भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अजी ! सुन तू पांडुसुता । कामी न जीतता वनिता । वैसी मायामय सरिता । न तैरता जीव ॥ ९६ ॥ किंतु सरते सहज लीलासे । भजते मुझे जो सर्व भावसे । सूखा उनके इसी तीरसे । मायाका जल ॥ ९७ ॥ सद्गुरु मांझी उनके साथ । प्रतीतिका बल उनके हाथ । आत्म-निवेदनकी है सतेज । डांगी ही जो ॥ ९८ ॥ अहंभावका जो तजकर भार । विकल्प आंधीका झांका ढालकर । अनुराग जलावेगका उतार । लेकर टोह ॥ ९९ ॥ फिर लिया ऐक्यका आधार । उसे जोडा बोधका उतार । तब निवृत्तिका पैल-तीर । जीत लिया ॥ १०० ॥ उपरतिका चप्पू मारकर । सोऽहंभावका साम्य साधकर । फिर चले निवृत्ति तट पर । सहज भावसे ॥ १ ॥ इस उपायसे जो मेरे हुये । वे सब मेरी माया तर गये । ऐसे भक्त भी क्वचित ही भये । नहीं अधिक ॥ २ ॥ न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥ चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ सभी अहंकारकी भूत-चेष्टामें आते हैं— अन्य जन हैं जो अवांतर । अहंकारका भूत संचार । होनेसे विस्मृत निरंतर । आत्म-बोधसे ॥ ३ ॥ हीन मूढ दुराचारी मेग आश्रय छोड़के । भ्रात होकर मयासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ १५ ॥ भक्त चार सदाचारी भजते मुझको नित । ज्ञानी तथैव जिज्ञासू अर्थार्थी पार्थ विव्हल ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी २१०