ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहलाता यह जीव। जैसा इसका स्वभाव। इसे जान अधिदैव। पंचायतनका ॥ ३६ ॥ शरीर भाव रहित आत्मा अधियज्ञ -- यहां शरीर-ग्राममें जान। शरीर-भाव उपशमन । करता हूँ अधियज्ञ बन। पांडुकुमार ॥ ३७ ॥ यह सब मैं ही हूँ, अविद्याके कारण भिन्नता दीखती है— यहां अधिदैवाधिभूत। यह सब मैं हूँ समस्त। वंगयुत स्वर्ण जो नित। हीन होता जैसे ॥ ३८ ॥ फिर भी न मलता कांचन। नहीं होता वंगके समान। किंतु मिल वंगसे हीन। कहलाता है ॥ ३९ ॥ वैसे अधिभूतादि सब। अविद्या सहित हो तब। अलग मानते हैं जब। धनंजय ॥ ४० ॥ अविद्याका पटल उठता। भेद-भावका अंत है होता। और दोनोंका एक रूप होता। तो वे दो थे क्या ? ॥ ४१ ॥ सलौनी अलक लट एक। स्फटिक शिलातलमें रख। ऊपरसे उसे जब देख। लगती टुटी हुई ॥ ४२ ॥ जैसे अलक-लट हटायी। न जाने दरक कहां गयीं। अंक देकर की क्या जुड़ायी। स्फटिक-शिलाकी ॥ ४३ ॥ मूलकी वह जो अखंडित थी। केश-संगसे खंडित हुई थी। उसके हटनेसे ही आयी थी। मूल रूपमें ॥ ४४ ॥ ऐसा अहंभाव जब जाता। मूलमें रहती है एकता। जहां हो ऐसी वास्तविकता। वह अधियज्ञ मैं ॥ ४५ ॥ किंतु हमने अब तुझ। सकल-यज्ञ हैं कर्मज। कहा धरकर जो काज। मनमें पार्थ ॥ ४६ ॥ विश्राम जो जीव-जातिका। निधान नैष्कर्म्य-सुखका। प्रकट रूप मैं उसका। कहता पार्थ ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी २२६