भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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दीखते स्थित हैं देहमें । किंतु वे स्थिर हैं मुझमें । औ' मैं उनके हृदयमें । रहता संपूर्ण ॥ ८ ॥ संपूर्ण वटवृक्ष जैसे । बीजमें रहता है वैसे । तथा रहता बीज जैसे । वट-वृक्षमें ॥ ९ ॥ वैसे हमें और उन्हें परस्पर । बाहरको नामका ही है अंतर । किंतु अंतरमें जो वस्तु-विचार । हम हैं एक ॥ ४१० ॥ उधार लाये हुए अलंकार । चढाते हैं जैसे शरीर पर । वैसे धारण करता शरीर । उदास भावसे ॥ ११ ॥ परिमल ले गया जब पवन । डंडीमें रहता है तब सुमन । वैसे प्रारब्ध भोगके ही कारण । शरीर रहता है ॥ १२ ॥ अहंकार उनका संपूर्ण । हुआ है विलीन मद्भावन । मेरे ही अंदर है अर्जुन । स्थिर रूपसे वह ॥ १३ ॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥ प्रेम भावसे करता भजन । उसको फिर न मिलता तन । उसकी जातिकी नहीं अर्जुन । कोई बात ॥ १४ ॥ जो जिस क्षणसे भक्त बना उसी क्षणसे मेरा बना— देखें तो उसका पूर्व जीवन । सब ही दुराचारोंकी है खान । किंतु उसने है अब जीवन । बेचा है भक्तिको ॥ १५ ॥ मरण समयमें जैसी है मति । रहती है जैसी, वैसी ही गति । मिलती है यह जानके भक्ति । की है सर्व भावसे ॥ १३ ॥ पहले था रत दुराचार । सर्वोत्तम है पांडुकुमार । महापूरमें है डूबकर । मरा नहीं ॥ १७ ॥ कोयी बडा दुराचारी भजे मुझ अनन्य हो । मानना उसको साधु उसको शुभ निश्चयी ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी २८६