ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे मृत्युके अवसरपर । बढता जो जीव सम्मुख आकर । उसमें ही चित्तका उलझकर । तद्रूप होना पड़ता ॥ ७२ ॥ जागृतिमें जिसकी लगन । करता मन उसका ध्यान । देखता वही निद्रामें स्वप्न । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मा मेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥ वैसे ही जीवनमें सतत । जीव रहता चावसे नित । जिसमें आसक्त वही बात । आती मृत्यु समय ॥ ७४ ॥ मरणमें जिसका जो स्मरण । उसकी होती वही गति जान । इसलिये कर सदा स्मरण । मेरा ही तू ॥ ७५ ॥ आंखोंसे जो देखना । कानोंसे जो सुनना । मनमें जो भावना । बोलना वाणीसे ॥ ७६ ॥ संपूर्ण हो अंदर बाहर । मद्रूप ये सभी व्यवहार । फिर सहज ही निरंतर । मै ही हूं ॥ ७७ ॥ अजी ! हुआ इस भांति ही जब । न मरता देह गिरा थी तब । संग्राम करने पर भी अब । भय रहा कहां ॥ ७८ ॥ मन बुद्धि तू संपूर्ण । मुझमें कर अर्पण । मद्रूप होगा तत्क्षण । प्रण है मेरा ॥ ७९ ॥ लीन हो जिसमें जीव अंतमें देह त्यागता । पाता है जो वही भाव जिसमें नित्य ही रत ॥ ६ तभी अखंड ही मेरा स्मरण कर जूझ तू । मन-बुद्धि मुझे देके पायेगा मुझ निश्चित ॥ ७ ॥ २२९ सातत्ययोग