भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 348

लोकपालोंके समान । अश्व खींचते वाहन । उच्चैश्रवा स-सम्मान । चलता आगे ॥ २६ ॥ वहां मिलते हैं ऐसे । भोग इंद्र-सुख जैसे । पुण्यांश लोप होनेसे । होते लोप ॥ २७ ॥ पुण्य क्षीण होनेके बाद— पुण्यका जब लोप होता । ऐंद्रैश्वर्य भी है मिटता । तब लौट आना पड़ता । मृत्यु लोकमें ॥ २८ ॥ धन गंवाता है जो वेश्यागमनमें । जा न सकता फिर उसके द्वारमें । दीक्षितके वैसे लज्जित जीवनमें । कहना क्या रहा ? ॥ २९ ॥ उन्होंने यहां खोया मुझको । पुण्य बलसे चाहा स्वर्गको । वंचित हुवे अमरत्वको । तब फिर मृत्यु-लोक ॥ ३० ॥ फिर माताका उदर गहर । पचाना वहाँ मलमूत्र सागर । वहां रहके नवमास भर । जनमते औ' मरते ॥ ३१ ॥ अजी ! स्वप्नमें पाते निधान । जगकर भूलते सम्पूर्ण । वैसे स्वर्गका सुख है जान । वेदज्ञोंका ३२ ॥ यद्यपि हैं वेद महान । मेरे बिन हैं वे अर्जुन । भूसा कूटना धान बिन । वैसा है व्यर्थ ॥ ३३ ॥ जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं उनका मैं दास बनता हूँ— इसलिए जो मेरे बिन । वेद-धर्म है अकारण । जान मुझे कुछ न जान । तो भी होगा सुखी ॥ ३४ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ चितसे सर्व भाव संपूर्ण । मुझे किया सर्व समर्पण । जैसे गर्भ-गोल हे अजान । न जानता उद्यम ॥ ३५ ॥ अनन्य भावसे नित्य भजते भक्त जो मुझे । उनका जो सदा लीन चलाता योग-क्षेम मैं ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी २७८