भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे शाखा पल्लव वृक्षके । सारे हैं ये एक ही बीजके । किंतु पानी लेते हैं जडके । धर्म वैसे ही ॥ ४६ ॥ या जो दस इन्द्रियां हैं । सब एक ही देहकी हैं । इनके विषय जाते हैं । एक ही स्थानपे ॥ ४७ ॥ किंतु मृष्टान्न कैसे मधुर । कानोंमें भरना सुखकर । कैसे जाने सौरभ मधुर । सूँघकर नमक ॥ ४८ ॥ जैसे जिह्वासे रस चखना । घ्राणसे ही परिमल लेना । वैसे मेरा भजन करना । मुझे जानकर ॥ ४९ ॥ मुझे न जानकर भजन । करते हैं वह पार्थ जान । तभी कर्मके चक्षु हैं ज्ञान । वह हो निर्दोष ॥ ३५० ॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥ वैसे देखें तो हे पार्थ । यज्ञोपहार समस्त । मेरे बिन कहो भोक्ता । कौन है अन्य ॥ ५१ ॥ सकल यज्ञका मैं आदि । इसका मैं ही हूं अवधि । किंतु मुझे छोड दुर्बुद्धि । भजते देवोंको ॥ ५२ ॥ गंगाजीको गंगोदक ही जैसे । देते हैं देव पितरोद्देश्यसे । देते हैं मेरा ही मुझको वैसे । भावसे अन्य ॥ ५३ ॥ यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम् ॥२५॥ इसीलिए सुन पांडुसुता । मुझे न मिलकर सर्वथा । दिया मनमें रख जो आस्था । वहीं गया ॥ ५४ ॥ भोक्ता मैं सब यज्ञोंका फलदायक भी स्वयं । न जाने तत्व जो मेरा गिरते हैं सदा वही ॥ २४ ॥ देवोंके भक्त देवोंसे पितृओंसे पितृ-पूजक । भूतोंके भक्त भूतोंसे मेरे जो मिलते मुझे ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २८०