भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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सभी साकार वस्तुओंमें ओतप्रोत अविनाशी-सत्त्व है ब्रह्म -- कहता है तब सर्वेश्वर । टूटे हुए हैं सब आकार । उसमें भी जो ठूंसने पर । टूटता नहीं ॥ १५ ॥ देखने पर बैसी उसकी सूक्ष्मता । शून्य किंतु शून्य नहीं है स्वभावता । गगनसे वह है छननेमें आता । जो है सूक्ष्मतम ॥१६॥ इस भांती यह विरल होकर । विज्ञान-पटमें भर हिलने पर । चूता नहीं जो वह पांडुकुमार । परब्रह्म है जान ॥ १७ ॥ सहज नित्यत्व है आध्यात्म तथा जो आकारके साथ । न जानता जन्मकी बात । आकार-लोपमें समस्त । न जानता नाश ॥ १८ ॥ जो है अपना ही सहजत्व । जिसको है ब्रह्मका नित्यत्व । यही है जो सहज-नित्यत्व । कहलाता अध्यात्म ॥ १९ ॥ बिना कर्ताके अव्यक्तमें दीखनेवाली हलचल कर्म है--- जैसे गगनमें निर्मल । न जाने कैसे किसी काल । उमड फैलते बादल । नाना रंगके ॥ २० ॥ उस विशुद्ध अमूर्तमें जैसे । महत्तत्त्वादि जो भूत भेदसे । ब्रह्मांडके विभिन्न अंकुरसे । फूटने लगते ॥ २१ ॥ निर्विकल्पके उस ऊसर पर । फूटता आदि संकल्पका अंकुर । फिर बनते जाते घने आकार । ब्रह्म-गोलके ॥ २२ ॥ देखनेसे एकेकके भीतर । भरा है बीजसे ही भरपूर । होने-जाने वाले जीवोंकी अपार । गणना ही नहीं ॥ २३ ॥ फिर उन ब्रह्मगोलकोंके जो अंशांश । जानते आदि संकल्प असम साहस । जिससे बढ़ती ही जाती है अनायास । सृष्टि सर्वत्र ॥ २४ ॥ पर एक ही है दूसरेके बिन । पर-ब्रह्म ही भर रहा संपूर्ण । यहां अनेकत्वका आया महान । पूर जैसा ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २२४