भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 345

मैं सूर्य बन तपता । शोषता औ' प्रकाशता । इंद्र बन मैं वर्षाता । आता सुकाल ॥ ९६ ॥ जब है अग्नि काष्ठ खाता । काष्ठ ही है अग्नि बनता । वैसे मरता व मारता । जानो स्वरूप मेरा ॥ ९७ ॥ जो जो दीखता है यहां मर्त्य । वह सब मेरा रूप खुत्य । तथा जो है सहज अमर्त्य । वह अविनाशी हूँ मैं ॥ ९८ ॥ अजी ! बहुत बोल क्या करना । सबही एक वाक्यमें जानना । सता·सत सार अनुभवना । मैं हूँ सब ॥ ९९ ॥ पुण्यकी समाप्तिके बाद पुनः मृत्यु-लोकमें— इसीलिए पार्थ मैं नहीं । ऐसा कछु है नहीं कहीं । प्राणियोंका दैव है कहीं । जो न देखें मुझको ॥ ३०० ॥ पानी बिन तरंग है सूखती । सूर्य बिन रश्मि न दीखती । न करते मद्रूपकी प्रतीति । है यह विस्मय ॥ १ ॥ भरा यह मुझसे बाहर भीतर । ढला है विश्व मुझसे ही ओर छोर । किंतु बीता है उनका कर्म-कठोर । कहते हैं मैं नहीं ॥ २ ॥ अमृत-कुण्डमें जो पडते । अपनेको निकाल कहते । ऐसोंको है क्या कह सकते । अप्राप्यको होता ऐसा ॥ ३ ॥ अन्नके लिए एक कौर । दौडता है अंध सत्वर । चिंतामणि ठुकराकर । अंधत्वमें ॥ ४ ॥ मिटती है जब ज्ञानमें आस्था । होती ऐसी अंधेकीसी अवस्था । करके न किया ऐसा सर्वथा । होता ज्ञानके बिन ॥ ५ ॥ अंधेको गरुड पंख मिलता । उसका क्या उपयोग होता । वैसे सत्कर्म सदा व्यर्थ जाता । ज्ञानके बिन ॥ ६ ॥ अजी ! देख तू यह अर्जुन । आश्रम-धर्मका आचरण । विधि-मार्गका देता शिक्षण । अपने आप ॥ ७ ॥ करनेसे सहज-यजन । होता है प्रसन्न वेदार्जन । क्रिया फल सह मूर्तिमान । आता सम्मुख ॥ ८ ॥ २७५ राज-विद्या-समर्पणयोग