ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे दीक्षित है जो सोमप । आपही होते यज्ञ-स्वरूप । वहां पुण्यके नामसे पाप । जुडा जान ॥ ९ ॥ श्रुतित्रयको वे जानकर । शत-यज्ञोंको सम्पन्न कर । यजित मुझको भूलकर । चाहते स्वर्ग ॥ ३१० ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥ जैसे जो कल्पतरुकी छायामें । बैठ गांठ बांधे भिक्षा-झोलीमें । निकलेगा ही वह भिक्षान्नमें । निर्दैवी निश्चित ॥ ११ ॥ वैसे सौ शत सौ यज्ञ किये मेरेलिए । किंतु चाह है स्वर्ग सुखकेलिए । पुण्य करना यह पापकेलिए । ऐसा नहीं क्या ? ॥ १२ ॥ मुझे छोडकर पाना स्वर्ग । अज्ञानका यह पुण्यमार्ग । ज्ञानी जन उसे उपसर्ग । कहते हैं जो ॥ १३ ॥ वैसे देख नरकको दुःख । दिया है नाम स्वर्गको सुख । नित्यानन्द-रूप है निर्दोष । स्वरूप मेरा ॥ १४ ॥ मेरे पास आते हुए पार्थ । पडते हैं ये दोनों सतत । स्वर्ग तथा नरकका पथ । है ये चोरोंके ही ॥ १५ ॥ जो मेरे पास लाता है वही शुद्ध-पुण्य है— स्वर्ग देता है पुण्यात्मक पाप । नरक देता है पापात्मक पाप । मुझ तक पहुंचाता है आप । यह है शुद्ध-पुण्य ॥ १६ ॥ मत्स्वरूपमें रहते । मुझसे हैं दूर होते । ऐसे कर्मको कहते । पुण्य कैसे ? ॥ १७ ॥ वेदाभ्यासी सोम पीके पुनीत यज्ञसे जो चाहते स्वर्ग पाना । वे पुण्यसे पाकर इंद्र-लोक पाते वहांके सुख भोग दिव्य ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी २७६