भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

यह प्रकृति विषय संपूर्ण । सुना तूने पहले अर्जुन । इसीलिए कहता हूं सुन । अगली बात ॥ ९९ ॥ यह है मेरी प्रकृति । महा कल्पांतमें होती । ऐक्य-लीन भूत-जाति । मुझ अव्यक्तमें ॥ १०० ॥ ग्रीष्मके प्रखर तापमें । बीज सह दूब भूमिमें । ऐक्य होती पूर्ण रूपमें । धनुर्धर ॥ १ ॥ या वर्षा आडंबर मिटता । शरदका परदा खुलता । जैसे घन-जात लय होता । गगनका गगनमें ॥ २ ॥ अथवा आकाशका घर । नीरमें तरंग सुंदर । लोपता वायु औ' आकार । वैसे ही ॥ ३ ॥ तथा जागते ही जैसा स्वप्न । मनके मनमें होता लीन । प्राकृत प्रकृतिमें ही लीन । कल्पक्षयमें ॥ ४ ॥ जब फिर कल्पारंभ होता । कहते हैं मैं सृष्टि सृजता । इस विषयमें मैं कहता । सुन तू पार्थ ॥ ५ ॥ प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥ तब है यह जो प्रकृति । करती सहज स्वीकृति । तंतु समवाय दीखती । पटमें बुनायी जैसे ॥ ६ ॥ लेकर उस बुनायीका आधार । भरते वस्त्र बन छोटे चौकोर । प्रकृति पंचात्मक आकार । लेती है वैसे ॥ ७ ॥ लेकर जामूनका आधार । दूध लेता दहीका आकार । वैसे प्रकृति रूप सुंदर । लेती है सृष्टिका ॥ ८ ॥ बीज होता पानीके नजदीक । औ' वही होता शाखोपशाख । वैसा मेरा ही कारण देख । भूत जातका यह ॥ ९ ॥ प्रकृति हाथमें लेके जगाता मैं पुनः पुनः । भूतोंका संघ संपूर्ण प्रकृतिके अधीन जो ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी २५८