भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसा हूँ मैं समर्थ । जो जगतका नाथ । औ' मैं हूँ साक्षीभूत । गगन जैसा ॥ ८५ ॥ यहां नाम रूपमें पूर्ण । बसा हुआ है अर्जुन । नाम रूपका अधिष्ठान । वह भी मैं हूँ ॥ ८६ ॥ जलका है जैसे कल्लोल । औ' कल्लोलमें होता जल । वैसे विश्वका मैं सकल । आधार भूत हूँ ॥ ८७ ॥ होता जो मेरा अनन्य शरण । उसका हरता जन्म मरण । शरणागतका शरण्य स्थान । मैं ही एक ॥ ८८ ॥ एक मैं अनेक रूप-धारण । कर ले प्रकृतिके भिन्न गुण । बन सजीव जगतके प्राण । रहता हूँ पार्थ ॥ ८९ ॥ डबरा सागर भेद न मान । सबमें बिंबता सूर्य समान । वैसे ब्रह्मादि भूतमें समान । सु-हृदयस्थ मैं ॥ २९० ॥ अजी ! मैं ही हूँ अर्जुन । त्रिभुवनका जीवन । सृष्टि क्षयका कारण । मूल जो मैं हूँ ॥ ९१ ॥ बीज ही शाखाओंको प्रसवता । वही वृक्ष बीजमें है समाता । वैसे संकल्पसे सब बनता । औ' समाता संकल्पमें ॥ ९२ ॥ विश्वका बीज जो है संकल्प । अव्यक्त तथा वासना रूप । उस संकल्पका है निक्षेप । अन्तमें मैं हूँ ॥ ९३ ॥ . यहां नाम-रूप मिटते । वर्ण औ' व्यक्ति है अटते । जातिके भेद भी खुलते । जब न होता आकाश ॥ ९४ ॥ संकल्प वासना संस्कार । फिर रचनेमें आकार । रहते हैं जहां अमर । वह स्थान मैं हूँ ॥ ९५ ॥ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ । तपके जलको खींच गिराता वृष्टि रूपसे । मृत्यु मैं और मैं मोक्ष मैं ही सत् और हूं असत् ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी २७४