भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यहां है एक और आश्चर्य । करते हैं जो तरणोपाय । होता है वह सब अपाय । वह कैसा जान ॥ ८२ ॥ बुद्धि बाहूसे जो तरने गये । पता नहीं चला वे कहां गये । अभिमान डोहमें डूब गये । ज्ञानमानी जो ॥ ८३ ॥ लिया जिन्होंने वेदोंका आश्रय । साथ ही दिया मानको प्रश्रय । हुए वे मद-मीनमें ही लय । पूर्ण रूपसे ॥ ८४ ॥ जिसने किया तारुण्यका साथ । उसपे पड़ा मन्मथका हाथ । उसे विषय मगरके दांत । चबाते सदा ॥ ८५ ॥ फिर वृद्धावस्थाका जाल । मति-भ्रम कंप जंजाल । कसता जाता पल पल । चहूं ओरसे ॥ ८६ ॥ पटकता फिर शोक तीर पर । क्रोधावर्तमें नित उलझाकर । जब उठाते हैं उसमेंसे सिर । कोंचते विपद्गृध्र ॥ ८७ ॥ रुते फिर दुःख पंकमें । फंसे नित मृत्यु-पाशमें । गये जो काम आश्रयमें । गये व्यर्थ ही जो ॥ ८८ ॥ यज्ञ-क्रियाके साधनसे । लैस होकर तरनेसे । स्वर्ग-कंदरामें जा फंसे । यकायक ॥ ८९ ॥ मुक्ति-किनारा जो पाने गये । कर्म-बाहूंका आसरा लिये । चक्करमें ही उलझ गये । विधि-निषेधके ॥ ९० ॥ वहां वैराग्य नांव नहीं जाती । विवेकको थाह नहीं मिलती । योग-विद्या भी यदि काम आती । यदाकदा ही ॥ ९१ ॥ अपना बल लगाकर । माया-नदीको तैर कर । पार करनेका विचार । व्यर्थ ही है ॥ ९२ ॥ कुपथ्यशीलकी मिटे व्याधी । साधु जाने दुर्जनकी बुद्धि । अथवा लोभी त्यजे श्रीसिद्धि । हाथमें जो आयी ॥ ९३ ॥ अथवा दंड डरे चोरसे । कांटा निगला जावे मीनसे । तथा काय लडे भूतसे । वैसे ही पार्थ ॥ ९४ ॥ या जाल कुतरे मृग-छौना । चींटीका हिमगिरि लांगना । तभी है माया नदी तैरना । जीवसे साध्य ॥ ९५ ॥ २०९ ज्ञान-विज्ञानयोग (27)