ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 357, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवन उसका इस किनारे आया । इसलिए डूबा हुआ भी व्यर्थ गया रहा ही ऐसा नहीं जो पाप किया । भक्तिके कारण ॥ १८ ॥ पहले था जो दुराचारी महान् । किंतु पश्चात्ताप तीर्थमें कर स्नान । मेरी शरणमें आया जो अर्जुन । सर्व भावसे ॥ १९ ॥ उसका है अब पवित्र कुल । अभिजात्य तथा अति निर्मल । जन्मका उसको मिला है फल । भक्तिके कारण ॥ ४२० ॥ उसने किया सब अध्ययन । तथा समस्त तप अनुष्ठान । अष्टांग-योग भी सुन अर्जुन । सिद्ध उसको ॥ २१ ॥ रहने दे अब यह पार्थ । जिसकी चाह है "मैं" सतत । कर्म-बंधनसे वह मुक्त । सर्वदा ही ॥ २२ ॥ मन-बुद्धि सब एक गांठमें । बांध कर दी वह पिटारीमें । वह पिटारी मेरे स्वरूपमें । रख दी धनंजय ॥ २३ ॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ स-समय वह मद्रूप होगा । चितमें तेरे यह भाव होगा । सदैव जो अमृतमें रहेगा । मरेगा कैसे ॥ २४ ॥ तभी रात्री कहलाती है । सूर्य जब नहीं होता है । भद्भक्ति बिन जो होता है । वह सब पाप ॥ २५ ॥ इसलिए उसका चित । रहता मुझमें सतत । तभी होता वह निश्चित । मद्रूप तत्वतः ॥ २६ ॥ जैसे दीपसे दीप है जलता । वहां पहला कौन न जानता । वैसे सदैव जो मुझे भजता । होता वह मैं ही ॥ २७ ॥ फिर मेरी ही नित्य-शांति । उसकी दशा वही कांति । जीवित रहता स-भक्ति । मेरे ही जीवसे ॥ २८ ॥ होगा जो शीघ्र धर्मात्मा शांति शाश्वत पाकर । जान निश्चित तू मेरे भक्तका नाश है नहीं ॥ ३१ ॥ २८७ राज-विद्या-समर्पणयोग