भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मेरे बिन कुछ भी नहीं । जिन्हें सुहाता कभी कहीं । उनके जीवन हेतु ही । एकमात्र मैं ॥ ३६ ॥ ऐसा अनन्य गति जो चित्त । मेरे ही चिंतनमें है रत । उनकी मैं हूँ दिन रात । सेवा करता ॥ ३७ ॥ जब वे एकनिष्ठ हो पार्थ । चलते रहते मेरा पथ । उनकी चिंता है मेरे साथ । लगती सदा ॥ ३८ ॥ फिर जो जो है उनको करना होता । वह सब मुझको ही करना पड़ता । जैसा अजात पक्षीका जीवन होता । पक्षिणीको जीना ॥ ३९ ॥ शिशु अपनी भूख-प्यास न जानता । तब माताको सब करना पड़ता । वैसे जो प्राण-पणसे मुझे भजता । उनकी सेवा लजाता नहीं ॥ ४० ॥ उसको चाह मेरे सायुज्यकी । उसे पूर्ण करना मेरे मनकी । या सेवाकी चाह मुझसे उसकी । जिससे होती प्रीति ॥ ४१ ॥ वैसे मनमें वे जो जो भाव । धरते पूर्ण करता देव । देता जो उसे मैं ही सदैव । रक्षण करता ॥ ४२ ॥ किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही अधिक हैं— येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥ यह योग-क्षेम सम्पूर्ण । मुझ पर पडा अर्जुन । उसका है सर्व भावेन । मैं ही आश्रय ॥ ४३ ॥ अब अन्य कयी हैं संप्रदाय । जो मुझे न जानते मैं उन्हें नित्य । वे हैं अग्नि इन्द्र सूर्य सोमाय । कहकर हैं यजते ॥ ४४ ॥ वह भी है मेरा ही भजन । क्योंकि यह जो है मैं ही पूर्ण । किंतु यह सरल न जान । वक्र ही हैं ॥ ४५ ॥ श्रद्धा-पूर्वक जो कोयी पूजते अन्य दैवत । पूजते हैं मुझको ही किंतु है विधि छोडके ॥ २३ ॥ २७९ राज-विद्या समर्पणयोग