ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
जैसे शाखा पल्लव वृक्षके । सारे हैं ये एक ही बीजके । किंतु पानी लेते हैं जडके । धर्म वैसे ही ॥ ४६ ॥ या जो दस इन्द्रियां हैं । सब एक ही देहकी हैं । इनके विषय जाते हैं । एक ही स्थानपे ॥ ४७ ॥ किंतु मृष्टान्न कैसे मधुर । कानोंमें भरना सुखकर । कैसे जाने सौरभ मधुर । सूँघकर नमक ॥ ४८ ॥ जैसे जिह्वासे रस चखना । घ्राणसे ही परिमल लेना । वैसे मेरा भजन करना । मुझे जानकर ॥ ४९ ॥ मुझे न जानकर भजन । करते हैं वह पार्थ जान । तभी कर्मके चक्षु हैं ज्ञान । वह हो निर्दोष ॥ ३५० ॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥ वैसे देखें तो हे पार्थ । यज्ञोपहार समस्त । मेरे बिन कहो भोक्ता । कौन है अन्य ॥ ५१ ॥ सकल यज्ञका मैं आदि । इसका मैं ही हूं अवधि । किंतु मुझे छोड दुर्बुद्धि । भजते देवोंको ॥ ५२ ॥ गंगाजीको गंगोदक ही जैसे । देते हैं देव पितरोद्देश्यसे । देते हैं मेरा ही मुझको वैसे । भावसे अन्य ॥ ५३ ॥ यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम् ॥२५॥ इसीलिए सुन पांडुसुता । मुझे न मिलकर सर्वथा । दिया मनमें रख जो आस्था । वहीं गया ॥ ५४ ॥ भोक्ता मैं सब यज्ञोंका फलदायक भी स्वयं । न जाने तत्व जो मेरा गिरते हैं सदा वही ॥ २४ ॥ देवोंके भक्त देवोंसे पितृओंसे पितृ-पूजक । भूतोंके भक्त भूतोंसे मेरे जो मिलते मुझे ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २८०
मन-वचन करणसे अर्जुन । करता है जो देवार्पण भजन । शरीर त्यागकर वह तत्क्षण । पाता देव-लोक ॥ ५५ ॥ अथवा पितरोंके व्रत । आचरता जिनका चित्त । समाप्त होतेही जिवित । पाते पितृ-लोक ॥ ५६ ॥ या क्षुद्र देवतादि जो भूत । जिनके हैं परम दैवत । अभिचारसे जिनका चित्त । करता उपासना ॥ ५७ ॥ उनका शरीर जब गिरता । भूतत्वको वह प्राप्त करता । संकल्पवशतासे है फळता । उनका कर्म ॥ ५८ ॥ मैं उनका हो जाता हूं जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं - जिसने देखा मुझको ही आंखसे । जिसने सुना मुझको ही कानसे । मुझको ही प्रतीत किया मनसे । वाणीसे गाया ॥ ५९ ॥ अजी ! सर्वत्र सर्वांगसे । मुझे भजन पूजनसे । दान-पुण्य क्रिया भी उसे । मेरे ही हेतु ॥ ३६० ॥ जिन्होंने किया मेरा ही अध्ययन । अंदर बाहर मेरा ही चिंतन । मुझसे जुडा उनका जीवन । सर्व-भावसे ॥ ६१ ॥ धोते हैं वे सदैव अहंकार । हरि दास्यत्वका कर स्वीकार । उनका लोभ है एक आखर । केवल हरि-भक्ति ही ॥ ६२ ॥ जो मेरे ही काममें सकाम । मेरे ही प्रेममें सप्रेम । मेरे ही भ्रममें संभ्रम । जानता अन्य ॥ ६३ ॥ उनके शास्त्र मुझे ही जानते । उनके मंत्र मुझे ही जुडते । उनके तंत्र सदा ही करते । मेरा ही भजन ॥ ६४ ॥ आनेसे पहले वे मरण । ऐक्य हुए मुझसे अर्जुन । मर करके वे कौन स्थान । पाएंगे पार्थ ॥ ६५ ॥ इसीलिए जो मद्याजी हुए । मेरे ही सायुज्यमें वे आये । उपचारार्थ जिन्होंने दिये । अपने भाव ॥ ६६ ॥ २८१ राज-विद्या-समर्पणयोग (36)
वैभव-पूर्ण पूजासे मैं किसीका नहीं होता — मुझे क्या कम है ? — अजी ! आत्मार्पणके बिन । न भाता मुझे कुछ भिन्न । अन्य उपचारसे जान । मैं नहीं मिलता ॥ ६७ ॥ जाना कहता जो वह न जानता । संपन्नता दिखाना ही है न्यूनता । कृतार्थ हुआ मैं यह जो कहता । वह कुछ नहीं जान ॥ ६८ ॥ दान-यज्ञ-तपका जो अर्जुन । मनमें धरता है अभिमान । यहां यह सब तृण-समान । व्यर्थ जान तू ॥ ६९ ॥ जो है ज्ञानमें संपन्न । वेदसे बढ़के कौन । अचल शेष समान । कोयी है क्या ? ॥ ३७० ॥ शैयाके नीचे शेष छिपता । वेद नेति नेति है कहता । जहां ज्ञान भी है पगलाता । सनकादिकका ॥ ७१ ॥ तापसमें है कहां कौन । जो शूल-पाणीके समान । लेता है त्यज अभिमान । पद-जल सिरपे ॥ ७२ ॥ या ऐश्वर्यमें कौन । है लक्ष्मीके समान । है श्रियाके समान । घरमें दासी ॥ ७३ ॥ जिसके खेलका घरौंदा एक । कहलाता अमरावति नेक । तब हुए खिलौने इन्द्रादिक । उनके सब ॥ ३७४ ॥ जब वह तोड़ती अनचाह खेल । होते रंक इन्द्रादिक ले दल-बल । जिसके कटाक्षसे होते वृक्ष फल । सुरतरु दिव्य ॥ ७५ ॥ जिनकी दासियाँ विभिन्न । हैं इतनी शक्ति सम्पन्न । वह लक्ष्मी देवी महान । है यहाँ दासी ॥ ७६ ॥ करती वह सर्व भावसे सेवा । छोड़के अभिमान सब पांडव । तब कहीं चरण धोनेका दावा । पा सकी वह ॥ ७७ ॥ छोड़कर सब बड़प्पन । भूलकर व्युत्पत्ति सम्पूर्ण । होते हैं लघु अणु समान । पाते तब सामिप्य ॥ ७८ ॥ सहस्र करके समीप । चंद्रका भी होता है लोप । खद्योत करता प्रलाप । अपने प्रकाशका ॥ ७९ ॥ ज्ञानेश्वरी २८२
न चलती जहाँ लक्ष्मीकी महत्ता । तथा शिवका तप नहीं पुरता । घामड़ लोगोंका भला क्या चलता । वहाँ धनंजय ॥ ८० ॥ इसीलिए तन अर्पित कर । सकल गुण कर न्योछावर । संपत्ति-मद श्री-चरण पर । रख तत्पश्चात् ॥ ८१ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥ मुझे निष्काम प्रेम चाहिये-प्रेमसे दिया पत्ता भी मैं सुखसे खाता हूं— कर निःसीम भाव उल्लास । मेरे अर्पणका ले उद्देश्य । जो भी फल दिया स-संतोष । लेता हूँ मैं ॥ ८२ ॥ जब वह भक्त मुझे दिखाता । अपने हाथ मैं दोनों बढ़ाता । उसका डंठल भी न तोड़ता । खाता हूँ आदरसे ॥ ८३ ॥ किसीने शुद्ध भक्तिसे । दिया सुमन प्रीतिसे । खाता भावातिरेकसे । भूल सूंघना ॥ ८४ ॥ फल-फूल क्यों इक पात । सूखा भी हो उसका गात । लेता उसे मोदसे पार्थ । देते हैं जो भक्तिसे ॥ ८५ ॥ देख भरा वह सर्व-भावसे । भूखा तोषता जैसे अमृतसे । वैसा मैं मुखमें तोषसे उसे । डालता हूँ पार्थ ॥ ८६ ॥ अथवा ऐसा भी जब होगा । वह पात भी नहीं मिलेगा । पानीका बूंद एक तो होगा । उसे नहीं अकाल ॥ ८७ ॥ वह है सर्वत्र रहता । सबको सहज मिलता । उसीका अर्पण करता । सर्वस्व मान ॥ ८८ ॥ उसने बैकुण्ठके विशाल । बनाया मेरे लिए महल । कौस्तुभसे भी अति निर्मल । दिये अलंकार ॥ ८९ ॥ प्रेमसे पत्र या पुष्प फल या जल दे मुझे भक्तिसे जो दिया सारा खाता मैं सुख-पूर्वक ॥ २६ ॥ २८३ - राज-विद्या-समर्पणयोग
दूधके शैयागार । क्षीराब्धिसे सुन्दर । मेरे लिए अपार । दिये उसने ॥ ३९० ॥ कर्पूर चंदन अगरु । ऐसे सुगंध महामेरु । दी दीपमाल दिनकरु । उसने मुझे ॥ ९१ ॥ गरुड समान वाहन । सुरतरुके उपवन । काम धेनु बहु गोदान । उसने दिये ॥ ९२ ॥ अमृताम्भसे भी सरस । भक्तका जल-बिंदु लेश । लेकर पाता हूँ संतोष । धनंजय मैं ॥ ९३ ॥ कहना क्या है वह बात । जानता है तू यह पार्थ । सुदामाके चिउडेके हित । खोली गांठ ॥ ९४ ॥ केवल भक्ति ही मैं जानता । छोटा-मोटा वहां न कहता । भावका भूखा मैं रहता । अतिशय अर्जुन ॥ ९५ ॥ यहां है पत्र-पुष्प-फल-जल । भावार्पणका निमित्त केवल । आवश्यक है मुझको निष्कल । भक्ति तत्व सदैव ॥ ९६ ॥ इसलिए तू पांडुकुमार । अपनी बुद्धिको वशकर । अपने हृदयमें ही फिर । स्मरकर मुझको ॥ ९७ ॥ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥ जो सदैव मेरा स्मरण करता है वह सदैव मुक्त ही है— जो कुछ तू व्यापार करता । अथवा जो कुछ है भोगता । तथा यज्ञमें तू जो यजता । नाना विधिसे ॥ ९८ ॥ अथवा विशेष पात्रको दान । या सेवकको तू देता वेतन । तथा व्रत-तप आदि साधन । करेगा तू ॥ ९९ ॥ खाता जो होमना देता जो जो आचरता तप । जो भी कुछ करें कर्म कर तू मुझ अर्पण ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी २८४
क्रिया-जात जो संपूर्ण । होगा तुझसे अर्जुन । करना तू यह मान । है सब मदर्थ ॥ ४०० ॥ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥ जैसे अग्निकुंडमें पड बीज । अंकुर दशा खोता है सहज । वैसे अर्पित शुभाशुभ मुझ । न फलते कभी ॥ १ ॥ अनर्पित कर्म जब रहता । सुख दुःखमें वह फलता । उसके भोगार्थ आना पडता । नया जन्म लेकर ॥ २ ॥ है जो मदर्पित कर्म । पोंछता मरण-जन्म । करे जन्म-सह श्रम । अन्य सब नष्ट ॥ ३ ॥ यह है संन्यस्तकी युक्ति । सरल होती फल-प्राप्ति । आचरणमें इसे अति । शीघ्र ही लाना ॥ ४ ॥ इससे देह-बंध नहीं घडता । सुख-दुखाब्दिका संबंध न आता । सुखका है सुखमें ही ऐक्य होता । सहज-रूपसे ॥ ५ ॥ समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २६ ॥ पूछेगा पार्थ तू वह कैसा । सर्व भूतमें सदा एकसा । जहां नहीं आप पर ऐसा । भेद-भाव ॥ ६ ॥ जो सदा सर्वत्र मुझे देखते हैं वे सदेह मुक्त हैं, मद्रूप हैं— इस भांति मुझे जानकर । तोड कर्तृत्वका अहंकार । जीव-भावसे जो कर्मकर । भजते मुझको ॥ ७ ॥
जिससे तोडके सारे कर्म-बंध शुभाशुभ । साधके योग-संन्यास पायेगा मुक्त हो मुझे ॥ २८ ॥ सम मैं सब भूतोंसे प्रियाप्रिय न है मुझे । किंतु है मुझमें भक्त भक्तमें मैं बसा नित ॥ २९ ॥ २८५ राज-विद्या-समर्पणयोग
दीखते स्थित हैं देहमें । किंतु वे स्थिर हैं मुझमें । औ' मैं उनके हृदयमें । रहता संपूर्ण ॥ ८ ॥ संपूर्ण वटवृक्ष जैसे । बीजमें रहता है वैसे । तथा रहता बीज जैसे । वट-वृक्षमें ॥ ९ ॥ वैसे हमें और उन्हें परस्पर । बाहरको नामका ही है अंतर । किंतु अंतरमें जो वस्तु-विचार । हम हैं एक ॥ ४१० ॥ उधार लाये हुए अलंकार । चढाते हैं जैसे शरीर पर । वैसे धारण करता शरीर । उदास भावसे ॥ ११ ॥ परिमल ले गया जब पवन । डंडीमें रहता है तब सुमन । वैसे प्रारब्ध भोगके ही कारण । शरीर रहता है ॥ १२ ॥ अहंकार उनका संपूर्ण । हुआ है विलीन मद्भावन । मेरे ही अंदर है अर्जुन । स्थिर रूपसे वह ॥ १३ ॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥ प्रेम भावसे करता भजन । उसको फिर न मिलता तन । उसकी जातिकी नहीं अर्जुन । कोई बात ॥ १४ ॥ जो जिस क्षणसे भक्त बना उसी क्षणसे मेरा बना— देखें तो उसका पूर्व जीवन । सब ही दुराचारोंकी है खान । किंतु उसने है अब जीवन । बेचा है भक्तिको ॥ १५ ॥ मरण समयमें जैसी है मति । रहती है जैसी, वैसी ही गति । मिलती है यह जानके भक्ति । की है सर्व भावसे ॥ १३ ॥ पहले था रत दुराचार । सर्वोत्तम है पांडुकुमार । महापूरमें है डूबकर । मरा नहीं ॥ १७ ॥ कोयी बडा दुराचारी भजे मुझ अनन्य हो । मानना उसको साधु उसको शुभ निश्चयी ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी २८६
जीवन उसका इस किनारे आया । इसलिए डूबा हुआ भी व्यर्थ गया रहा ही ऐसा नहीं जो पाप किया । भक्तिके कारण ॥ १८ ॥ पहले था जो दुराचारी महान् । किंतु पश्चात्ताप तीर्थमें कर स्नान । मेरी शरणमें आया जो अर्जुन । सर्व भावसे ॥ १९ ॥ उसका है अब पवित्र कुल । अभिजात्य तथा अति निर्मल । जन्मका उसको मिला है फल । भक्तिके कारण ॥ ४२० ॥ उसने किया सब अध्ययन । तथा समस्त तप अनुष्ठान । अष्टांग-योग भी सुन अर्जुन । सिद्ध उसको ॥ २१ ॥ रहने दे अब यह पार्थ । जिसकी चाह है "मैं" सतत । कर्म-बंधनसे वह मुक्त । सर्वदा ही ॥ २२ ॥ मन-बुद्धि सब एक गांठमें । बांध कर दी वह पिटारीमें । वह पिटारी मेरे स्वरूपमें । रख दी धनंजय ॥ २३ ॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ स-समय वह मद्रूप होगा । चितमें तेरे यह भाव होगा । सदैव जो अमृतमें रहेगा । मरेगा कैसे ॥ २४ ॥ तभी रात्री कहलाती है । सूर्य जब नहीं होता है । भद्भक्ति बिन जो होता है । वह सब पाप ॥ २५ ॥ इसलिए उसका चित । रहता मुझमें सतत । तभी होता वह निश्चित । मद्रूप तत्वतः ॥ २६ ॥ जैसे दीपसे दीप है जलता । वहां पहला कौन न जानता । वैसे सदैव जो मुझे भजता । होता वह मैं ही ॥ २७ ॥ फिर मेरी ही नित्य-शांति । उसकी दशा वही कांति । जीवित रहता स-भक्ति । मेरे ही जीवसे ॥ २८ ॥ होगा जो शीघ्र धर्मात्मा शांति शाश्वत पाकर । जान निश्चित तू मेरे भक्तका नाश है नहीं ॥ ३१ ॥ २८७ राज-विद्या-समर्पणयोग
केवल शास्त्रीय भक्तिसे मेरी प्राप्ति नहीं होती— कहूँ कितना पुनः पुनः । वही वही फिर अर्जुन। नहीं होगी भक्तिके बिन । मेरी प्राप्ति ॥ २९ ॥ व्यर्थ है कुल अभिमान । व्यर्थ शास्त्राध्ययनभान । व्यर्थ है श्रेष्ठताका मान । लोभ-मात्र ॥ ४३० ॥ व्यर्थ है रूप अभिमान । व्यर्थ है तारुण्य यौवन । एक मेरे भावके बिन । व्यर्थका बतंगड ॥ ३१ ॥ भुट्टे लगे बहु धान विहीन । बसे नगर, पर हैं वीरान । उसका है कहो क्या प्रयोजन । वैसे ही पार्थ ॥ ३२ ॥ सरोवर बड़ा नीर विहीन । तथा दुखीसे दुखिका मिलन । बांझ लताका बहार सुमन । खिला वैसा ॥ ३३ ॥ वैसा मानो सकल वैभव । अथवा कुल-जाति-गौरव । वैसा ही देह स-अवयव । किंतु नहीं प्राण ॥ ३४ ॥ वैसी मेरी भक्ति बिन । व्यर्थ है सारा जीवन । अजी ! पृथ्विपे पाषाण । रहते वैसे ॥ ३५ ॥ हिंवारेका आच्छादन घन । त्यज देते हैं जैसे सज्जन । पुण्य करता अवहेलन । वैसे अभक्तको ॥ ३६ ॥ नीममें निंबौरिका बहार आया । जिससे कौवोंका ही सुकाल भया । वैसे भक्ति-हीनको ऐश्वर्य आया । दोष बढानेको ॥ ३७ ॥ परोसा खप्परमें षड्रसान्न । रखा चौराहे पर अपरान्ह । खायेगा उसको केवल श्वान । वैसे ही पार्थ ॥ ३८ ॥ वैसे भक्ति-हीनका जीवन । स्वप्नमें भी सुकृति-विहीन । संसार दुःखका आव्हान । केवल-मात्र ॥ ३९ ॥ व्यर्थ है कुलकी उत्तमता । अन्त्यजका भी तन मिलता । पशुका शरीर भी मिलता । शरीरके नामसे ॥ ४४० ॥ पकड़ा मगरने गजेन्द्रको । उसने स्मरण किया मुझको । व्यर्थ किया अपनी पशुताको । पाकर मद्रूप ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी २८८
मेरी भक्ति में कुल जाति आदिका बंधन नहीं—मुझे प्रेम चाहिये— आती लेनेमें लज्जा नाम । जो अधमोंमें अधमतम । ऐसी योनिमें जिन्होंने जन्म । लिया है अर्जुन ॥ ४२ ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम् ॥ ३२ ॥ जो हैं पापयोनिके मूढ । जैसे पत्थर सम जड । किंतु है मुझमें वे दृढ । सर्व भावसे ॥ ४३ ॥ वाणीमें जिनके मेरे आलाप । नयन भोगते मेरे ही रूप । मनमें सतत मेरा संकल्प । भरे रहते हैं ॥ ४४ ॥ मेरी कीर्ति-कथाके बिन । न करते अन्य श्रवण । जिनके सर्वांग-भूषण । मेरी सेवा ॥ ४५ ॥ ज्ञानका विषय वे न जानते । केवल मुझ एकको जानते । उन्हें ऐसा लाभ मिला तो जीते । नहीं तो मरण ॥ ४६ ॥ ऐसा हुआ जो सम्पूर्ण । सर्व-भाव कर अर्पण । जीवनका बना जीवन । मैं ही एक ॥ ४७ ॥ पाप योनिमें हुआ जनन । सुनके भी न हुआ पठन । तुलनामें उनका वज़न । मुझसे कम नहीं ॥ ४८ ॥ भक्ति संपन्नताके कारण । देव बने राक्षसोंसे हीन । मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ४९ ॥ किया प्रह्लादका अंगीकार । मेरे स्थानमें पांडुकुमार । प्रह्लाद कथामें साक्षात्कार । होता मेरा ही ॥ ४५० ॥ उसका है दैत्य-कुल आखर । इंद्रको नहीं वह अधिकार । यहां है भक्ति महिमा अपार । कुल-जातिकी नहीं ॥ ५१ ॥
करके आसरा मेरा भोले स्त्री-वैश्य-शूद्र भी । या पाप-योनिके जीव पाते हैं सुख शाश्वत ॥ ३२ ॥ (37) २८९ राज-विद्या-समर्पणयोग
राजाज्ञाके होते चार अक्षर । वह भी चामके टुकडे पर । वह टुकडा देता है अपार । वस्तु-मात्र ॥ ५२ ॥ आज्ञाके उन अक्षरके बिन । स्वर्ण-रजत भी प्रमाण-हीन । उस अक्षर चामके कारण । मिलते सर्व वस्तु ॥ ५३ ॥ उत्तमता तो तभी है । यथा सर्वज्ञता भी है । मन बुद्धि भारता है । जब मेरे प्रेमसे ॥ ५४ ॥ इसलिए कुल जाति वर्ण । ये सब ही हैं बिना कारण । मुझमें हैं अनन्य शरण । सार्थक एक ॥ ५५ ॥ मुझमें मिलनेके बाद कोयी भिन्नता नहीं रहती— जब किसी न किसी कारण । मन होता मद्रूपमें लीन । तब होता है पुर्णरूपेण । जाति कुलादि व्यर्थ ॥ ५३ ॥ तब तक नाले कहलाते । गंगामें जब नहीं मिलते । फिर मात्र गंगाजल होते । गंगारूप हो ॥ ५७ ॥ जैसे खदिर चंदनादि काष्ठ । तब तक भिन्न रहते स्पष्ट । यज्ञाहुति देने पर है नष्ट । भिन्नता सारी ॥ ५८ ॥ वैसे हैं क्षत्रिय वैश्य स्त्रियां । शूद्र अन्त्यजादि कहलाया । मुझमें विलय न हो गया । तब तक ही सब ॥ ५९ ॥ जाति कुल व्यक्ति फिर बनता शून्य । होता है जब चित्त मुझमें अनन्य । घुलते जैसे लवण कण सामान्य । सागरमें वैसे ॥ ४६० ॥ तब तक नदी नदोंका नाम रहता । वैसे ही पूर्व पश्चिम प्रवाह रहता । किंतु जब सागरमें मिल जाता । सब होता एकरूप ॥ ६१ ॥ लेकर कोयी न कोयी निमित्त । होता लय जब मुझमें चित्त । फिर होता है उसमें निश्चित । मद्रूप ऐसे ॥ ६२॥ अव्यभिचारी शत्रुतासे भी मेरी प्राप्ति होती है — तोडने हेतु पडा पारस पर । लोहेका घन उसे स्पर्श कर । होगा निश्चित ही सुवर्ण सत्वर । सहज-भावसे ॥ ६३ ॥ ज्ञानेश्वरी २९०
वृजांगनाएं प्रेमवश होकर । मनमें स्मरण कर निरन्तर । पार्थ वे सब मुझसे मिलकर । मद्रूप हो गयीं ॥ ३४ ॥ वैसे ही भयके करण । निशिदिन कर चिंतन । अखंड बैर धर मन । कंस चेद्यादि ॥ ६५ ॥ ममत्वसे भी भक्त मुझे मिलते हैं— आप्तत्वसे हैं पांडव । संगसे सब यादव । ममत्वसे वसुदेव । तथा अन्य भी सब ॥ ६६ ॥ नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार । भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुवा प्राप्त ॥ ६७ ॥ वृजांगनाओंको कामसे । कंसको भय संभ्रमसे । धातुक मनके धर्मसे । शिशुपालादिकको ॥ ६८ ॥ सब पंथोंका एक स्थान । होना है मुझमें विलीन । सभक्ति विषय भंजन । या विराग वैसे ॥ ६९ ॥ इसलिए हे अर्जुन । होने मुझमें विलीन । उपायोंका जो बंधन । नहीं है कोई ॥ ४७० ॥ तथा किसी कुलमें होना जनन । करें प्रेम-वैर अथवा भजन । किंतु भक्त या शत्रु होना अर्जुन । एकमात्र मेरा ही ॥ ७१ ॥ किसी रूपमें सतत । होना है मुझमें रत । मद्रूप होना निश्चित । स्वाभाविक ॥ ७२ ॥ वैसे ही पाप योनी भी अर्जुन । क्षत्रिय वैश्य शूद्र औ' अंगना । भजकर मुझे मेरे सदन । पायेंगे ही ॥ ७३ ॥ वर्णमें हैं जो छत्र चामर । स्वर्ग है जिनका अग्रहार । मंत्र है जिनका मातृघर । वे हैं ब्राह्मण ॥ ७४ ॥ बसता जहाँ अखंड याग । तथा हैं जो वेदोंका वस्त्रांग । जिनकी दृष्टिका है उत्संग । बढाता मांगल्य ॥ ७५ ॥ जो हैं पृथ्वी तलके देव । तपावतार जो सवयव । सकल तीर्थोंका जो है दैव । उदित हुआ है ॥ ७६ ॥ २९१ राज-विद्या-समर्पणयोग
जिनकी आस्था है शीतल । बढाती सत्कर्मकी वेल । सत्य है जीवित केवल । उनके संकल्पसे ॥ ७७ ॥ किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥ सबके लिए मेरा द्वार खुला है— आशिर्वादसे उनके । बने आयुष्य अग्निके । दिया सिंधुने उनके । प्रेमसे नीर ॥ ७८ ॥ मैंने किया लक्ष्मीको कुछ दूर । लिया हाथ कौस्तुभ उठाकर । बढाया हृदय आगेकी ओर । चरण रजके लिए ॥ ७९ ॥ अब तक वह पद मुद्रा । हृदयपे धरी है सु-भद्र । अपने ही ऐश्वर्य समुद्र । रक्षा हेतु ॥ ४८० ॥ जिनका क्रोध है अर्जुन । कालाग्निका वसतिस्थान । उनका प्रसाद महान । देता सर्व-सिद्धि ॥ ८१ ॥ ऐसे पुण्य-पूज्य जो ब्राह्मण । मुझमें होते अति निपुण । होके नित मत्परायण । यह क्या कहना ? ॥ ८२ ॥ चंदन-वृक्षके समीप होनेसे । तथा उनके पवनके स्पर्शसे । निर्जीव नीम भी हुआ योग्यतासे । चढा प्रभु मस्तक पर ॥ ८३ ॥ फिर चंदन वहां न पहुंचेगा । इस बातको मन कैसे मानेगा । अथवा चंदन वहां पहुंचेगा । यह कहना पडे क्यों ? ॥ ८४ ॥ शीतलताकी अपेक्षा कर । महादेवने मस्तक पर । धारण किया जो निरंतर । अर्ध चन्द्र ही ॥ ८५ ॥ जहां शीतलतामें अप्रतिम । सुवासमें चंद्रसे भी उत्तम । ऐसा चंदन क्यों न सर्वोत्तम । लगायें सर्वांगपे ॥ ८६ ॥ वहां ब्रह्मर्षि राजर्षि इनकी बात क्या रही । भज तू मुझ आया है दुखी नश्वर लोकमें ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी २९२
रथ्योदक हो जहां गंगा-शरण । करते हैं सागरोदक वरण । वहां जान्हवीकी समरस पूर्ण । अन्य गति कैसी ॥ ८७ ॥ इसलिए राजऋषि हो या ब्राह्मण । उनकी गति मति मैं ही हूँ शरण । उनका त्रिशुद्धि पूर्वक है निर्वाण । स्थिति-गति मैं हूँ ॥ ८८ ॥ जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर मूर्खता-- बैठकरके शत-जर्जर नावमें । होता कैसे कहो निश्चित मनमें । या विवश हो जीना कैसे रणमें । शत संवत्सर ॥ ८९ ॥ पडता जहाँ पाषाण शरीर पर । न रखें ढाल कहो बीचमें क्योंकर । रहे कैसे उदास हो रोग-जर्जर । शरीर औषधसे ॥ ४९० ॥ भड़की जहां चहूं ओर आग । न जाय कैसे बचाकर भाग । कष्टमें नित न हो सानुराग । मुझे न भजे कैसे ॥ ९१ ॥ नहीं लगे मेरे भजनमें । ऐसा क्या सामर्थ्य है जनमें । विश्वास घरमें या भोगमें । है उनके ॥ ९२ ॥ या विद्याका या आयुका । ऐसा कौनसा प्राणियोंका । है मुझे न भजनेका । कहो सुखाधार ॥ ९३ ॥ मिलता है जितना भोग्य-जात । वह है केवल शरीर हित । ओ' शरीर रहता है सतत । मृत्युके मुखमें ॥ ९४ ॥ अजी ! दुःखका माल आयात होता । हाठमें मृत्युके तौलसे तुलता । उस मृत्युलोकमें आना पडता । अन्तिम हाठमें ॥ ९५ ॥ अब सुखका जीवित । कैसे मिले पांडुसुत । फूंककर राख जोत । जलेगी कैसे ॥ ९६ ॥ अजी ! विषकंद पीसकर । उसका रस निचोडकर । उसे नाम अमृत देकर । अमर हो कैसे ॥ ९७ ॥ ऐसे हैं विषयोंका सुख । केवल है परम दुःख । सेवन करते हैं मूर्ख । जीव भावसे ॥ ९८ ॥ २९३ राज-विद्या-समर्पणयोग
अथवा काटकर अपना शिर । करना पैर तलके उपचार । ऐसा है मृत्यु लोकका व्यवहार । भला है सतत ॥ ९९ ॥ मृत्युलोकमें कहानी सुखकी । श्रवण करना सभी व्यथाकी । जहाँ शैया ही अग्नि-स्फुलिंगकी । सुख-निद्रा कैसी ॥ ५०० ॥ क्षयरोगी होता चन्द्र जिस लोकका । अस्तार्थ उदय होता रवि जहांका दुःख आता है आवरणमें सुखका । छलनेके लिए ही ॥ १ ॥ जहां फूटते ही मांगल्यका अंकुर । पडते अमंगल कीट उसपर । पडता जहां मृत्यु पाश भयंकर । गर्भमें ही ॥ २ ॥ मिलना नहीं जो उसका चिंतन । मिले तो करते गंधर्व हरण । जाता उसका न होता आकलन । कहां और कैसे ॥ ३ ॥ अजी ! खोल जब सब ही पथ । लौटा पदचिह्न न देख पार्थ । मिलता सब मृतकोंका कथित । पुराणोंमें जहाँ ॥ ४ ॥ यहाँकी अनित्यताकी महती । ब्रह्मकी आयुतक पहुँचती । नश्वरताकी है कितनी व्याप्ति । स्वस्थ चित्त सुन तू ॥ ५ ॥ सुन ऐसे लोगोंका बर्ताव । जबसे जन्म लिये ये जीव । उनकी निश्चिंतता वैभव । कौतुकास्पद ॥ ६ ॥ जहां होता इह परका लाभ । वहां धरते कवडीका लोभ । तथा होता जहां विनाश सब । खरचते हैं करोडों ॥ ७ ॥ उलझता जो विषय भोगमें । सुखी कहलाता इस लोकमें । गडा जाता है जो महा-लोभमें । वह है महा-ज्ञानी ॥ ८ ॥ जिसका रहा अल्प जीवन । हुआ सब बल-बुद्धि जीर्ण । उसके पकडते चरण । वृद्ध कहकर ॥ ९ ॥ जैसा होता बालकका विकास । माता-पिता नाचते स-उल्लास । अंदरसे होता जीवन ह्रास । इसका नहीं खेद ॥ ५१० ॥ जो जन्मके दिवस दिवस-से । चलता मृत्यु दिशामें गतिसे । करते शुभोत्सव उल्लाससे । वृद्धि-दिवस मानकर ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी २९४
अजी ! मृत्यु यह शब्द न सहते । मरने पर जो रुदन करते । तथा आयुष्य व्यर्थ ही खोते । मूर्खताओंमें ॥ १२ ॥ निगलता है सांप मेंढकको । मेंढक जीभ चाटता है कीटकको । औ' प्राणि किस लोभसे किसको । बढाता तृष्णा ॥ १३ ॥ अजी ! यह है सब अनिष्ट । मृत्यु लोकका सब उलट । यहां अर्जुन तू अवघट । जन्म लिया है ॥ १४ ॥ तू इससे दूर रह कर मेरी भक्ति कर - तू हो दूर इससे अलग । मेरी भक्तिके पथमें लग । पायेगा तू जिससे अव्यंग । निजधाम मेरा ॥ १५ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥ मनको तू मद्रूप कर । मेरी भक्तिमें डूब कर । सर्वत्र कर नमस्कार । एक मुझको ॥ १६ ॥ मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब कुछ मुझे समर्पण करना - कर तू सतत मेरा अनुसंधान । उससे होगा संकल्प-बीज दहन । इसको कहते हैं भगवद्भजन । पांडुकुमार ॥ १७ ॥ होगा तू इससे मम-योग संपन्न । तब रहेगा मेरे स्वरूपमें लीन । यह मेरे अंतःकरणका वचन । कहा तुमसे ॥ १८ ॥ सबसे छिपाई बात । हुई अब तुझे प्राप्त । उससे हो तू सुखी शाश्वत । सदैव रहेगा ॥ १९ ॥ ऐसा श्याम-परब्रह्म । भक्त-वत्सल कल्पद्रुम । बोला है जो आत्माराम । कहता संजय ॥ ५२० ॥ प्रेमसे ध्यानसे नित्य भज तू पूज तू मुझे । ऐसे ही मिल आत्मामें मुझमें लीन होकर ॥ ३४ ॥ २९५ राज-विद्या-समर्पणयोग
कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते समय संजयकी मनस्थिति— अजी ! श्रवण किया क्या अपने। पूछा जब राजासे संजयने । मौन होके सुन लिया बूढेने । पानीमें पडे भैसेकासा ॥ २१ ॥ तब डुला संजय सहसा । मानो आज अमृत बरसा । किंतु होकर भी न होनासा । रहा यह बूढा ॥ २२ ॥ फिर भी यह हमारा दातार । मानके रहा स्वस्थ-स-आदर । इनका स्वभाव है मानकर । संजय मनमें ॥ २३ ॥ करके श्रीमुनि-व्यासने निमित्त । राजको सुनाना युद्धका वृत्तांत । किया मानो मेरा उद्धार निश्चित । हर्षाया संजय ॥ २४ ॥ दृढ कर अपना सायास । बोला वह इतना मानस । पुलक हो आये स-उल्लास । अष्ट-सिद्धि-भाव ॥ २५ ॥ भक्तिके अष्ट सिद्धि भाव— चकित हो भर आया है चित्त । लूली पडी वाचा हो प्रमुदित । आपाद मस्तक है कंचुकित । हुआ रोमांचसे ॥ २६ ॥ भये अर्धोन्मिलित नयन । वरस पडे आनंद घन । हुआ सकंप सारा बदन । अंतर्मुख भावसे ॥ २७ ॥ अजी ! संपूर्ण रोममूल । खिले स्वेदकण निर्मल । जैसे मोतिकी मणिमाल । बनी कंचुकिसी ॥ २८ ॥ महा सुखके अति-रससे ऐसा । मिटने लगी जैसी जीवदशा । वहां श्री व्यासाज्ञाका भान कैसा । रहेगा भला ॥ २९ ॥ इतनेमें कृष्णार्जुनके वचन । गूंजने लगे श्रवणोंमें महान । लौटा लाया वह शरीरका भान । संजयका तब ॥ ५३० ॥ ध्यान देनसे आनंद-सिंहासन पर चढते ?— पोंछा तब नयन जल । तथा स्वेद बिंदु निर्मल । मुखसे निकले ये बोल । श्रीमान् सुनिये जी ॥ ६१ ॥ ज्ञानेश्वरी २९६
पड़ेगे अब कृष्णार्जुन वाक्य बीज । सात्विक भाव-युत चित्तमें सहज । खिलेगा प्रेम-प्रमेयका बाग आज । श्रोताओंके लिए ॥ ३२ ॥ अजी ! देना अब अवधान । चढना आनंद सिंहासन । देवने डाली माला श्रवण- । इंद्रियको आज ॥ ३३ ॥ विभूतियोंका अब महाज्ञान । देगा अर्जुनको सिद्ध श्रीकृष्ण । सुनिये ज्ञानदेवका कथन । जो है निवृत्तिका दास ॥ ३४ ॥ गीता श्लोक ३४ ज्ञानेश्वरी ओवी ५३४- ॐ (38)
१० विभूति-चिंतनयोग श्री गुरु निवृत्तिनाथका आध्यात्मिक स्वरूप विश्वबोधविदग्ध । विद्यारविंद-प्रबोध । पराप्रमेय-प्रमद- । विलासिया नमो ॥ १ ॥ संसारतमका तू सूर्य । अप्रतिम परम-वीर्य । नमो तरुण-तर-तूर्य । लालनलीला ॥ २ ॥ जगदखिल-पालन । मंगलमणि-निधान । स्वजन-वन-चंदन । नमो आराध्यलिंग ॥ ३ ॥ चतुर-चित-चकोरचंद्र । आत्मानुभव-महानरेंद्र । श्रुतिगुणगण तू समुद्र । मन्मथ मन्मथ नमो ॥ ४ ॥ सुभाव-भजन-भाजन । तू भवेभ-कुंभ-भंजन । विश्व-उद्भवका भवन । नमो श्री गुरुदेव ॥ ५ ॥ श्री गुरुका सामर्थ्य— तेरा अनुग्रह श्री गणेश । देता है जो अपना स्वरस । तब सरस्वतीमें प्रवेश । होता है शिशुका ॥ ६ ॥ आश्वासन उदार देयका । जलाता दीप नव-रसका । थाह लगाता तब वाणीका । अनायास ॥ ७ ॥
तेरा ही स्नेह वागीश्वर। कर गूंगेका अंगीकार। स्पर्धा बाहस्पतिसे कर। जीतता वह ॥ ८ ॥ पडती दृष्टि तेरी जिस पर। रखता तू सिरपे पद्मकर। करता वह जीव होने पर। समानता शिवसे ॥ ९ ॥ श्री गुरुका अवर्णनीय - महिमा - जिसकी महिमांका यह करना। वाचालतासे वर्णन क्या करना। सूर्यको कैसे उबटन लगाना। चमकाने को ॥ १० ॥ कल्पतरुके फलका कैसे बहार । क्षीरसागरका कैसा पाहुनाचार । अन्य किस गंधकी अपेक्षा कर्पूर । सुवासित करनेमें ॥ ११ ॥ चंदनको किसका उबटन । अमृतका कैसे करें पक्वान । कैसे बांधे गगनपे भवन । कहो मुझसे ॥ १२ ॥ वैसे श्री गुरुका महिमान । आकलनका क्या है साधन । यह जानके किया नमन । मैंने चुपचाप ॥ १३ ॥ बुद्धिकी संपन्नता पर समर्थ । श्री गुरु-वर्णन करना यथार्थ । मोति पर पानी चढाना है सार्थ । अभ्रकका वैसे ॥ १४ ॥ स्वर्ण पर रौप्यका पानी चढाना । वैसा है श्रीगुरुका स्तवन गाना । स-मौन श्री-चरणपे नत होना । यही भला है ॥ १५ ॥ गीताकी यह धरोहर श्री गुरु-कृपाका फल है— अजी ! श्रीगुरु परम उदार । कृपा-दृष्टी रखते हम पर । तभी कृष्णार्जुन संगम पर । प्रयाग बने हम ॥ १६ ॥ मांगा जब दूध घूंट भर । बना क्षीरसागर कटोर । सम्मुख रखता है शंकर । उपमन्युके वैसे ॥ १७ ॥ अथवा जैसे वैकुंठनायक । रिझाया ध्रुव जब स-कौतुक । रीझाया ध्रुवपद भातुक । समझाके वैसे ॥ १८ ॥ ब्रह्मविद्याका जो राजा महान । सकल शास्त्रका बसति स्थान । ओवियोंमें भगवद्गीता गान । संभव किय ॥ १९ ॥ २९९ विभूति-चिंतनयोग