भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते समय संजयकी मनस्थिति— अजी ! श्रवण किया क्या अपने। पूछा जब राजासे संजयने । मौन होके सुन लिया बूढेने । पानीमें पडे भैसेकासा ॥ २१ ॥ तब डुला संजय सहसा । मानो आज अमृत बरसा । किंतु होकर भी न होनासा । रहा यह बूढा ॥ २२ ॥ फिर भी यह हमारा दातार । मानके रहा स्वस्थ-स-आदर । इनका स्वभाव है मानकर । संजय मनमें ॥ २३ ॥ करके श्रीमुनि-व्यासने निमित्त । राजको सुनाना युद्धका वृत्तांत । किया मानो मेरा उद्धार निश्चित । हर्षाया संजय ॥ २४ ॥ दृढ कर अपना सायास । बोला वह इतना मानस । पुलक हो आये स-उल्लास । अष्ट-सिद्धि-भाव ॥ २५ ॥ भक्तिके अष्ट सिद्धि भाव— चकित हो भर आया है चित्त । लूली पडी वाचा हो प्रमुदित । आपाद मस्तक है कंचुकित । हुआ रोमांचसे ॥ २६ ॥ भये अर्धोन्मिलित नयन । वरस पडे आनंद घन । हुआ सकंप सारा बदन । अंतर्मुख भावसे ॥ २७ ॥ अजी ! संपूर्ण रोममूल । खिले स्वेदकण निर्मल । जैसे मोतिकी मणिमाल । बनी कंचुकिसी ॥ २८ ॥ महा सुखके अति-रससे ऐसा । मिटने लगी जैसी जीवदशा । वहां श्री व्यासाज्ञाका भान कैसा । रहेगा भला ॥ २९ ॥ इतनेमें कृष्णार्जुनके वचन । गूंजने लगे श्रवणोंमें महान । लौटा लाया वह शरीरका भान । संजयका तब ॥ ५३० ॥ ध्यान देनसे आनंद-सिंहासन पर चढते ?— पोंछा तब नयन जल । तथा स्वेद बिंदु निर्मल । मुखसे निकले ये बोल । श्रीमान् सुनिये जी ॥ ६१ ॥ ज्ञानेश्वरी २९६