज्रासनका गढ़ सुदृढ़ ॥ उस पर प्राणायामकी तोप चढ़ा- । रखी है सज्ज ॥ १३ ॥ वहां कुण्डलिनीके प्रकाशमें । मन-पवनके सहयोगमें । कर लिया अपने आधीनमें । सत्रहवींका कुम्भ ॥ १४ ॥ २६७ राज-विद्या-समर्पणयोग

प्रत्याहारने तब परक्रम किया । विषयोंके नाम मात्रको मिटा दिया सब इन्द्रियोंको बांध करके लाया । हृदयांगनमें ॥ १५ ॥ तब दौड़े धारणाके घुड़सवार । पकड़ लाये महाभूत इक ठौर । फिर किया चतुरंग सेना संहार । जो हैं संकल्पकी ॥ १६ ॥ तब “विजय हुआरे विजय ।” सिंगी बजी ध्यानकी हो निर्भय । दीखता तन्मयका स-समय । वहां एक-छत्र ॥ १७ ॥ फिर समाधिश्रीका अशेष । आत्मानुभवका राज्य-सुख । सिंहासन आरोहण देख । हुआ समरससे ॥ १८ ॥ ऐसा है यह गहन । अर्जुन मेरा भजन । अब कहता हूं सुन । अन्य प्रकार ॥ १९ ॥ जैसे सर्वत्र समानरूपमें । एक तंतु रहता है वस्त्रमें । वैसे वे “मैं” बिन चराचरमें । जानते नहीं ॥ २० ॥ आदि ब्रह्मसे लेकर । मच्छर तक आखर । मेरा रूप है सुन्दर । जानते हैं यह ॥ २१ ॥ फिर छोटा बड़ा नहीं कहते । निर्जीव सजीव नहीं जानते । सबके सम्मुख नम्र हैं होते । सब “मैं” मानकर ॥ २२ ॥ अपना उत्तमत्व नहीं जानते । औरोंकी योग्यायोग्यता न देखते । सर्वत्र आत्म-तत्व देख नमते । प्रेम-भावसे ॥ २३ ॥ जैसे ऊपरसे पानी गिरता । नीचे तल तक है वह जाता । वैसे भूतमात्रसेही नम्रता । स्वभाव यह उनका ॥ २४ ॥ या वृक्षकी शाखा फल-भारसे । उतरती है सहज-भावसे । वैसे वे झुकते हैं नम्रतासे । सबके प्रति ॥ २५ ॥ रहते हैं सर्वज्ञ निराभिमान । विनय ही उनकी संपत्ति महान । करते वे जयजय मंत्र अर्पण । मुझको ही ॥ २६ ॥ नमनसे गला मानाभिमान । सहज हुए मद्रूप अर्जुन । ऐसे होकर मत्स्वरूप-लीन । भजते मुझको ॥ २७ ॥ है यह अर्जुन श्रेष्ठ भक्ति । कही मैंने अभी तेरे प्रति । ज्ञान-यज्ञसे भजन रीति । सुन तू भक्तकी अब ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी २६८

ज्ञानी-भक्त सदा-सर्वत्र एक भावसे मुझे देखता है— यह भजन-परिपाटी। जानता ही है तू किरीटी। की इसकी हमने गोष्ठी। पहले ही ॥ २९॥ तब कहता है “जी हां” अर्जुन। “यह है देवप्रसाद महान।” जब मिलता अमृत-भोजन। कहेगा कौन “बस है” ॥ ३० ॥ सुनकर यह अनंत। हुआ अति प्रसन्न-चित्त। सुननेका अर्जुन-मत। जानकर ॥ ३१ ॥ कहते हैं भला किया पार्था। यह अनवसर सर्वथा। किंतु कहलाती तेरी अवस्था। मुझसे अब ॥ ३२ ॥ पार्थ पूछे ऐसे कैसे कहता। बिन चकोर चंद्र नहीं उगता ?। देता है वह विश्वको शीतलता। यह स्वभाव उसका ॥ ३३ ॥ यहां चकोर अपनेही हितार्थ। चोंच उठाता चन्द्रकी ओर नित। हमारी विनय है एक निमित्त। देव आप कृपासिंधु ॥ ३४ ॥ उदारतासे मेघ बरसता। जगतकी है तरस मिटाता। चातककी प्यासकी क्या है कथा। वर्षाके सम्मुख ॥ ३५ ॥ पानीके लिये एक घूंट। जाना पडता गंगा-तट। देव सुनाओ हमें चट। चाह है बहु या अल्प ॥ ३६॥ कृष्ण कहे रहने दो पार्था। देखके तुम्हारी यह आस्था। हुआ है मेरा चित्त मुदित। स्तुति न होती सहन ॥ ३७ ॥ जब तू सुनता है अति उत्तम। वक्तृत्व निमंत्रणका काम। कहता यह बोल पुरुषोत्तम। आदर कर बोले ॥ ३८ ॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ ज्ञान-यज्ञका यह रूप। आदि संकल्प यह यूप। पंच-महाभूत मंडप। भेद है पशु ॥ ३९॥ दूसरे ज्ञान-यज्ञोंसे देखके ब्रह्म-भावसे। विवेकसे अविभेद भेदमें भजते मुझे ॥ १५ ॥ २६९ राज-विद्या-समर्पणयोग

फिर पांचोंके जो विशेष गुण । अथवा इन्द्रियां तथा है प्राण । यही है यज्ञोपचार भरण । अज्ञान है घृत ॥ २४० ॥ वहां कुण्ड है मन बुद्धिका । प्रज्वलित अग्नी है ज्ञानका । समताकी सुन्दर वेदिका । जान तू पार्थ ॥ ४१ ॥ मति कौशल्य स-विवेक । मंत्र-विद्या गौरव नेक । शांति ही है सुवा और सुक । जीव है यजमान ॥ ४२ ॥ स्वरूपानुभव पात्रसे । विवेकके महा-मंत्रसे । वह है ज्ञानाग्नि होत्रसे । नाशता भेद ॥ ४३ ॥ जब है अज्ञान मिट जाता । यजितका यज्ञ है रुकता । आत्म-समरस स्नान होता । अवभृतका ॥ ४४ ॥ तब भूत विषय कारण । न होता इसका भेद ज्ञान । एकत्वका है संपूर्ण ज्ञान । होता आत्म-बुद्धिसे ॥ ४५ ॥ जागृत मनुष्य जैसे अर्जुना । कहता स्वप्नकी विचित्र सेना । आप रही स्वयं बन गया था ना । निद्रावश होकर ॥ ४५ ॥ अब न रही सेना जो थी सेना । मैं अकेला ही था पूर्ण रूपेण । ऐसा होता तब एकत्व-भान । उसको विश्वका ॥ ४७ ॥ फिर जीवत्वका भान है मिटता । आब्रह्म परमात्म बोध भरता । इस भांति ज्ञान-भावसे भजता । अद्वय-बोधसे ॥ ४८ ॥ जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग भजन कैसे ?— या अनादि यह अनेक । भिन्नत्व है अनेकानेक । तथा है नाम-रूपादिक । वह भी बिषम ॥ ४९ ॥ इसीलिए विश्व है भिन्न । न भेदता उसका ज्ञान । जैसे अंग हैं भिन्न भिन्न । पर शरीर एक ॥ २५० ॥ शाखाओंके अनेक प्रकार । किंतु है एक ही तरुवर । रश्मि ढेर, एक दिनकर । वैसे ही पार्थ ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी २७०

वैसे नानाविध व्यक्ति । नाना नाम तथा वृत्ति । उसमें मैं अभेद-मूर्ति । भेदमें जानते ॥ ५२ ॥ ऐसे भिन्नत्वमें धनुर्धर । करते ज्ञानयज्ञ सुन्दर । बोध न होता नाना प्रकार । जाननेसे ॥ ५३ ॥ या जहां जो कुछ है देखते । मेरे बिन अन्य न जानते । सदा मेरी प्रतीति करते । यह बोध उनका ॥ ५४ ॥ बुल्ले जहां तथा जितने होते । जलके आधारसे ही बनते । फिर रहते या घुल जाते । पानीमें ही ॥ ५५ ॥ मानो आंधीने परमाणु उडाये । वे भूमित्वसे अलग नहीं गये । वे जब पुनः नीचे ही गिर गये । तो पृथ्वी पर ही ॥ ५६ ॥ वैसे कहीं कुछ भी हो जाये । या कहो कुछ भी ना हो जाये । सब ही "मैं" बोध लेते गये । सर्व-भावसे ॥ ५७ ॥ अजी ! जहां जितनी मेरी व्याप्ति । उतनी ही है उनकी प्रतीति । बहुधाकारकी वर्तन स्थिति । बहुरूप उनकी ॥ ५८ ॥ जैसे भानु-बिंब नित्य । सबके सम्मुख दिव्य । वैसे वे विश्वके भव्य । सदा सम्मुख ॥ ५९ ॥ अजी ! उनका वह जो ज्ञान । आगे पीछे न जाने अर्जुन । वायु जैसा सदैव गगन । रहे सर्वत्र ॥ २६० ॥ वैसे जितना हूं मैं संपूर्ण । उतना उनका भाव-पूर्ण । इससे न करते अर्जुन । भजन होता है ॥ ६१ ॥ वैसे मैं हूं सर्वत्र पूर्ण रूपसे । कहां मेरा भजन न होता कैसे । किंतु यहां ऐसा ज्ञान होनेसे । भजन न होता ॥ ६२ ॥ यहां जो उचित रूपसे । भजते हैं ज्ञान-यज्ञसे । कही बात मैंने तुझसे । उनकी पार्थ ॥ ६३ ॥ जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं— यह सब है सतत सबकी ओरसे । अर्पण होता मुझे सहज भावसे । यह नहीं जाननेसे अज्ञानियोंसे । न होता मुझे अर्पण ॥ ६४ ॥ २७१ राज-विद्या-समर्पणयोग

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ उदय होगा जब ज्ञानका । तब वेद ही "मैं हूँ" इसका । "मैं" ही तज्जन्य-ऋतु होनेका । अनुभव होगा ॥ ६५ ॥ तब यज्ञ जन्य सकल । सांगोपांग कर्म निर्मल । यज्ञ भी "मैं" यह निखिल । होगा बोध पार्थ ॥ ६६ ॥ स्वाहा "मैं" हूँ तथा स्वधा । सोमादि दिव्य विविध । आज्य और "मैं" समिधा । मंत्र औ, हवि भी ॥ ६७ ॥ होता मैं हवन करता । अग्नि स्वरूप मैं रहता । हवन-वस्तु जो जो होता । वह सब मैं हूँ ॥ ६८ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ अजी ! जिसके अंग-संगसे । यहां प्रकृति के अष्टांगसे । जन्म होता विश्वका जिससे । पिता वह मैं हूँ ॥ ६९ ॥ अर्धनारी नटेश्वरी । जो पुरुष वह नारी । वैसा मैं सचराचरीं । माता भी हूँ ॥ २७० ॥ जगत जहांसे होता औ' रहता । जिससे जीवन लेकर बढता । मेरे बिना वह कछु नहीं होता । अन्य धनुर्धर ॥ ७१ ॥ प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको यहां । जनम दिया हमने मनमें जहां । वह पितामह त्रिभुवनमें यहां । मैं हूँ विश्वका ॥ ७२ ॥ जहां ज्ञान-रूप सभी बाट । जिस स्थान आती हैं सुभठ ! उन वेदोंकी वेद्य जो गोष्ठ । कहलाती है ॥ ७३ ॥ मैं ही संकल्प मैं यज्ञ स्वावउंबन अन्न मैं । मंत्र मैं हव्य भी मैं हू अग्नि मैं आहुती तथा ॥ १६ ॥ जगदाधार ही मैं हूं माता पिता पितामह । मैं तीनों वेद ॐकार जानने योग्य पावन ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी २७२

जहां नाना मतोंका अपरिचितपन । मिटता है शास्त्रोंका अनजान । मिलते हैं जहां भूले हुए सभी ज्ञान । वह पवित्र मैं हूँ ॥ ७४ ॥ ब्रह्म-बीजका फूटा अंकुर । घोष ध्वनि नाद औ' आकार । उसका भुवन जो ओंकार । वह भी मैं हूँ ॥ ७५ ॥ उस ओंकारका है उदर । समालेता है अ, उ, म, कार । जनमते ही वेद लेकर । उठे वे तीनों ॥ ७६ ॥ इसीलिए ऋग् यजु तथा साम । ये तीनों कहे मैं आत्माराम । एवं मैं ही हूँ सब कुलक्रम । शब्द ब्रह्मका ॥ ७७ ॥ गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥ जो है यह चराचर संपूर्ण । जिसमें भरी है प्रकृति पूर्ण । उस प्रकृतिका विश्राम स्थान । परमगति मैं हूँ ॥ ७८ ॥ जिससे पाती है प्रकृति जीवन । अधिष्ठानसे होता विश्व जनन । आकर जो उस प्रकृतिके गुण । भोगता है ॥ ७९ ॥ विश्वश्रीका वह भर्ता । मैं हूँ जानो पांडुसुता । हूँ अधिपति समस्ता । त्रिभुवनका मैं ॥ २८० ॥ आकाशको सर्वत्र बसाना । वायुको कभी स्वस्थ न होना । तथा वर्षाको बरसना । औ' दहना अग्निको ॥ ८१ ॥ पर्वतको न छोड़ना आसन । समुद्रको न सीमा उल्लंघन । पृथ्वी करे भूतोंका वहन । यह है आज्ञा मेरी ॥ ८२ ॥ मेरे कहनेसे है वेद बोलता । मेरे चलानेसे सूर्य है चलता । मेरे हिलानेसे प्राण है हिलता । करता विश्वका चलन ॥ ८३ ॥ मेरे ही नियमनमें काल । प्राणि-मात्रको जाता निगल । मेरी ही आज्ञामें है सकल । चलता नित्य ॥ ८४ ॥ साक्षी स्वामी सखा भर्ता निवास गति आसरा । मैं हूं कर्ता भर्ता हर्ता निदान बीज अक्षय ॥ १८ ॥ २७३ राज-विद्या-समर्पणयोग (35)

ऐसा हूँ मैं समर्थ । जो जगतका नाथ । औ' मैं हूँ साक्षीभूत । गगन जैसा ॥ ८५ ॥ यहां नाम रूपमें पूर्ण । बसा हुआ है अर्जुन । नाम रूपका अधिष्ठान । वह भी मैं हूँ ॥ ८६ ॥ जलका है जैसे कल्लोल । औ' कल्लोलमें होता जल । वैसे विश्वका मैं सकल । आधार भूत हूँ ॥ ८७ ॥ होता जो मेरा अनन्य शरण । उसका हरता जन्म मरण । शरणागतका शरण्य स्थान । मैं ही एक ॥ ८८ ॥ एक मैं अनेक रूप-धारण । कर ले प्रकृतिके भिन्न गुण । बन सजीव जगतके प्राण । रहता हूँ पार्थ ॥ ८९ ॥ डबरा सागर भेद न मान । सबमें बिंबता सूर्य समान । वैसे ब्रह्मादि भूतमें समान । सु-हृदयस्थ मैं ॥ २९० ॥ अजी ! मैं ही हूँ अर्जुन । त्रिभुवनका जीवन । सृष्टि क्षयका कारण । मूल जो मैं हूँ ॥ ९१ ॥ बीज ही शाखाओंको प्रसवता । वही वृक्ष बीजमें है समाता । वैसे संकल्पसे सब बनता । औ' समाता संकल्पमें ॥ ९२ ॥ विश्वका बीज जो है संकल्प । अव्यक्त तथा वासना रूप । उस संकल्पका है निक्षेप । अन्तमें मैं हूँ ॥ ९३ ॥ . यहां नाम-रूप मिटते । वर्ण औ' व्यक्ति है अटते । जातिके भेद भी खुलते । जब न होता आकाश ॥ ९४ ॥ संकल्प वासना संस्कार । फिर रचनेमें आकार । रहते हैं जहां अमर । वह स्थान मैं हूँ ॥ ९५ ॥ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ । तपके जलको खींच गिराता वृष्टि रूपसे । मृत्यु मैं और मैं मोक्ष मैं ही सत् और हूं असत् ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी २७४

मैं सूर्य बन तपता । शोषता औ' प्रकाशता । इंद्र बन मैं वर्षाता । आता सुकाल ॥ ९६ ॥ जब है अग्नि काष्ठ खाता । काष्ठ ही है अग्नि बनता । वैसे मरता व मारता । जानो स्वरूप मेरा ॥ ९७ ॥ जो जो दीखता है यहां मर्त्य । वह सब मेरा रूप खुत्य । तथा जो है सहज अमर्त्य । वह अविनाशी हूँ मैं ॥ ९८ ॥ अजी ! बहुत बोल क्या करना । सबही एक वाक्यमें जानना । सता·सत सार अनुभवना । मैं हूँ सब ॥ ९९ ॥ पुण्यकी समाप्तिके बाद पुनः मृत्यु-लोकमें— इसीलिए पार्थ मैं नहीं । ऐसा कछु है नहीं कहीं । प्राणियोंका दैव है कहीं । जो न देखें मुझको ॥ ३०० ॥ पानी बिन तरंग है सूखती । सूर्य बिन रश्मि न दीखती । न करते मद्रूपकी प्रतीति । है यह विस्मय ॥ १ ॥ भरा यह मुझसे बाहर भीतर । ढला है विश्व मुझसे ही ओर छोर । किंतु बीता है उनका कर्म-कठोर । कहते हैं मैं नहीं ॥ २ ॥ अमृत-कुण्डमें जो पडते । अपनेको निकाल कहते । ऐसोंको है क्या कह सकते । अप्राप्यको होता ऐसा ॥ ३ ॥ अन्नके लिए एक कौर । दौडता है अंध सत्वर । चिंतामणि ठुकराकर । अंधत्वमें ॥ ४ ॥ मिटती है जब ज्ञानमें आस्था । होती ऐसी अंधेकीसी अवस्था । करके न किया ऐसा सर्वथा । होता ज्ञानके बिन ॥ ५ ॥ अंधेको गरुड पंख मिलता । उसका क्या उपयोग होता । वैसे सत्कर्म सदा व्यर्थ जाता । ज्ञानके बिन ॥ ६ ॥ अजी ! देख तू यह अर्जुन । आश्रम-धर्मका आचरण । विधि-मार्गका देता शिक्षण । अपने आप ॥ ७ ॥ करनेसे सहज-यजन । होता है प्रसन्न वेदार्जन । क्रिया फल सह मूर्तिमान । आता सम्मुख ॥ ८ ॥ २७५ राज-विद्या-समर्पणयोग

ऐसे दीक्षित है जो सोमप । आपही होते यज्ञ-स्वरूप । वहां पुण्यके नामसे पाप । जुडा जान ॥ ९ ॥ श्रुतित्रयको वे जानकर । शत-यज्ञोंको सम्पन्न कर । यजित मुझको भूलकर । चाहते स्वर्ग ॥ ३१० ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥ जैसे जो कल्पतरुकी छायामें । बैठ गांठ बांधे भिक्षा-झोलीमें । निकलेगा ही वह भिक्षान्नमें । निर्दैवी निश्चित ॥ ११ ॥ वैसे सौ शत सौ यज्ञ किये मेरेलिए । किंतु चाह है स्वर्ग सुखकेलिए । पुण्य करना यह पापकेलिए । ऐसा नहीं क्या ? ॥ १२ ॥ मुझे छोडकर पाना स्वर्ग । अज्ञानका यह पुण्यमार्ग । ज्ञानी जन उसे उपसर्ग । कहते हैं जो ॥ १३ ॥ वैसे देख नरकको दुःख । दिया है नाम स्वर्गको सुख । नित्यानन्द-रूप है निर्दोष । स्वरूप मेरा ॥ १४ ॥ मेरे पास आते हुए पार्थ । पडते हैं ये दोनों सतत । स्वर्ग तथा नरकका पथ । है ये चोरोंके ही ॥ १५ ॥ जो मेरे पास लाता है वही शुद्ध-पुण्य है— स्वर्ग देता है पुण्यात्मक पाप । नरक देता है पापात्मक पाप । मुझ तक पहुंचाता है आप । यह है शुद्ध-पुण्य ॥ १६ ॥ मत्स्वरूपमें रहते । मुझसे हैं दूर होते । ऐसे कर्मको कहते । पुण्य कैसे ? ॥ १७ ॥ वेदाभ्यासी सोम पीके पुनीत यज्ञसे जो चाहते स्वर्ग पाना । वे पुण्यसे पाकर इंद्र-लोक पाते वहांके सुख भोग दिव्य ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी २७६

किंतु रहने दो यह प्रस्तुत । सुन इस भांति हैं वे दीक्षित यज कर मुझको ही याचित । स्वर्गका सुख ॥ १८ ॥ जो पापात्मक पुण्य होता । उससे मैं नहीं मिलता । उससे प्राप्त जो योग्यता । देती है स्वर्ग ॥ १९ ॥ स्वर्ग-सुखका वर्णन— अमरत्व जहां सिंहासन । ऐरावत जैसा है वाहन । राजधानी तथा है भुवन । अमरावती ॥ ३२० ॥ महासिद्धिंका जहां भंडार । अमृतका भरा है कोठार । वहां फिरते हैं समाहार । कामधेनुके ॥ २१ ॥ देवही जहां स्वयंसेवक । भूमि है चिंतामणिकी नेक । विनोद वाटिका हैं अनेक । सुरतरुकी वहां ॥ २२ ॥ गायन गंधर्वोंका । नर्तन है रंभाका । विलास उर्वशीका । मिलता वहां ॥ २३ ॥ मदन करता शय्या-श्रृंगार । चन्द्र बिछाता अमृत-तुषार । हरकारा है पवन तयार । वहां सदैव ॥ २४ ॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥ बृहस्पतिसे महान । स्वस्तिश्रीके ब्राह्मण । भोजनमें सुरगण । साथ रहते ॥ २५ ॥ वे भोगते स्वर्ग विशाल ऐसा आते यहीं क्षीण होते हि पुण्य । ऐसे फलासक्त जो वेद-धर्मी पुनः पुनः जाकर लौटते हैं ॥ २१ ॥ २७७ राज-विद्या-समर्पणयोग

लोकपालोंके समान । अश्व खींचते वाहन । उच्चैश्रवा स-सम्मान । चलता आगे ॥ २६ ॥ वहां मिलते हैं ऐसे । भोग इंद्र-सुख जैसे । पुण्यांश लोप होनेसे । होते लोप ॥ २७ ॥ पुण्य क्षीण होनेके बाद— पुण्यका जब लोप होता । ऐंद्रैश्वर्य भी है मिटता । तब लौट आना पड़ता । मृत्यु लोकमें ॥ २८ ॥ धन गंवाता है जो वेश्यागमनमें । जा न सकता फिर उसके द्वारमें । दीक्षितके वैसे लज्जित जीवनमें । कहना क्या रहा ? ॥ २९ ॥ उन्होंने यहां खोया मुझको । पुण्य बलसे चाहा स्वर्गको । वंचित हुवे अमरत्वको । तब फिर मृत्यु-लोक ॥ ३० ॥ फिर माताका उदर गहर । पचाना वहाँ मलमूत्र सागर । वहां रहके नवमास भर । जनमते औ' मरते ॥ ३१ ॥ अजी ! स्वप्नमें पाते निधान । जगकर भूलते सम्पूर्ण । वैसे स्वर्गका सुख है जान । वेदज्ञोंका ३२ ॥ यद्यपि हैं वेद महान । मेरे बिन हैं वे अर्जुन । भूसा कूटना धान बिन । वैसा है व्यर्थ ॥ ३३ ॥ जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं उनका मैं दास बनता हूँ— इसलिए जो मेरे बिन । वेद-धर्म है अकारण । जान मुझे कुछ न जान । तो भी होगा सुखी ॥ ३४ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ चितसे सर्व भाव संपूर्ण । मुझे किया सर्व समर्पण । जैसे गर्भ-गोल हे अजान । न जानता उद्यम ॥ ३५ ॥ अनन्य भावसे नित्य भजते भक्त जो मुझे । उनका जो सदा लीन चलाता योग-क्षेम मैं ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी २७८