भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अजी ! मृत्यु यह शब्द न सहते । मरने पर जो रुदन करते । तथा आयुष्य व्यर्थ ही खोते । मूर्खताओंमें ॥ १२ ॥ निगलता है सांप मेंढकको । मेंढक जीभ चाटता है कीटकको । औ' प्राणि किस लोभसे किसको । बढाता तृष्णा ॥ १३ ॥ अजी ! यह है सब अनिष्ट । मृत्यु लोकका सब उलट । यहां अर्जुन तू अवघट । जन्म लिया है ॥ १४ ॥ तू इससे दूर रह कर मेरी भक्ति कर - तू हो दूर इससे अलग । मेरी भक्तिके पथमें लग । पायेगा तू जिससे अव्यंग । निजधाम मेरा ॥ १५ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥ मनको तू मद्रूप कर । मेरी भक्तिमें डूब कर । सर्वत्र कर नमस्कार । एक मुझको ॥ १६ ॥ मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब कुछ मुझे समर्पण करना - कर तू सतत मेरा अनुसंधान । उससे होगा संकल्प-बीज दहन । इसको कहते हैं भगवद्भजन । पांडुकुमार ॥ १७ ॥ होगा तू इससे मम-योग संपन्न । तब रहेगा मेरे स्वरूपमें लीन । यह मेरे अंतःकरणका वचन । कहा तुमसे ॥ १८ ॥ सबसे छिपाई बात । हुई अब तुझे प्राप्त । उससे हो तू सुखी शाश्वत । सदैव रहेगा ॥ १९ ॥ ऐसा श्याम-परब्रह्म । भक्त-वत्सल कल्पद्रुम । बोला है जो आत्माराम । कहता संजय ॥ ५२० ॥ प्रेमसे ध्यानसे नित्य भज तू पूज तू मुझे । ऐसे ही मिल आत्मामें मुझमें लीन होकर ॥ ३४ ॥ २९५ राज-विद्या-समर्पणयोग