ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेरे स्मरण-पूर्वक जो शरीर छोड़ता है वह मद्रूप होता है— अधियज्ञ कहते हैं जिसे। अभी कहा था तुझसे ऐसे। जीवनमें जो जानते उसे। औ' मरते समय भी ॥ ५९ ॥ शरीर एक झोल मानकर। अपनेमें ही आप होकर। मठ जैसे व्योमसे भर कर। रहता उसीमें ॥ ६० ॥ इस प्रतीतिके अंगनमें। निश्चलताके अंतःकक्षमें। सोते हैं सो विषयोंको उनमें। नहीं प्रवेश ॥ ६१ ॥ अंतर्वाह्य ऐसा ऐक्य भरा है। जो आप मद्रूप बन गया है। पंच-भूतोंका झोल उतरा है। अनजाने बाहर ही ॥ ६२ ॥ जीवनमें उभयत्व नहीं जिसके। मरणमें संकर कैसे जी उनके। तभी न हिले अनुभूति उदरके। निश्चय रूप जो ॥ ६३ ॥ वह है ऐक्य रससे ढली हुई। या नित्यता हृदयमें बसी हुई। या समरस-सिंधुसे धुली हुई। न होती जो मलिन ॥ ६४ ॥ मटका अथाह पानीमें डूब कर। जलसे भरकर अंदर बाहर। दैव गतिसे मानो टूटा वहीं पर। तब होगा क्या रीता ? ॥ ६५ ॥ या सांपने केंचुला उतारा। या किसीने कपडा उतारा। इससे टूटा क्या अंग सारा। या अवयव ॥ ६६ ॥ वैसा है भासमान शरीराकार। गिरता तब आत्मवस्तु अंतर। भरा है बोधसे जहां भरपूर। अपनेमें आप ॥ ६७ ॥ मुझे इस प्रकार। अंतमें जानकर। छोड़ते हैं शरीर। होते हैं मद्रूप ॥ ६८ ॥ इसलिये तू मेरे स्मरण पूर्वक युद्ध-रत हो जा— अथवा वैसे भी साधारण। जिसे स्मरता अंतःकरण। प्राप्त करता है जो मरण। तद्रूप होता ॥ ६९ ॥ कोई एक अकुलाहटसे। भागते हुए वायु-वेगसे। सहसा फिसलकर जैसे। गिरा कुएमैं ॥ ७० ॥ गिरनेसे पहले गिरनेसे-। बचानेका उपाय न होनेसे। . गिरना ही पड़ता है वैसे। किसी मनुष्यको ॥ ७१ ॥ ज्ञानेश्वरी २२८