ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 281, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता नियम-पटका विस्मरण । अधोगतिका रहता नहीं भान । किया जाता शास्त्र-निषिद्ध ही जान । अकार्य सब ॥ ४ ॥ क्यों किया शरीरका आश्रय । भूलकर ही मूल उद्देश्य । तदर्थ करणीय जो कार्य । छोडकर ॥ ५ ॥ इंद्रिय-ग्रामके चौराहेपर । अहं ममताके गप्पोंमें भर । विकारोंके समुदाय अपार । जुटाते रहते ॥ ६ ॥ दुःख-शोकके घावोंसे । प्रहारोंके विचारसे । बेभान माया-तमसे । ग्रस्त हैं जो ॥ ७ ॥ इसीलिये वे बिछुडे मुझसे । अन्य जो भजते चतुर्विधसे । उन्होंने आत्महित है जिससे । किया वृद्धिगत ॥ ८ ॥ चार प्रकारके मेरे भक्त --- पहला आर्त कहलाता । दूसरा जिज्ञासू बनता । तीसरा अर्थार्थी है होता । चौथा है जो ज्ञानी ॥ ९ ॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ दुःखी होनेसे भजता आर्त । जिज्ञासु भजता है ज्ञानार्थ । तीसरा है भजता अर्थार्थ । धनंजय ॥ ११० ॥ मत्प्रिय ज्ञानी भक्त— अब बात चौथेकी रही । उसको करणीय नहीं । वही एक भक्त है सही । ज्ञानी है जो ॥ ११ ॥ होता है जो ज्ञानके प्रकाशसे । मुक्त सदा भेदाभेद तमसे । रहता मद्रूप-समरससे । तथा भक्त भी जो ॥ १२ ॥ श्रेष्ठ है सबमें ज्ञानी नित्य-युक्त अनन्य जो । उसे मैं प्रिय अत्यंत वह भी प्रिय है मुझे ॥ १७ ॥ २११ ज्ञान-विज्ञानयोग