ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अध्याय ६: आत्मसंयमयोग / ध्यानयोग
कहलाता यह जीव। जैसा इसका स्वभाव। इसे जान अधिदैव। पंचायतनका ॥ ३६ ॥ शरीर भाव रहित आत्मा अधियज्ञ -- यहां शरीर-ग्राममें जान। शरीर-भाव उपशमन । करता हूँ अधियज्ञ बन। पांडुकुमार ॥ ३७ ॥ यह सब मैं ही हूँ, अविद्याके कारण भिन्नता दीखती है— यहां अधिदैवाधिभूत। यह सब मैं हूँ समस्त। वंगयुत स्वर्ण जो नित। हीन होता जैसे ॥ ३८ ॥ फिर भी न मलता कांचन। नहीं होता वंगके समान। किंतु मिल वंगसे हीन। कहलाता है ॥ ३९ ॥ वैसे अधिभूतादि सब। अविद्या सहित हो तब। अलग मानते हैं जब। धनंजय ॥ ४० ॥ अविद्याका पटल उठता। भेद-भावका अंत है होता। और दोनोंका एक रूप होता। तो वे दो थे क्या ? ॥ ४१ ॥ सलौनी अलक लट एक। स्फटिक शिलातलमें रख। ऊपरसे उसे जब देख। लगती टुटी हुई ॥ ४२ ॥ जैसे अलक-लट हटायी। न जाने दरक कहां गयीं। अंक देकर की क्या जुड़ायी। स्फटिक-शिलाकी ॥ ४३ ॥ मूलकी वह जो अखंडित थी। केश-संगसे खंडित हुई थी। उसके हटनेसे ही आयी थी। मूल रूपमें ॥ ४४ ॥ ऐसा अहंभाव जब जाता। मूलमें रहती है एकता। जहां हो ऐसी वास्तविकता। वह अधियज्ञ मैं ॥ ४५ ॥ किंतु हमने अब तुझ। सकल-यज्ञ हैं कर्मज। कहा धरकर जो काज। मनमें पार्थ ॥ ४६ ॥ विश्राम जो जीव-जातिका। निधान नैष्कर्म्य-सुखका। प्रकट रूप मैं उसका। कहता पार्थ ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी २२६
वैराग्य और अभ्याससे अविद्या-मल दूर करो—अधियज्ञ वैराग्य ईंधनसे भरपूर । इंद्रियानल प्रज्वलित कर । विषय-द्रव्य आहुति देकर । उसमें तब ॥ ४८ ॥ वज्रासन धरातल बनाकर । आधार-मुद्रा-वेदिका रचकर । शरीर-मंडपका शोधन कर । अनंतर पार्थ ॥ ४९ ॥ कुंडमें संयमाग्निके । मंत्र-घोषसे युक्तिके । देना इंद्रिय-द्रव्यके । शाकल्य नित्य ॥ ५० ॥ फिर मन-प्राण तथा संयम । है हवन संप्रदाय संभ्रम । इससे तुष्ट करना निर्धूम । ज्ञानानल ॥ ५१ ॥ ऐसा यह सकल-साधन । ज्ञानाग्निमें करनेसे अर्पण । ज्ञेयमें लय होकर ज्ञान । ज्ञेय ही रहता ॥ ५२ ॥ इसका नाम अधियज्ञ । ऐसा बोला है जब सर्वज्ञ । तब पार्थने जो अति प्राज्ञ । जान लिया पूर्ण ॥ ५३ ॥ अंतकालकी स्थितिका वर्णन— जानकर यह बोले कृष्ण । कर रहा है न तू श्रवण । देख कृष्णका मुदित मन । खिल उठा पार्थ ॥ ५४ ॥ सन्तानकी तृप्तिसे तृप्त होना । या शिष्यकी पक्वतासे खिलना । जानते मात्र सद्गुरु महान । या जन्मदात्री ॥ ५५ ॥ तब खिल उठे सात्त्विक-भाव । नारायणमें नरसे भी पूर्व । किंतु समता-बुद्धिसे ही देव । संयत आप ॥ ५६ ॥ पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृत-कल्लोल । वैसे कोमल तथा सरल । बोले शब्द ॥ ५७ ॥ श्रोतृ-श्रेष्ठ तू अर्जुन । मेरी बात यह सुन । जलानेवाला जो ज्ञान । अलाता मायाको ॥ ५८ ॥ अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् यः प्रयाति सम्मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥ प्रयाण कालमें भी जो मेरे ही ध्यानमें रत । जाते हैं तजके देह मिलता मुझ निश्चित ॥ ५ ॥ २२७ सातत्ययोग
मेरे स्मरण-पूर्वक जो शरीर छोड़ता है वह मद्रूप होता है— अधियज्ञ कहते हैं जिसे। अभी कहा था तुझसे ऐसे। जीवनमें जो जानते उसे। औ' मरते समय भी ॥ ५९ ॥ शरीर एक झोल मानकर। अपनेमें ही आप होकर। मठ जैसे व्योमसे भर कर। रहता उसीमें ॥ ६० ॥ इस प्रतीतिके अंगनमें। निश्चलताके अंतःकक्षमें। सोते हैं सो विषयोंको उनमें। नहीं प्रवेश ॥ ६१ ॥ अंतर्वाह्य ऐसा ऐक्य भरा है। जो आप मद्रूप बन गया है। पंच-भूतोंका झोल उतरा है। अनजाने बाहर ही ॥ ६२ ॥ जीवनमें उभयत्व नहीं जिसके। मरणमें संकर कैसे जी उनके। तभी न हिले अनुभूति उदरके। निश्चय रूप जो ॥ ६३ ॥ वह है ऐक्य रससे ढली हुई। या नित्यता हृदयमें बसी हुई। या समरस-सिंधुसे धुली हुई। न होती जो मलिन ॥ ६४ ॥ मटका अथाह पानीमें डूब कर। जलसे भरकर अंदर बाहर। दैव गतिसे मानो टूटा वहीं पर। तब होगा क्या रीता ? ॥ ६५ ॥ या सांपने केंचुला उतारा। या किसीने कपडा उतारा। इससे टूटा क्या अंग सारा। या अवयव ॥ ६६ ॥ वैसा है भासमान शरीराकार। गिरता तब आत्मवस्तु अंतर। भरा है बोधसे जहां भरपूर। अपनेमें आप ॥ ६७ ॥ मुझे इस प्रकार। अंतमें जानकर। छोड़ते हैं शरीर। होते हैं मद्रूप ॥ ६८ ॥ इसलिये तू मेरे स्मरण पूर्वक युद्ध-रत हो जा— अथवा वैसे भी साधारण। जिसे स्मरता अंतःकरण। प्राप्त करता है जो मरण। तद्रूप होता ॥ ६९ ॥ कोई एक अकुलाहटसे। भागते हुए वायु-वेगसे। सहसा फिसलकर जैसे। गिरा कुएमैं ॥ ७० ॥ गिरनेसे पहले गिरनेसे-। बचानेका उपाय न होनेसे। . गिरना ही पड़ता है वैसे। किसी मनुष्यको ॥ ७१ ॥ ज्ञानेश्वरी २२८
वैसे मृत्युके अवसरपर । बढता जो जीव सम्मुख आकर । उसमें ही चित्तका उलझकर । तद्रूप होना पड़ता ॥ ७२ ॥ जागृतिमें जिसकी लगन । करता मन उसका ध्यान । देखता वही निद्रामें स्वप्न । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मा मेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥ वैसे ही जीवनमें सतत । जीव रहता चावसे नित । जिसमें आसक्त वही बात । आती मृत्यु समय ॥ ७४ ॥ मरणमें जिसका जो स्मरण । उसकी होती वही गति जान । इसलिये कर सदा स्मरण । मेरा ही तू ॥ ७५ ॥ आंखोंसे जो देखना । कानोंसे जो सुनना । मनमें जो भावना । बोलना वाणीसे ॥ ७६ ॥ संपूर्ण हो अंदर बाहर । मद्रूप ये सभी व्यवहार । फिर सहज ही निरंतर । मै ही हूं ॥ ७७ ॥ अजी ! हुआ इस भांति ही जब । न मरता देह गिरा थी तब । संग्राम करने पर भी अब । भय रहा कहां ॥ ७८ ॥ मन बुद्धि तू संपूर्ण । मुझमें कर अर्पण । मद्रूप होगा तत्क्षण । प्रण है मेरा ॥ ७९ ॥ लीन हो जिसमें जीव अंतमें देह त्यागता । पाता है जो वही भाव जिसमें नित्य ही रत ॥ ६ तभी अखंड ही मेरा स्मरण कर जूझ तू । मन-बुद्धि मुझे देके पायेगा मुझ निश्चित ॥ ७ ॥ २२९ सातत्ययोग
इसलिये मेरे स्मरणका अभ्यास कर- यह स्थिति होगी कैसे। यदि है संदेह वैसे। देख साधना कर ऐसे। तब दे दोष ॥८०॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८॥ अजी ! अभ्यास-योग बलसे। चितको जोड़ तू भलाईसे। लूला भी है उपाय बलसे। चढ़ता पहाड़ ॥८१॥ वैसे अभ्याससे निरंतर। परम-पुरुषकी मुहर। लगा चित पर फिर शरीर। रहे या ना रहे ॥८२॥ नाना वृत्तियोंमें जो डूबता। वह जब आत्मको वरता। तब तन रहता या न रहता। स्मरता कौन ॥८३॥ सरिता-प्रवाहके जो साथ। सागरसे मिलता सतत। वह जल देखता क्या बात। पीछे होता है क्या ? ॥८४॥ जैसे वह समुद्र बन जाता। वैसे चित्तका चैतन्य हो जाता। वहां जन्म-मरण ही मिटता। जो है घनानंद ॥८५॥ कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥९०॥ ब्रह्मका और योगका स्वरूप अस्तित्व जिसका आकार रहित। जन्म-मृत्यु बिन रहता सतत। वह है पूर्णत्वसे पूर्ण भरित। देखता पूर्ण ॥८६॥ जुटे अभ्यासमें चित्त न करें अन्य चिंतन । योगी निश्चित पाता है महा-पुरुष दिव्यको ॥ सर्वज्ञ कर्ता कवि जो पुराण है सूक्ष्मसे सूक्ष्म अचिंत्य रूप । आदित्य दीप्ती तमसे परे जो जगन्नियंता स्मरता सदा ही ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी २३०
गगनसे जो प्राचीन । परमाणुसे महीन । जिसका है सन्निधान । चलाता विश्व ॥ ८७ ॥ प्रसवता है जो सब । जीते हैं उससे सब । उटता तर्क भी सब । वह है अचिंत्य ॥ ८८ ॥ आगमें दीमक नहीं लगती । तेजमें जैसे रात नहीं आती । किंतु स्थूल-दृष्टि नहीं देखती । स्वरूप-तेज ॥ ८९ ॥ जो है सूर्यकणोंका निधान । ज्ञानियोंका नित्योदय जान । नहीं है जिसको अस्तमान । नाम-मात्र ॥ ९० ॥ प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ प्राप्त होते ही मरण-काल । स्थिर-चित्तसे है जो तत्काल । स्मरता परब्रह्म सकल । अव्यंग जान ॥ ९१ ॥ पद्मासनमें रख शरीर । उत्तराभिमुख बैठकर । हृदयमें सुख रखकर । सत्कर्मका ॥ ९२ ॥ अन्त: मिलनके मनो-धर्मसे । स्वरूप-प्राप्तिके अनुरागसे । आत्म मिलनके समारोहसे । मिलनेके लिये ॥ ९३ ॥ जो आकलन योगसे । सुषुम्ना-मध्यमार्गसे । निकले अग्नि-स्थानसे । ब्रह्मरंध्र ॥ ९४ ॥ वहां प्राण तथा चित्तका । भास होता है संबंधका । जहां है प्राण संचारछा । मूर्ध्याकाश ॥ ९५ ॥ मन-स्थिरतासे धरा हुआ । भक्ति-भावनासे भरा हुआ । योग-बलसे जो सधा हुआ । सज्ज होकर ॥ ९६ ॥ प्रयाण-काले स्थिर-चित्त होके सद्भक्तिसे निश्चल योग-युक्त । भ्रू-मध्यमें प्राण जो है टिकाता वह योगि पाता सु दिव्य-धाम ॥ १० ॥ २३१ सातत्ययोग
जड़ाजड़को घुलाता । भ्रूमध्यमें लय होता । घंटानाद लय होता। घंटा में ही वैसे ॥ ९७ ॥ अथवा ज्योति घटमें ढकी । न जाने क्या हुई है कबकी । ऐसी मृत्यू आती है उसकी । पांडुकुमार ॥ ९८ ॥ ऐसा होता है वह पर-ब्रह्म । परम-पुरुष जिसका नाम । ऐसा है वह मेरा निजधाम । स्वयं है वह होता ॥ ९९ ॥ यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ वेदोंको भी अगम्य ब्रह्म-पद प्राप्त करनेका साधना मार्ग- सकल-ज्ञानका अंत है जो ज्ञान । उस ज्ञानकी एक-मात्र खान अक्षर कहते उसे ज्ञानी-जन । धनुर्धर ॥ १०० ॥ आंधीमें न उड़ता जान । होता जैसे स्वयं-गगन । यदि हो वह जैसा घन । टिकता कैसे ॥ १ ॥ ज्ञानका विषय होनेसे । गुना गया जो ज्ञानसे । वृत्ति-ज्ञान लय होनेसे । कहा अक्षर सहज ॥ २ ॥ तभी वेद-विद् नर । कहते उसे अक्षर । प्रकृतिसे जो है पर । परमात्म-रूप ॥ ३ ॥ विषयोंको विष मानकर । इंद्रिय सबको शुद्ध कर । देह-वृक्ष सायाके अंदर । बैठे है शांत ॥ ४ ॥ इस भांतिसे जो विरक्त । देखते निरंतर पथ । निष्कामसे हैं अभिप्रेत । सर्वदा जो ॥ ५ ॥ गाते जिसे अक्षर वेद-वेत्ता विरक्त जाके जिसमें समाते । जो ब्रह्मचारी पद चाहते हैं तुझे कहूंगा वह तत्व-सार ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी २३२
उसके प्रेमसे साधक जन। साधते हैं ब्रह्मचर्य कठिन। इंद्रियोंपर करके शासन। कठोर नित्य ॥ ६ ॥ ऐसा जो महत्पद। दुर्लभ औ' अगाध। तट पर ही वेद। खडे अगम्य हो ॥ ७॥ ऐसा जिसका लय होता। वह स्वयं वह बनता। कैसा यह तुझे कहता। मैं फिर एक बार ॥ ८ ॥ अर्जुन कहता नारायण। यही पूछता था मेरा मन। सहज कृपा की सकरुण। कहिये जी ॥ ९॥ किंतु कहना अति ही सरल। बोले त्रिभुवन-दीप ये बोल। जानते हैं तेरा मन निर्मल। कहूंगा संक्षेपमें ॥ १० ॥ मनकी लत होती बहिर्मुख। उसको तोड़कर स्वाभाविक। करना है उसको अंतर्मुख। हृदय-तलमें ॥ ११ ॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥ बहिर्मुख मनको अंतर्मुख करनेकी साधना— किंतु तभी है यह घड़ता। जब संयमकी कड़ी लगाता। सर्व-द्वारमें अनवरत। निग्रहसे ॥ १२ ॥ स्वभावसे ही संयत मन। घर करता अन्तःकरण। टूटे जिसके कर-चरण। घर न छोड़ता वैसे ॥ १३ ॥ जब होता चित्त ऐसा स्थिर। तब कर प्राणका ओंकार। लाओ उसको मूर्ध्याकाशपर। सुषुम्ना मार्गसे ॥ १४॥ लय होता न होता आकाशमें। ऐसा धरना है उसे धारणामें। होता है मात्रात्रय अर्ध-बिंदुमें। तब विलीन ॥ १५॥ तब तो वह समीर। गगनमें कर स्थिर। ऐक्यमें जैसे ओंकार। लय कर बिंदुमें ॥ १६ ॥ रोकके इंद्रिय-द्वार जकड़े मन अंतर। तालूमें रखके प्राण करते योग-धारणा ॥ १२ ॥ (30) २३३ सातत्ययोग
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥ तब मिटता है ओं स्मरण । लय होता गगनमें प्राण । प्रणव अन्तमें पूर्ण घन । रहता तब ॥ १७ ॥ तभी प्रणवैक नाम । यह एकाक्षर ब्रह्म । वह मद्रूप परम । जपते हुए ॥ १८ ॥ जो छोड़ देता है तन । त्रिशुद्धि मुझमें लीन । नहीं उसे मेरे बिन । गति अन्य ॥ १९ ॥ मृत्यु समय असहाय स्थितिमें भगवत्स्मरण होगा क्या ?— अंतकालका स्मरण । करना सच अर्जुन । यह विचारता मन । कैसा होगा ॥ १२० ॥ इंद्रियां शिथिल होकर । जीवन-सुख डूब कर । मृत्यु-चिन्ह अंतर्बाहर । दीखने लगे ॥ २१ ॥ तब बैठ कर भला कौन । करेगा निरोध औ' धारण । कैसा करेगा अंतःकरण । स्मरण प्राणका ॥ २२ ॥ यदि ऐसा हो तेरा मन । संदेहात्मका तो अर्जुन । नित्य सेव्य मैं सेवालीन । होता हूं अंतमें ॥ २३ ॥ अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥ करें उंच ब्रह्म उच्चार मनमें स्मरते मुझे । ऐसे जो तनको त्यागे पाता है गति उत्तम ॥ १३ ॥ अनन्य चित्त जो नित्य सदैव सरता मुझे । लीन जो मुझमें योगी पाता है सुखसे मुझे ॥ १४ ॥ मुझमें मिलके पाये महात्मा मोक्ष-सिद्धि जो । दुःखका घर जो जन्म न पाते हैं अशाश्वत ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी २३४
जीवन भर जो मेरी सेवा करता है अंतकालमें मैं उसकी सेवामें आता हूँ— विषयोंको तिलांजलि देकर । प्रवृत्तिका जो निरोधकर । हृदयमें मद्रूप निरंतर । अनुभवते हैं । ॥ २४ ॥ उस अनुभवका जो भोग । कराता क्षुधा-तृषाका त्याग । वहां चक्षु आदिकी मांग । रहती कहां ॥ २५ ॥ ऐसे एकात्म हुए निरंतर । हृदयमें मुझसे मिलकर । समाते जो समरस हो कर । उपासनामें ॥ २६ ॥ होता जब उनका देहावसान । उनको करना है मेरा स्मरण । तब होता यदि मेरा आगमन । तो भक्तिका मूल्य ही क्या ? ॥ २७ ॥ अंतकालमें कोई दीन । पुकार करता रूदन । तब क्या उसके कारण । दौड़ना पड़ता मुझे ॥ २८ ॥ भक्तोंकी भी यदि यही स्थिति । तब गावें क्यों भक्तिकी महति । न करे संदेह-ग्रस्त मति । ऐसी तू अर्जुन ॥ २९ ॥ जिस समय वह स्मरता । उस समय मैं पहुंचता । यह बोझ भी नहीं सहता । मन मेरा ॥ १३० ॥ मान यह अपना ऋण । भक्तोंके प्रति प्रतिक्षण । सेवा करना है लक्षण । अंतमें मेरा ॥ ३१ ॥ संभवता व्याकुलताका भाव । अनुभवेगा सुकुमार देह । मान मैं देता हूं उनको गेह । आत्म-बोधका ॥ ३२ ॥ फिर देता मेरे स्मरणकी । छाया घनी सुशीलताकी । तथा-दृढ बुध्दि नित्यताकी । उसको मैं ॥ ३३ ॥ अंतकालमें व्याकुल । न होते भक्त सकल । आते अति सकुशल । मम धाममें ॥ ३४ ॥ उतारकर देहकी केंचुली । झाडकर अहंकारकी धूली । भिझकर सद्वासना मैं भली । अपनमें समरस करता ॥ ३५ ॥ भक्तोंको भी देह-भाव नहीं । देहमें रहते हुए कहीं । इसलिए देह त्यागमें ही । नहीं वियोग ॥ ३६ ॥ २३५ सातत्ययोग
तथा मेरा आना मरण कालमें । उनके लिये करना अपनेमें । ऐसा नहीं है वे जीवन-कालमें । हुए हैं समरस ॥ ३७ ॥ जैसे शरीरके सलीलमें । प्रतिबिंब अस्तित्व रूपमें । दीखती किंतु जोस्ना साथमें । होती चंद्रके ॥ ३८ ॥ ऐसा होता जो नित्य-युक्त । उसको मैं सुलभ नित । तभी देहांतमें निश्चित । मैं होता वह ॥ ३९ ॥ फिर क्लेश-तरुका झंझाड़ । तथा तापत्रयाग्निका कुंड । है मृत्यु-काकको दिया पिंड । उतारा हुआ ॥ १४० ॥ दुःखको जो है प्रसवता । महाभयको जो बढ़ाता । सकल दुःखका बनता । मूल-धन ॥ ४१ ॥ दुर्मतिका जो है मूल । तथा कु-कर्मका फल । व्यामोहका है केवल । स्वरूप ही ॥ ४२ ॥ संसारका है जो आसन । औ' विकारोंका महा-वन । सब व्याधियोंका है अन्न । परोसा हुआ ॥ ४३ ॥ जो है मृत्युका उच्छिष्ट । तृष्णा मानो मूर्तिमंत । जन्म-मरणका पथ । स्वभावसे ॥ ४४ ॥ भूलोंसे जो भरा हुआ । विकल्पका ढला हुआ । चौड़ है जो खुला हुआ । विच्छुओंका ॥ ४५ ॥ जो है व्याघ्रका क्षेत्र । पण्यांगनाका मैत्र । विषय-विज्ञान यंत्र । सुपूजित ॥ ४६ ॥ राक्षसकी करुणा-सा । शीतल विष-घूंट-सा । तस्करका विश्वास-सा । वह है दिखाऊ ॥ ४७ ॥ कोढ़ीका है जो आलिंगन । काल-सर्पका मृदुपन । तथा बहेलियाका गान । धनंजय ॥ ४८ ॥ शत्रु का अतिथि सत्कार । मानो दुर्जनका आदर । अथवा जो महा-सागर । अनर्थका ॥ ४९ ॥ स्वप्नका जो है देखा स्वप्न । मृगजल सिंचित वन । या धूम्रर-जका गगन । ढला हुआ ॥ १५० ॥ ज्ञानेश्वरी २३६
ऐसा है यह शरीर । जो मेरा रूप ले नर । हो गये हैं जो अपार । रूपमें मेरे ॥ ५१ ॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ ब्रह्म, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे मुक्त नहीं- वैसे ब्रह्मपद प्राप्त कर भी । न चुकता पुनरावृत्त कभी । किंतु मरने पर जैसा कभी । न दुखता पेट ॥ ५२ ॥ अथवा जैसे जगनेपर । नहीं डुबाता स्वप्नका पूर । वैसे मुझमें मिलने पर । न होता संसार लिप्त ॥ ५३ ॥ जगदाकारका शीर्ष-स्थान । चिर-स्थायित्वका है प्रधान । शिखर-सम ब्रह्म-भुवन । लोकाचलका ॥ ५४ ॥ उस सत्यलोकका है एक प्रहर । अमरेंद्रकी आयु भरपूर । उठती है पंगत दिनमें निरंतर । चौदह इंद्रोंकी ॥ ५५ ॥ सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिंयुगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥ बदलती जब युग चौकडी हजार । तब होता ब्रह्मदेवका दिवस भर । सब उलटती ऐसी ही और हजार । तब होती है रात्र ॥ ५६ ॥ यह है वहांका दिन-रात । जो देखते हैं वे भाग्यवंत । देखते हैं यह वे स्वर्गस्थ । चिरंजीव ॥ ५७ ॥ सुरगणोंकी क्या बात । देख इंद्रकी ही गत । होते जाते दिनरात । चौदह इंद्र ॥ ५८ ॥ ब्रह्मादि लोक जो सारे भेजते फिर जन्ममें । पुनर्जन्म नहीं होता मुझसे मिलके फिर ॥ १६ ॥ सहस्र युगका होता ब्रह्मका दिन एक है । रात भी दिन जैसी ही कालोपासक मानते ॥ १७ ॥ २३७ सातत्ययोग
ब्रह्मके जो आठ पहर । देखते हैं आंखभर । कहलाते यहां पर । अहोरात्रविद् ॥ ५९ ॥ अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ होता जब ब्रह्म-भुवनमें उदय । उसकी गणना होना अवश्यप्राय । ऐसे समय जो था अव्यक्तमें लय । होता व्यक्त विश्व ॥ १६० ॥ अंत होते ही दिनके चार प्रहर । सूखता है विश्वका आकार सागर । प्रातः समय होते ही वैसे ही फिर । उमड़ आता वह ॥ ६१ ॥ शरद्ऋतुके प्रवेशमें । समाते घन गगनमें । फिरसे आते ग्रीष्ममें । वही उमड़ ॥ ६२ ॥ वैसे उदयमें ब्रह्म-दिनके । उमड़ते ढेर भूत सृष्टिके । निमित्त हजार चौकड़ियोंके । मिटने तक ॥ ६३ ॥ जब रात्रीका समय आता । विश्व अव्यक्तमें लय होता । युग-सहस्रका तम जाता । होता विश्व उदय ॥ ६४ ॥ कही क्यों यह उपपत्ती । विश्व प्रलय औ' संभूती । ब्रह्म-भुवनमें जो होती । दिन-रातमें ॥ ६५ ॥ देख उसकी महानताका मान । है वही सृष्टि बीजका संकलन । पुनरावर्तनका अंतिम स्थान । दोनों ही आप ॥ ६६ ॥ त्रिभुवनमें जो धनुर्धर । उसीका है सब विस्तार । होता रचना चमत्कार । दिनोदयमें ॥ ६७ ॥ दिनमें व्यक्त होते हैं सभी भूत अव्यक्तसे । होते विलय रात्रीमें सभी अव्यक्तमें फिर ॥ १८ ॥ उठते मिटते सारे जीव संघ वही वही । दिनमें जन्म लेते हैं रातमें मरते वही ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी २३८
आते ही रात्रीका समय । होता है जो उसीमें लय । स्वभावसे ही स-समय । अपने आप ॥ ६८ ॥ वृक्ष जैसे लेते बीज रूप । मेघ लेते गगनका रूप । औ' अनेकत्व समाता आप । कहलाता जो साम्य ॥ ६९ ॥ परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥ इन सबसे अक्षर चैतन्य भिन्न है और वह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्राप्त होता है— सम-विषम वहां न दीखता कहीं । इसीलिये भूत यह भाषा भी नहीं । जैसे दूध ही बन जाता है दही । नाम रूप रहित ॥ ७० ॥ आकारका होते ही अभाव । जगतका मिटता जगत्व । किंतु जिससे होता है तत्त्व । वह रहता ही है ॥ ७१ ॥ इसका नाम सहज अव्यक्त । आकारमें होता है वही व्यक्त । यह होता है सापेक्ष सूचित । किंतु है एक ही ॥ ७२ ॥ पिघलाया स्वर्ण होता घन । घनके होते नाना भूषण । तब न रहता रूप घन । जब हो अलंकार ॥ ७३ ॥ घन अथवा भूषण । उसका मूल है स्वर्ण । जो व्यक्ताव्यक्त कारण । स्थिर-रूपसे ॥ ७४ ॥ न वह व्यक्त या अव्यक्त । न है नित्य न नाशवंत । दोनों भावोंसे जो अतीत । अनादि-सिद्ध ॥ ७५ ॥ यह जो विश्व हो कर है बसता । विश्व-नाश होकर भी न नासता । जैसे अक्षर पोंछनेसे न मिटता । बोध वैसा ॥ ७६ ॥ जैसे तरंग उठता गिरता । किंतु उदक अखंड रहता । वैसे भूत मात्रमें न नाशता । वह अविनाशी तत्व ॥ ७७ ॥ अव्यक्त दूसरा तत्व उस अव्यक्तसे परे । नाशसे सब भूतोंके रहे शाश्वत नित्य जो ॥ २० ॥ २३९ सातत्ययोग
पिघलते हैं आभूषण । न गलता उसका स्वर्ण । वैसे जीवाकारमें पूर्ण । मर्त्यमें जो अमर ॥ ७८ ॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥ पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥ उस चैतन्यकी व्यक्ताव्यक्तता — अव्यक्त कहनेसे सकौतुक । स्तुति न होती उसकी सार्थक । न आता मन-बुद्धिमें सम्यक । इसी लिये ॥ ७९ ॥ आकारत्व आनेपर जिसका । निराकारत्व न जाता उसका । आकार लोपसे भी नित्यताका । न होता लोप ॥ १८० ॥ इसीलिये उसे कहते हैं अक्षर । जिससे बोध होता है सविस्तर । न दीखता विस्तार उसके पार । उसका नाम परमगति ॥ ८१ ॥ किंतु मैं देहपुरमें संपूर्ण । रहता हूं निद्रस्तके समान । नहीं करता चलन वलन । न करता इसीलिये ॥ ८२ ॥ वैसे शरीरके कोई व्यापार । नहीं रुकते हैं धनुर्धर । दस इंद्रियोंके हैं व्यवहार । चलते अव्याहत ॥ ८३ ॥ अंतःकरणके चौराहे पर । लग रहा है विषय-बाजार । मिले सुख-दुखका राज कर । मिलता जीवको ही ॥ ८४ ॥ जैसे राजा सुखसे जब सोता । उसका राज-काज न रुकता । प्रजा-जन करते सहजता । अपनी इच्छासे ॥ ८५ ॥ वैसे बुद्धिका जानना । मनका है लेना-देना । इंद्रियोंका भी करना । तथा स्फुरण वायुका ॥ ८६ ॥ कहा अक्षर अव्यक्त वही है गति अंतिम । वही मेरा परं-धाम वहांसे लौटता नहीं ॥ २१ ॥ मिले अनन्य भक्तीसे पार्थ परं-पुरुष जो । जिसमें रहते जीव जिससे व्याप्त है जग ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी २४०
वैसे ही सब शरीराचार । न चलते चलते सुंदर । जैसे रविके न चलाकर । चलता त्रिलोक ॥ ८७ ॥ अर्जुन ! यह है ऐसा । शरीरमें निद्रित-सा । इसीलिये हैं पुरुष । कहते इसको ॥ ८८ ॥ तथा प्रकृति जो पतिव्रता । उसका है यह पत्नीव्रत । इसीलिये यह कहलाता । पुरुष है ॥ ८९ ॥ किंतु वेदोंका भी बहुश्रुतपन । देख न सकता इसका अंगन । होता यह गगनका आच्छादन । धनुर्धर ॥ ९० ॥ यह जानकर योगीश्वर । उसको कहते परम पर । जो है अनन्यगतिका घर । ढूंढकर आते हैं ॥ ९१ ॥ ऐसा यह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्रष्ट होता है— जिनका तन मन वचन । नहीं सुनता अन्य कथन । पकता एक निष्ठाका धान । इस खेतमें ॥ ९२ ॥ यह त्रैलोक्य ही पुरुषोत्तम । ऐसा सच्चा जिनका मनोधर्म । वह सदा आस्तिकोंका आश्रम । है धनंजय ॥ ९३ ॥ जो निर्गर्वियोंका मान । गुणातीतका है ज्ञान । सुखका है उपवन । निरिच्छोंका ॥ ९४ ॥ संतोषका परोसा जो पक्वान्न । अचित अनाथोंका मातृ-स्थान । भक्ति-नगरका पथ महान । सरल सुलभ ॥ ९५ ॥ यह एकेक कह कर । खोयें क्यों काल धनुर्धर । वहां जानेसे वह ठौर । होता है स्वयं ॥ ९६ ॥ जैसे हिम-शीतकी लहर । शीतल करता तप्त नीर । या सूर्य सम्मुख आ अंधार । होता प्रकाश ॥ ९७ ॥ वैसे संसार भी अर्जुन । पहुंचकर संपूर्ण । बनता है मोक्ष स्थान । अनायास ॥ ९८ ॥ अग्नि-कुंडमें जैसे जो आया । वह ईंघन ही अग्नि भया । चुनकर भी हाथ न आया । काष्ठपन फिर ॥ ९९ ॥ २४१ (31) साधकसंदेश
जैसे डली जो गूहकी । रूप न लेती ईखकी । बुध्दिमंत ले बुध्दिकी । कितनी थाह ॥ २०० ॥ अथवा लोहका कनक भया । यह पारसने सहज किया । फिर उसका लोहपन आया । यह असंभव ॥ १ ॥ घृत बनकर एक बार । असंभव फिर होना क्षीर । वैसे ही वह धाम पाकर । नहीं पुनरावर्तन ॥ २ ॥ ऐसा वह मेरा परम । निजधाम सर्वोत्तम । अंतःकरणका मर्म । कहता तुझसे ॥ ३ ॥ यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥ मृत्यु समयकी दो स्थितियां- इसको जाननेका प्रकार । अति सुलभ है इक और । देह त्यागके स-अवसर । पाते योगीजन ॥ ४ ॥ अकस्मात ऐसा भी घड़ता । अनवसर तन गिरता । तब है पुनः आना पड़ता । देहमें उन्हें ॥ ५ ॥ देह छोड़कर सकाल । ब्रह्म होते हैं वे तत्काल । देह छोड़कर अकाल । आते संसारमें ॥ ६ ॥ सायुज्य तथा पुनरावर्तन । वह है सब अवसराधीन । वह अवसर कहूं महान । तुझसे अब ॥ ७ ॥ अब तू सुन अर्जुन । मृत्यूके नशेमें जान । पांचों करते प्रयाण । अपनी राहसे ॥ ८ ॥ होता है प्रयाणकाल प्राप्त । न होती है बुद्धि भ्रम-ग्रस्त । तथा न होता सब विस्मृत । न डरता मन ॥ ९ ॥ किस काल गए। कैसे तजके देह साधक । आता है या न आता है कहता मैं सुनो अब ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी २४२
यह चेतन-वर्ग संपूर्ण । मरण कालमें भी नवीन । आकलनसे होता प्रसन्न । ब्रह्म बोधके ॥ २१० ॥ चैतन्य-वर्गका सचेतन । कालमें होता मरणासन्न । अग्नि-सहायतासे जान । संभव होता ॥ ११ ॥ हवा या पानीसे जब । बुझती है ज्योति तब । देखती क्यों दृष्टि कब । अपनी ही ॥ १२ ॥ वैसे देहावसानकी विषमतासे । देह भरता है अंतरबाह्य श्लेष्मसे । तेज बुझता तब अग्निका उससे । सहज धनुर्धर ॥ १३ ॥ न रहता जब प्राणका प्राण । न होता है चेतन्य अग्नि बिन । तब रहकर सतेज ज्ञान । क्या होगा शरीरमें ॥ १४ ॥ जब है शरीरका अग्नि जाता । केवल वह कीचड रहता । तनमें तब खोजता रहता । मृत्यु घटिका ॥ १५ ॥ पूर्व स्मरण जहां संपूर्ण । थाम लेता कालमें प्रयाण । शरीर त्यज ब्रह्म-निर्वाण । पाना स्वरूपमें ॥ १६ ॥ किंतु कीचमें देह श्लेष्मकी । फंसी तब शक्ति चेतनाकी । कैसी बात भूत-भविष्यकी । रहेगी स्मरण ॥ १७ ॥ अजी ! जीवन भरका अभ्यास । भूल गया अंतकालमें खास । जैसे थाथी देखते ही प्रकाश । बुझा हाथका ॥ १८ ॥ रहने दो यह सकल । ज्ञानको अग्नि ही है मूल । अग्निका ही है पूर्ण बल । प्रयाण कालमें ॥ १९ ॥ अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥ अंदर अग्नि-ज्योतिका प्रकाश । बाहर शुक्ल पक्ष औ' दिवस । तथा षण्मासोंमें कोई भी मास । उत्तरायणका ॥ २२० ॥ अग्निसे दिन शुक्लार्ध जोडके उत्तरायण । जाता जो जुडता ब्रह्म अंतमें ब्रह्म जानके ॥ २४ ॥ २४३ वाक्यप्रबोध
मृत्युसमयकी पहली स्थिति-चैतन्यप्रधान, प्रकाश प्रधान— ऐसे समय-योगमें नियत । होता है जिसका देहपात । जो ब्रह्म-विद करता प्राप्त । परमपद ॥ २१ ॥ सुन तू अब धनुर्धर । सामर्थ्य जो सु-अवसर । सरल मार्ग है स्वपुर । पहुंचनेका ॥ २२ ॥ अग्नि प्रथम पावरी । ज्योतिर्मयता दूसरी । तथा दिवस तीसरी । शुक्लपक्ष ॥ २३ ॥ तथा षण्मास उत्तरायण । वह है ऊपरका सोपान । पाते हैं सायुज्य-सिद्धिदिन । इससे योगी ॥ २४ ॥ उत्तम काल है बहुत । कहलाता अर्चिरा पथ । कहता हूं अकाल पार्थ । सुन तू अब ॥ २५ ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥ तम प्रधान मृत्यु समय— समयमें जब प्रयाणके । उभार आवे वात-श्लेष्मके । आवरण हो अंधःकारके । अंतःकरणपे ॥ २६ ॥ इंद्रियां होती जैसे काष्ठ । स्मृति होती भ्रममें नष्ट । मन होता है पथ भ्रष्ट । तथा घुटता प्राण ॥ २७ ॥ मिटता अग्निका अग्निपन । रहता है धूम्र ही संपूर्ण । जिसमें चेतनाकी घुटन । होती शरीरमें ॥ २८ ॥ जैसे चंद्रपर बादल । आता है घना औ' सजल । तब ना घना या उज्ज्वल । रहता प्रकाश ॥ २९ ॥ न मरता वह न सावध । जीवितसह पडता स्तब्ध । ऐसी आयु-कालकी मर्याद- । प्रतीक्षामें रहता ॥ २३० ॥ धूमसे रात कृष्णार्ध जोड़के दक्षिणायन । जाता जो लौटता पीछे पहुंचे चंद्र-लोकको ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २४४
जहां मन-बुद्धि-करण । डूबा धूम कुलावरण । वहां अनुभवका ज्ञान । डूबा जीवनका ॥ ३१ ॥ जहां हाथका भी जाता । वहां लाभकी क्या कथा । प्रयाणकाल अवस्था । होती ऐसे ॥ ३२ ॥ यहां देहमें ऐसी स्थिति । वहां कृष्ण पक्ष औ' रात । षण्मासमें घटिका आती । दक्षिणायनकी ॥ ३३ ॥ जब पुनरावर्तनका घर । प्रयाण समयमें जाता भर । तब स्वरूप-सिद्धि समाचार । सुने कौन ॥ ३४ ॥ ऐसा जिस योगीका शरीर पडता । योगी होनेसे चंद्रलोक ही मिलता । वहांसे फिर पुनरावर्तन होता । संसारमें ॥ ३५ ॥ कहा मैने अनाल अर्जुन । वह यही है इसको जान । धूम्रमार्ग पुनरावर्तन । यही है जो ॥ ३६ ॥ यहां वह अर्चिरामार्ग । चलता हुआ औ' सलग । सहज सुलभ सुभग । मोक्ष-दायक ॥ ३७ ॥ शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥ किंतु जो सद्रूप है वह किसी मार्गसे आय तो भी ब्रह्मपद पाता है - ये दो ऐसे अनादि पथ । सरल तथा टेढा पार्थ । तभी बताये मैंने सार्थ । तुझको अब ॥ ३८ ॥ क्यों कि मार्ग अमार्ग देखना । सच्चा झूठा यह जान लेना । हित अहित समझलेना । अपने हितार्थ ॥ ३९ ॥ कोई भली नांव छोडकर । कूदेगा क्या नदीके भीतर । तथा सीधी राह जानकर । चलेगा क्या कुपथ ॥ २४० ॥ जानता जो विष औ' अमृत । छोडता है क्या वह अमृत । वैसा कोई छोड सीधा पथ । चलें क्यों टेढा ॥ ४१ ॥ प्रकाश और अंधार दोनों मार्ग अनादि हैं । निस्तार करता एक घेरेमें एक डालता ॥ २६ ॥ २४५ आत्मबोध