भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 295

न जाने सब विषम आये कैसे । व्यर्थ ही चराचर रचते ऐसे । औ' प्रसव योनिके अनंत जैसे । दीखते प्रकार ॥ २६ ॥ यहां है जीव-भावके कोंपल । गगनातीत दीखते सकल । देखें तो इनके जन्मका मूल । वहां है शून्य ॥ २७ ॥ मूलमें कर्ता कोई दीखता नहीं । तथा कारण कुछ नहीं कहीं । किंतु कार्य आप रुकता ही नहीं । बढ़ता जाता ॥ २८ ॥ ऐसे कर्ताके बिन गोचर । अव्यक्तमें जो यह आकार । निपजता है यह व्यापार । उसका नाम कर्म ॥ २९ ॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥ बादलके समान जो बनता और बिगडता है वह अधिभूत — अब जो अधिभूत कहलाता । वह भी संक्षेपमें हूं कहता । जो है बनता और बिगड़ता । बादल जैसा ॥ ३० ॥ ऐसा व्यर्थ है अस्तित्व जिसका । न होता सहज-रूप जिसका । पांच मिल लाते रूप जिसका । धनुर्धर ॥ ३१ ॥ पंच भूतोंका आश्रय लेकर । उनके संयोगसे ले आकार । और वियोगमें है जाता मर । नाम रूपादिक ॥ ३२ ॥ अहंकारसे अलग-सा बना आत्मा ही अधिदैव— यह है अधिभूत कहलाता । पुरुष अधिदैव कहलाता । जो प्रकृति उपार्जित भोगता । भोग सर्व ॥ ३३ ॥ चक्षु है जो चेतनका । अध्यक्ष है इंद्रियोंका । वृक्ष संकल्प-पक्षिका । देहांतमें ॥ ३४ ॥ परमात्मा ही है जो किंतु भिन्न । है अहंकार निद्रामें मगन । इसीलिये स्वप्नमें होता खिन्न । अथवा प्रसन्न भी ॥ ३५ ॥ अधि-भूत विनाशी जो जीवत्व अधि-दैवत । अधि-यज्ञ स्वयं मैं हूं देहमें यज्ञ-पूत जो ॥ ४ ॥ २२५ सातत्ययोग (29)