भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तथा कैसे किया नियतांतःकरण । प्रयाण-कालमें कैसे हो तव ज्ञान । वह कैसे कहो तुम मुझे श्रीकृष्ण । पूर्ण-रूपसे ॥ ५ ॥ ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु— कोई सोया घरमें चिंतामणिके । यदि योगसे ही अपने भाग्यके । बोल भी उसके बड़बड़ानेके । न जाते व्यर्थ ॥ ६ ॥ अर्जुनके शब्दके साथ । मनमें कहते हैं नाथ । “तूने पूछा यही उचित ।” सुन तू अब ॥ ७ ॥ शावक है अर्जुन कामधेनुका । आसरा है ऊपर कल्पतरुका । होना उसके मनोरथ सिद्धिका । आश्चर्य क्या ॥ ८ ॥ क्रोधसे देता प्रभु जिसको मार । उसको होता है ब्रह्म साक्षात्कार । जिसको देता वह सीख कृपाकर । उसको क्या न मिलेगा ॥ ९ ॥ जब होते हम श्रीकृष्ण-शरण । कृष्ण होता अपना अंतःकरण । तब अपना संकल्पका अंगन । भरता महा-सिद्धिसे ॥ १० ॥ किंतु ऐसा जो प्रेम । पार्थमें है निःसीम । तभी उसका काम । सदा फलता ॥ ११ ॥ इस कारण ही वह अनंत । जानकर उसका मनेरथ । भर रखता थाली पकवानयुत । ज्ञानान्नसे आप ॥ १२ ॥ आपत्य जब स्नेहसे दूर होता । भूख उसकी अनुभवती माता । नहीं तो क्या वह शब्दसे कहता । मुझे दूध दे री ॥ १३ ॥ कृपालू गुरुदेवके यहां । आश्चर्य नहीं इसका जहां । जाने दो यह प्रभुने वहां । कहा क्या सुनो ॥ १४ ॥ भगवान उवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥ श्री भगवानने कहा ब्रह्म अक्षर है श्रेष्ठ अध्यात्म निज-भाव जो । भूत-सृष्टि सजाता जो वह व्यापार कर्म है ॥ ३ ॥ २२३ सातत्ययोग

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