भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किंतु रहने दो यह प्रस्तुत । सुन इस भांति हैं वे दीक्षित यज कर मुझको ही याचित । स्वर्गका सुख ॥ १८ ॥ जो पापात्मक पुण्य होता । उससे मैं नहीं मिलता । उससे प्राप्त जो योग्यता । देती है स्वर्ग ॥ १९ ॥ स्वर्ग-सुखका वर्णन— अमरत्व जहां सिंहासन । ऐरावत जैसा है वाहन । राजधानी तथा है भुवन । अमरावती ॥ ३२० ॥ महासिद्धिंका जहां भंडार । अमृतका भरा है कोठार । वहां फिरते हैं समाहार । कामधेनुके ॥ २१ ॥ देवही जहां स्वयंसेवक । भूमि है चिंतामणिकी नेक । विनोद वाटिका हैं अनेक । सुरतरुकी वहां ॥ २२ ॥ गायन गंधर्वोंका । नर्तन है रंभाका । विलास उर्वशीका । मिलता वहां ॥ २३ ॥ मदन करता शय्या-श्रृंगार । चन्द्र बिछाता अमृत-तुषार । हरकारा है पवन तयार । वहां सदैव ॥ २४ ॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥ बृहस्पतिसे महान । स्वस्तिश्रीके ब्राह्मण । भोजनमें सुरगण । साथ रहते ॥ २५ ॥ वे भोगते स्वर्ग विशाल ऐसा आते यहीं क्षीण होते हि पुण्य । ऐसे फलासक्त जो वेद-धर्मी पुनः पुनः जाकर लौटते हैं ॥ २१ ॥ २७७ राज-विद्या-समर्पणयोग

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