ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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क्रिया-जात जो संपूर्ण । होगा तुझसे अर्जुन । करना तू यह मान । है सब मदर्थ ॥ ४०० ॥ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥ जैसे अग्निकुंडमें पड बीज । अंकुर दशा खोता है सहज । वैसे अर्पित शुभाशुभ मुझ । न फलते कभी ॥ १ ॥ अनर्पित कर्म जब रहता । सुख दुःखमें वह फलता । उसके भोगार्थ आना पडता । नया जन्म लेकर ॥ २ ॥ है जो मदर्पित कर्म । पोंछता मरण-जन्म । करे जन्म-सह श्रम । अन्य सब नष्ट ॥ ३ ॥ यह है संन्यस्तकी युक्ति । सरल होती फल-प्राप्ति । आचरणमें इसे अति । शीघ्र ही लाना ॥ ४ ॥ इससे देह-बंध नहीं घडता । सुख-दुखाब्दिका संबंध न आता । सुखका है सुखमें ही ऐक्य होता । सहज-रूपसे ॥ ५ ॥ समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २६ ॥ पूछेगा पार्थ तू वह कैसा । सर्व भूतमें सदा एकसा । जहां नहीं आप पर ऐसा । भेद-भाव ॥ ६ ॥ जो सदा सर्वत्र मुझे देखते हैं वे सदेह मुक्त हैं, मद्रूप हैं— इस भांति मुझे जानकर । तोड कर्तृत्वका अहंकार । जीव-भावसे जो कर्मकर । भजते मुझको ॥ ७ ॥
जिससे तोडके सारे कर्म-बंध शुभाशुभ । साधके योग-संन्यास पायेगा मुक्त हो मुझे ॥ २८ ॥ सम मैं सब भूतोंसे प्रियाप्रिय न है मुझे । किंतु है मुझमें भक्त भक्तमें मैं बसा नित ॥ २९ ॥ २८५ राज-विद्या-समर्पणयोग