भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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उनका वह यत्न ही एक काल । देता समय पर-ब्रह्मका फल । पक्वतामें चूता रस पल पल । तब पूर्णताका ॥ ७६ ॥ कृतार्थतासे विश्व जब भरता । मिटती है अध्यात्मकी अपूर्णता । तथा कर्मका काम नहीं रहता । होता मन विलय ॥ ७७ ॥ उसकी ऐसा अध्यात्म लाभ । होता है सुन पुरुषर्षभ । उसका पूंजी हूं मैं सुलभ । इस उद्यममें ॥ ७८ ॥ साम्यके वृद्धिसे उसके । संधते व्यापार उसके । वहां दारिद्र्य जो द्वैतके । रहता नहीं ॥ ७९ ॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥ सब अधिभूत मुझको । प्रतीतिसे अधिदैवको । जिन्होंने जाना यथार्थको । धनंजय ॥ १८० ॥ अनुभवके ज्ञान बलसे । जानता मैं अधियज्ञ इसे । वह शरीरके वियोगसे । अकुलाता नहीं ॥ ८१ ॥ अन्यथा आयुष्य सूत्र जब टूटता । प्राणियोंका तब हृदय तड़पता । सजीवके चितमें भी युगांत आता । देखकर यह ॥ ८२ ॥ किंतु यह नहीं जाने कैसा । ज्ञानियोंका नहीं होता ऐसा । अंतकालमें भी वह सहसा । मुझे भूलते नहीं ॥ ८३ ॥ अन्यथा तू यह जान । ऐसे जो महा-निपुण । औ' युक्त अंतःकरण । योगी हैं वही ॥ ८४ ॥ सातवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत उपसंहार और आठवेकी भूमिका— तब यह शब्द कूपका तल । न पहुंचा पार्थ कर-कमल । पल एक पार्थ था उस काल । पिछडा हुआ ॥ ८५ ॥ अधिभूताधि दैवोंमें मुझे जो अधि-यज्ञमें । प्रयाण-कालमें भी जो जानते रह सावध ॥ ३० ॥ २१९ ज्ञान-विज्ञानयोग