भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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धृतिका जो प्रतिकूल रहता । आशा-रससे परिपुष्ट होता । नियमका अनादर करता । द्वंद्व-मोह ॥ ६८ ॥ असंतुष्टताकी मदिरा । मत्त होकर धनुर्धर । विकार स्त्री-सह संसार । करता विषयोंमें ॥ ६९ ॥ जिससे भाव-शुद्धिकी राह पर । फैलाये विकल्पके कांटे अपार । खुल जाते सब कुपथ दो चार । अप्रवृत्तिके ॥ ७० ॥ इसने प्राणि गड़बड़ाये । संसार खडियामें फंसाये । फिर डंडुकेसे पिटवाये । महा-दुःखके ॥ ७१ ॥ येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥ भाव-शुद्धिकी राह पर । विकल्प-शूल देखकर । नहीं आते जो लौट कर । बुद्धि-भ्रमसे ॥ ७२ ॥ थोडेसे जो मद्रूप होते हैं उनको अंतकालमें दुःख नहीं होता-- पगसे ही एक-निष्ठाके । शूलांकुरोंको विकल्पके । रौंध छोडे महा-पापके । वन-प्रांत ॥ ७३ ॥ सत्कर्मकी फिर दौड़-लगायी । मेरे सामिप्यकी मंजिल पायी । महा-विपत्तिसे जान बचायी । बटमारोंके ॥ ७४ ॥ जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥ सहज ही सोचने पर पार्थ । जन्म मरणकी मिटती कथा । इस भांतिके प्रयत्नोंमें आस्था । उत्पन्न होती ॥ ७५ ॥ गँवाये जिसने पाप अपने पुण्य कर्मसे । दृढतासे भजते वे द्वंद्व मोह हटाकर ॥ २८ ॥ जुटे मेरे सहारे जो जीतते जन्म मृत्युको । जानते ब्रह्म वे पूर्ण तथा अध्यात्म-कर्म भी ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१८