ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकानोंके इन गवाक्षोंसे । शब्द-किरण प्रवेशसे । मन हुआ चमत्कृतिसे । चकित मेरा ॥ २०० ॥ चाहता मैं भावको जानना । कहनमें समयको खोना । कष्ट कर प्रभु निरूपण । कर तू सत्वर ॥ १ ॥ पीछेका कर अवलोकन । अगले पर रख नयन । स्व-इच्छाका भी कर दर्शन । पूछना चतुराइसे ॥ २ ॥ देख अर्जुनका चतुरपन । न कर मर्यादाका उल्लंघन । करता हृदयका आलिंगन । श्रीकृष्णके ॥ ३ ॥ कैसे पूछना है प्रश्न । रखकर अवधान । जानता यह अर्जुन । भली भांति ॥ ४ ॥ अर्जुनका है ऐसा पूछना । श्रीकृष्णका भाव समझाना । संजयको भाये ये वचन । कहेगा वह प्रेमसे ॥ ५ ॥ सुनो उस संवादको दे ध्यान । करूंगा देश भाषामें कथन । कानसे आगे करके नयन । जानेंगे वह ॥ ६ ॥ बुद्धि-जिव्हासे चखनेसे पूर्व अक्षर । देखकर नयन उनका अलंकार । अनुभवेंगे इंद्रिय अपरंपार । सुख संतोषको ॥ ७ ॥ जैसे मालतीका फूल । घ्राणसे है परिमल । लेनेसे पूर्व कोमल । सुख लेते नयन ॥ ८ ॥ वैसे है देशीका जो सौंदर्य । करायेगा इंद्रियसे राज्य । फिर करेगा वह प्रमेय- । सुधा-पान ॥ ९ ॥ जहां होती है वाचा मौन । वह करूंगा मैं कथन । यह ज्ञानदेव-वचन । जो हैं निवृत्ति-दास ॥ २१० ॥ गीता श्लोक ३० ज्ञानेश्वरी ओवी २१०.