ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन-वचन करणसे अर्जुन । करता है जो देवार्पण भजन । शरीर त्यागकर वह तत्क्षण । पाता देव-लोक ॥ ५५ ॥ अथवा पितरोंके व्रत । आचरता जिनका चित्त । समाप्त होतेही जिवित । पाते पितृ-लोक ॥ ५६ ॥ या क्षुद्र देवतादि जो भूत । जिनके हैं परम दैवत । अभिचारसे जिनका चित्त । करता उपासना ॥ ५७ ॥ उनका शरीर जब गिरता । भूतत्वको वह प्राप्त करता । संकल्पवशतासे है फळता । उनका कर्म ॥ ५८ ॥ मैं उनका हो जाता हूं जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं - जिसने देखा मुझको ही आंखसे । जिसने सुना मुझको ही कानसे । मुझको ही प्रतीत किया मनसे । वाणीसे गाया ॥ ५९ ॥ अजी ! सर्वत्र सर्वांगसे । मुझे भजन पूजनसे । दान-पुण्य क्रिया भी उसे । मेरे ही हेतु ॥ ३६० ॥ जिन्होंने किया मेरा ही अध्ययन । अंदर बाहर मेरा ही चिंतन । मुझसे जुडा उनका जीवन । सर्व-भावसे ॥ ६१ ॥ धोते हैं वे सदैव अहंकार । हरि दास्यत्वका कर स्वीकार । उनका लोभ है एक आखर । केवल हरि-भक्ति ही ॥ ६२ ॥ जो मेरे ही काममें सकाम । मेरे ही प्रेममें सप्रेम । मेरे ही भ्रममें संभ्रम । जानता अन्य ॥ ६३ ॥ उनके शास्त्र मुझे ही जानते । उनके मंत्र मुझे ही जुडते । उनके तंत्र सदा ही करते । मेरा ही भजन ॥ ६४ ॥ आनेसे पहले वे मरण । ऐक्य हुए मुझसे अर्जुन । मर करके वे कौन स्थान । पाएंगे पार्थ ॥ ६५ ॥ इसीलिए जो मद्याजी हुए । मेरे ही सायुज्यमें वे आये । उपचारार्थ जिन्होंने दिये । अपने भाव ॥ ६६ ॥ २८१ राज-विद्या-समर्पणयोग (36)