ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! आकाश होता जितना जैसा । पवन होता उतना ही औ' वैसा । हिलानेसे भास होता भिन्न ऐसा । नहीं तो उतना ही ॥ ८९ ॥ वैसे भूत मात्र मुझमें । भास होते हैं कल्पनामें । नहीं होता निर्विकल्पमें । वहां मैं ही सर्वत्र ॥ ९० ॥ नहीं औ' है यह कल्पनाका औरस । कल्पना लोपसे होता है वह अंश । कल्पनाके संग होता है भूताभास । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥ मिटती है जब कल्पना मूलतः । तब वहां है या नहीं यह जाता । इसलिये तू आगे यह देखता । ऐश्वर्य योग ॥ ९२ ॥ ऐसा है यह प्रति-बोध सागर । अपनेको कर उसकी लहर । तब तू देखेगा सब स-चराचर । आप ही है ॥ ९३ ॥ ज्ञान-जागृति अब अर्जुन । हुई न यह पूछते कृष्ण । अब तो भंग हो द्वैत-स्वप्न । है जो मिथ्या ॥ ९४ ॥ फिर तुझे यदि शायद । आएगी कल्पनाकी नींव । मिटेगा अभेदका बोध । पड़ेगा स्वप्न ॥ ९५ ॥ जिससे टूटेगा निद्राका पथ । उद्बोध-रूप हो आप पार्थ । कहता अब ऐसा गुपित । खोल करके ॥ ९६ ॥ इंद्रियोंके अंतर्मुख होनेसे ईश्वरका अनुभव आता है— तब हे धनुर्धर स-धैर्य । अवधान दे तू धनंजय । सब भूतोंको है यह माया । करती हरनी जो ॥ ९७ ॥ सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ जिसका नाम ही प्रकृति है । तुझसे जो द्विविध कही है । एक अष्ठधा भेद्युत है । दूसरी जीव रूप ॥ ९८ ॥ मेरी प्रकृतिमें सोते भूत कल्पांतमें सभी । जगाता सबको मैं ही कल्प-आरंभमें स्वयं ॥ ७ ॥ २५७ -राज-विद्या-समर्पणयोग (33)