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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अजी ! सुन तू पांडुसुता । कामी न जीतता वनिता । वैसी मायामय सरिता । न तैरता जीव ॥ ९६ ॥ किंतु सरते सहज लीलासे । भजते मुझे जो सर्व भावसे । सूखा उनके इसी तीरसे । मायाका जल ॥ ९७ ॥ सद्गुरु मांझी उनके साथ । प्रतीतिका बल उनके हाथ । आत्म-निवेदनकी है सतेज । डांगी ही जो ॥ ९८ ॥ अहंभावका जो तजकर भार । विकल्प आंधीका झांका ढालकर । अनुराग जलावेगका उतार । लेकर टोह ॥ ९९ ॥ फिर लिया ऐक्यका आधार । उसे जोडा बोधका उतार । तब निवृत्तिका पैल-तीर । जीत लिया ॥ १०० ॥ उपरतिका चप्पू मारकर । सोऽहंभावका साम्य साधकर । फिर चले निवृत्ति तट पर । सहज भावसे ॥ १ ॥ इस उपायसे जो मेरे हुये । वे सब मेरी माया तर गये । ऐसे भक्त भी क्वचित ही भये । नहीं अधिक ॥ २ ॥ न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥ चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ सभी अहंकारकी भूत-चेष्टामें आते हैं— अन्य जन हैं जो अवांतर । अहंकारका भूत संचार । होनेसे विस्मृत निरंतर । आत्म-बोधसे ॥ ३ ॥ हीन मूढ दुराचारी मेग आश्रय छोड़के । भ्रात होकर मयासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ १५ ॥ भक्त चार सदाचारी भजते मुझको नित । ज्ञानी तथैव जिज्ञासू अर्थार्थी पार्थ विव्हल ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी २१०

होता नियम-पटका विस्मरण । अधोगतिका रहता नहीं भान । किया जाता शास्त्र-निषिद्ध ही जान । अकार्य सब ॥ ४ ॥ क्यों किया शरीरका आश्रय । भूलकर ही मूल उद्देश्य । तदर्थ करणीय जो कार्य । छोडकर ॥ ५ ॥ इंद्रिय-ग्रामके चौराहेपर । अहं ममताके गप्पोंमें भर । विकारोंके समुदाय अपार । जुटाते रहते ॥ ६ ॥ दुःख-शोकके घावोंसे । प्रहारोंके विचारसे । बेभान माया-तमसे । ग्रस्त हैं जो ॥ ७ ॥ इसीलिये वे बिछुडे मुझसे । अन्य जो भजते चतुर्विधसे । उन्होंने आत्महित है जिससे । किया वृद्धिगत ॥ ८ ॥ चार प्रकारके मेरे भक्त --- पहला आर्त कहलाता । दूसरा जिज्ञासू बनता । तीसरा अर्थार्थी है होता । चौथा है जो ज्ञानी ॥ ९ ॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ दुःखी होनेसे भजता आर्त । जिज्ञासु भजता है ज्ञानार्थ । तीसरा है भजता अर्थार्थ । धनंजय ॥ ११० ॥ मत्प्रिय ज्ञानी भक्त— अब बात चौथेकी रही । उसको करणीय नहीं । वही एक भक्त है सही । ज्ञानी है जो ॥ ११ ॥ होता है जो ज्ञानके प्रकाशसे । मुक्त सदा भेदाभेद तमसे । रहता मद्रूप-समरससे । तथा भक्त भी जो ॥ १२ ॥ श्रेष्ठ है सबमें ज्ञानी नित्य-युक्त अनन्य जो । उसे मैं प्रिय अत्यंत वह भी प्रिय है मुझे ॥ १७ ॥ २११ ज्ञान-विज्ञानयोग

जैसे सामान्य दृष्टिसे स्फटिक । आभास होता है मानो उदक । वैसा लगता ज्ञानी सकौतुक । नहीं है ज्ञानी ॥ १३ ॥ पवन जब गगनमें घुल जाता । उसका अस्तित्व भिन्न नहीं रहता । ज्ञानीका समरसमें विलय होता । रहता जैसे ॥ १४ ॥ हिलकर देखा पवन । दीखता गगनसे भिन्न । वैसे स्वभावसे गगन- । जैसे रहता ॥ १५ ॥ ज्ञानी वैसे काया-कर्मसे । दीखता उपासक जैसे । आंतरिक अनुभावसे । मद्रूप है जो ॥ १६ ॥ किंतु वह ज्ञानके प्रकाशसे । अनुभवता तत्वमसि ऐसे । मैं भी कहता तब आनंदसे । है वह “मम आत्मा” ॥ १७ ॥ जो जीव भाव परका बोध पाकर । करना जानता शुद्ध व्यवहार । पानेसे वह केवल भिन्न शरीर । मुझसे भिन्न है क्या ॥ १८ ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥१८॥ ऐसे अपने स्वार्थके लोभसे । भक्त बनकर चिपकते मुझसे । किंतु मैं प्रेम करता जिनसे । वह है ज्ञानी मात्र ॥ १९ ॥ अजी ! दूध पय घृतकी जो आशा । उलझाती लोगोंसे गयको फांसा । किंतु उस पाशके बिन भी कैसा । दूध पाता है बछड़ा ॥ १२० ॥ क्यों कि वह तन मन प्राणसे । न जाने अन्य कुछ भी जिससे । जो सामनेसे दीखता है उसे । मानता माय मेरी ॥ २१ ॥ इस भांति जो हैं अनन्य गति । तभी करती है गाय भी प्रीति । इसलिये कहता लक्ष्मीपति । वह है यथार्थ ॥ २२ ॥ रहने दो फिर वे बोले । अब तुझसे हम बोले । वे तीन भक्त भी भले । भाते हैं मुझको ॥ २३ ॥ हैं ये उदार सारे ही ज्ञानी तो स्व-समान है । मुझमें स्थिर जो युक्त गति अंतिम जानके ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी २१२

किंतु जिसने मुझे जानकर । मुड़कर देखा नहीं संसार । सरिता सागरको प्राप्तकर । न मुड़ती जैसे ॥ २४ ॥ जिसके हृदय गह्वरमें उगम । अनुभव गंगाका मुझसे संगम । कैसे गायें फिर महिमा अनुपम । शब्दोंसे उसकी ॥ २५ ॥ अजी ! जो ज्ञानी कहलाता है । वह तो मेरा चैतन्य ही है । यह बात कहनेकी नहीं है । कहता हूं तुझसे ॥ २६ ॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥ ज्ञानी भक्तिका महान् अनुभाव— वह तो घने वनमें विषयोंके । आया है आतंकसे काम-क्रोधके । पाकर छुटकारा सद्वासनाके । पहाड़पर ॥ २७ ॥ फिर वह साधु-संगसे धनुर्धर । विहित कर्म-पथ पर चलकर । निषिद्ध-प्रवृत्ति पथ छोड़कर । कर्म-मार्गसे ॥ २८ ॥ शत-जन्मोंका है प्रवास करता । फलाशाका जूता नहीं पहनता । फल-हेतुका लेख कौन लिखता । ऐसी स्थितिमें ॥ २९ ॥ शरीर संयोगकी रातमें ऐसे । सर्व-संग त्यागकी सिद्धतासे । दौडनमें पौ फटी अनायाससे । कर्मक्षयकी ॥ १३० ॥ फिर चमकी उषा गुरु-कृपाकी । खिल फैली स्वर्ण-किरण ज्ञानकी । वहां प्रतीति हुई साम्य-सिद्धिकी । अंतर दृष्टिमें ॥ ३१ ॥ जिस ओर देखो तब मैं हूं । एकांत लोकांतमें मैं ही हूं । सदा सर्वत्र मैं एक ही हूं । मैं ही उसका ॥ ३२ ॥ उसके लिये सदा सर्वत्र कहीं । मैं छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं । तलावमें डूबी गगरीको कहीं । जैसे जल सर्वत्र ॥ ३३ ॥ होता है वह मेरे भीतर । उसको मैं बाहर भीतर । इसको शब्दोंमें गूंथकर । कहा नहीं जाता ॥ ३४ ॥ अनेक जन्मके पीछे पायो हैं शरणागति । विश्व देखें वासुदेव संत है अति दुर्लभ ॥ १९ ॥ २१३ ज्ञान-विज्ञानयोग

ऐसा होता वह ज्ञान-सागर । जिससे सदा बाहर भीतर । देखता आत्म-रूप निरंतर । विश्वमें आप ॥ ३५ ॥ यह समस्त है श्रीवासुदेव । प्रतीति रससे ढला है भाव । इसीलिये भक्तमें वह राव । तथा ज्ञानियोंमें भी ॥ ३६ ॥ उसका अनुभव भंडार । भरता है जंगम स्थावर । ऐसा महात्मा हे धनुर्धर । दुर्लभ मिलना ॥ ३७ ॥ नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे आराधना करनेवाले अनेक— ऐसे बहुत आते हैं अर्जुन । करते हैं जो भोगार्थ भजन । आशा तमसे जिनके नयन । हुए अति-मंद ॥ ३८ ॥ कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताःस्वया ॥ २० ॥ होती जब फलकी तीव्र आस । हृदयमें होता काम प्रवेश । बुझाता है उसका सहवास । ज्ञान-दीपको ॥ ३९ ॥ पडनेसे ऐसा उभय अंधार । समीपस्थ मुझको वे भुलाकर । होते हैं सर्व भावसे अनुचर । देवताओंके ॥ १४० ॥ पहलेसे जो दास है प्रकृतिके । उसीमें वश है भोग लालसाके । लोलुपतासे रचते हैं पूजाके । महोत्सव ॥ ४१ ॥ क्या है उसकी नियम-बुद्धि । कैसी है उपचार-समृद्धि । अर्पण करते हैं यथाविधि । विहित रूपसे ॥ ४२ ॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ भ्रांत जो कामना ग्रस्त पूजते अन्य दैवत । स्वभाव वश अज्ञानी उनके ही विधानसे ॥ २० ॥ पूजना चाहते जैसे श्रद्धासे जिस रूपको । जैसी है जिसकी श्रद्धा करता स्थिर मैं स्वयं ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी २१४

किंतु जो है अन्य देवता । भजनेकी चाह करता । इच्छा पूर्तिमें ही करता । उनकी भी ॥ ४३ ॥ देव-देवीमें मैं ही रहता । यह भी वह नहीं जानता । सबमें वह भाव धरता । भिन्न भिन्न ॥ ४४ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥ फिर है वह श्रद्धायुक्त । आराधनामें जो उचित । सिद्धि तक सब समस्त । करता रहता है ॥ ४५ ॥ जैसा है जिसका भाव । वैसा फल देता देव । मिलता वह सदैव । मेरे ही कारण ॥ ४६ ॥ अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥ अन्य देवताओं द्वारा पाये गये भोग नाशवंत होते हैं किंतु भक्त वे मुझे नहीं जानते । कल्पनाके बाहर नहीं पड़ते इसीलिये कल्पित फल हैं पाते । नाशवंत जो ॥ ४७ ॥ अजी ! ऐसा जो यह भजन । वह है संसारका ही साधन । यहां फल भोगका ही स्वप्न । दीखे क्षणभर ॥ ४८ ॥ फिर जो भाता है दैवत । जिसका यजन सतत । होता है वही जिसे प्राप्त । धनंजय ॥ ४९ ॥ यहां जिसके तनमन प्राण । करता सतत मेरा स्मरण । होता है जब उसका निर्वाण । पाता मद्रूप ॥ १५० ॥ उसी श्रद्धा-शक्तिसे तो पूजते उस रूपको । मांगे जो उससे भोग पाते मेरे विधानसे ॥ २२ ॥ नाशवंत फल पाते जन जो अल्प बुद्धिके । देवोंके भक्त देवोंको मेरे जो मुझसे मिले ॥ २३ ॥ २१५ ज्ञान-विज्ञानयोग

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥ किंतु ऐसा न करके प्राणिजात । व्यर्थ ही खोता है जो अपना हित । मानो तैरते हैं जलमें सतत । हथेलीके ही ॥ ५१ ॥ या अमृतकुंडमें डूबकर । होठोंको दृढतासे दबाकर । स्मरण करता है निरंतर । डबरेका पानी ॥ ५२ ॥ किसलिये यह ऐसा करना । अमृतमें डूबकर मरना । सुखसे अमर क्यों नहीं होना । अमृतमें ही ॥ ५३ ॥ फलशाका पिंजडा तजकर । अनुभव पंखसे धनुर्धर । क्यों न करें चिदंबर संचार । समर्थ भावसे ॥ ५४ ॥ चिदाकाशमें ऊंचाई पर । करें सुखसे उन्मुक्त संचार । उसका है अनंत विस्तार । अपनाही ॥ ५५ ॥ असीम पर क्यों सीमाका नियमन । मुक्त निराकारको आकार बंधन । स्वयंसिद्धका करना क्यों बलिदान । साधन पर ॥ ५६ ॥ किंतु मेरा यह कथन । विचारान्तमें भी अर्जुन । न करेगा जीवोंका मन । इसका स्वीकार ॥ ५७ ॥ नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नामिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥ मैं सर्वव्यापी हूं किंतु -- क्यों कि योगमायाके परदेसे । अंधत्व आनेके कारणसे । न देखता प्रकाश बलसे । मुझको कभी ॥ ५८ ॥ पूजते व्यक्त हो रूप बुद्धि-हीन न जानके । अव्यक्त श्रेष्ठ जो रूप मेरा अंतिम शाश्वत ॥ २४ ॥ घिरा मैं योग मायासे न हूं प्रकट विश्वसे । अजन्मा नित्य मैं ऐसा न जाने मूढ लोग जो ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २१६

ऐसा देखे तो मैं नहीं । ऐसी वस्तु नहीं कहीं । जैसा पानी होता नहीं । रसके बिना ॥ ५९ ॥ पवन किसको नहीं छूता । आकाश कहां नहीं रहता । वैसी ही सर्वत्र व्यापकता । एक मात्र मेरी ॥ ६० ॥ वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥ अतीतमें जितने भूत । मैं ही वे जान तू सतत । आज हैं विश्वमें जो पार्थ । वे भी मैं हूं ॥ ६१ ॥ भविष्यमें होंगे जितने ही । अलग मुझसे वे भी नहीं । यह बात है कहनेकी ही । वैसा न होता कछु ॥ ६२ ॥ अजी ! रज्जूके भुजंगको जैसे । काल पीला न कह सके ऐसे । भूतमात्र सब मिथ्यापनसे । हैं अनिश्चित ॥ ६३ ॥ सदा मैं सुन पांडुसुत । होने पर भी अखंडित । संसार ग्रस्त सब भूत । अन्य प्रकारसे ॥ ६४ ॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥ कहता हूं इसका कारण । अब तू ध्यान देकर सुन । अहंकार-तनका वरण । हुआ तब ॥ ६५ ॥ जन्म हुआ कुमारीका । आया उसे यौवन कामका । हुआ द्वेषसे ब्याह उसका । सुनो तब ॥ ६६ ॥ आपत्य हुआ उन दोनोंके । द्वंद्व मोह नाम हैं उनके । बड़े वह प्यारमें दादाके । जो था अहंकार ॥ ६७ ॥ हुये जो और जो होंगे भूत हैं आज जो यहां । सबको जानता हूं मैं मुझे कोयी न जानते ॥ २६ ॥ राग औ' द्वेषसे उठे चित्तमें मोह-द्वंद्व जो । जगतके सभी प्राणि घिरे हैं इससे यहां ॥ २७ ॥ २१७ ज्ञान-विज्ञानयोग (28)

धृतिका जो प्रतिकूल रहता । आशा-रससे परिपुष्ट होता । नियमका अनादर करता । द्वंद्व-मोह ॥ ६८ ॥ असंतुष्टताकी मदिरा । मत्त होकर धनुर्धर । विकार स्त्री-सह संसार । करता विषयोंमें ॥ ६९ ॥ जिससे भाव-शुद्धिकी राह पर । फैलाये विकल्पके कांटे अपार । खुल जाते सब कुपथ दो चार । अप्रवृत्तिके ॥ ७० ॥ इसने प्राणि गड़बड़ाये । संसार खडियामें फंसाये । फिर डंडुकेसे पिटवाये । महा-दुःखके ॥ ७१ ॥ येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥ भाव-शुद्धिकी राह पर । विकल्प-शूल देखकर । नहीं आते जो लौट कर । बुद्धि-भ्रमसे ॥ ७२ ॥ थोडेसे जो मद्रूप होते हैं उनको अंतकालमें दुःख नहीं होता-- पगसे ही एक-निष्ठाके । शूलांकुरोंको विकल्पके । रौंध छोडे महा-पापके । वन-प्रांत ॥ ७३ ॥ सत्कर्मकी फिर दौड़-लगायी । मेरे सामिप्यकी मंजिल पायी । महा-विपत्तिसे जान बचायी । बटमारोंके ॥ ७४ ॥ जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥ सहज ही सोचने पर पार्थ । जन्म मरणकी मिटती कथा । इस भांतिके प्रयत्नोंमें आस्था । उत्पन्न होती ॥ ७५ ॥ गँवाये जिसने पाप अपने पुण्य कर्मसे । दृढतासे भजते वे द्वंद्व मोह हटाकर ॥ २८ ॥ जुटे मेरे सहारे जो जीतते जन्म मृत्युको । जानते ब्रह्म वे पूर्ण तथा अध्यात्म-कर्म भी ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१८

उनका वह यत्न ही एक काल । देता समय पर-ब्रह्मका फल । पक्वतामें चूता रस पल पल । तब पूर्णताका ॥ ७६ ॥ कृतार्थतासे विश्व जब भरता । मिटती है अध्यात्मकी अपूर्णता । तथा कर्मका काम नहीं रहता । होता मन विलय ॥ ७७ ॥ उसकी ऐसा अध्यात्म लाभ । होता है सुन पुरुषर्षभ । उसका पूंजी हूं मैं सुलभ । इस उद्यममें ॥ ७८ ॥ साम्यके वृद्धिसे उसके । संधते व्यापार उसके । वहां दारिद्र्य जो द्वैतके । रहता नहीं ॥ ७९ ॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥ सब अधिभूत मुझको । प्रतीतिसे अधिदैवको । जिन्होंने जाना यथार्थको । धनंजय ॥ १८० ॥ अनुभवके ज्ञान बलसे । जानता मैं अधियज्ञ इसे । वह शरीरके वियोगसे । अकुलाता नहीं ॥ ८१ ॥ अन्यथा आयुष्य सूत्र जब टूटता । प्राणियोंका तब हृदय तड़पता । सजीवके चितमें भी युगांत आता । देखकर यह ॥ ८२ ॥ किंतु यह नहीं जाने कैसा । ज्ञानियोंका नहीं होता ऐसा । अंतकालमें भी वह सहसा । मुझे भूलते नहीं ॥ ८३ ॥ अन्यथा तू यह जान । ऐसे जो महा-निपुण । औ' युक्त अंतःकरण । योगी हैं वही ॥ ८४ ॥ सातवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत उपसंहार और आठवेकी भूमिका— तब यह शब्द कूपका तल । न पहुंचा पार्थ कर-कमल । पल एक पार्थ था उस काल । पिछडा हुआ ॥ ८५ ॥ अधिभूताधि दैवोंमें मुझे जो अधि-यज्ञमें । प्रयाण-कालमें भी जो जानते रह सावध ॥ ३० ॥ २१९ ज्ञान-विज्ञानयोग

जहां तद्ब्रह्मवाक्फल । जो ज्ञानार्थसे रसाल । साभिप्राय परिमल । भावोंके हैं ॥ ८६ ॥ जो सहज कृपामंदानिल । कृष्णाद्रुमका वचन-फल । लाया अर्जुन श्रवण-तल । अकस्मात ॥ ८७ ॥ जो ये तत्व सिद्धांतसे बनाये । ब्रह्म-रस सागरमें हैं डुबोये । फिर वैसे ही ये जो पगाये । परमानंदमें ॥ ८८ ॥ उसके निर्मल सौंदर्यसे । ज्ञान-उन्मेशकी वासनासे । चूने लगा पार्थकी जिव्हासे । विस्मयामृत ॥ ८९ ॥ लाभसे उस सुख-संपत्तिके । सुरसुराहटसे हृदयके । व्यंग दिखाकर स्वर्ग-सुखके । हंसने लगा ॥ २९० ॥ फलका बाह्य सलोनापन । अनुभव करके अर्जुन । रस-स्वादमें रसना मन । खो बैठा सहज ॥ ९१ ॥ उठाकर वह वाक्फल । अनुमानका करतल । प्रतीति-मुखमें तत्काल । भरने लगा ॥ ९२ ॥ किंतु विचार मुखमें न समाता । हेतुका दांत नहीं काट सकता । इसलिये पार्थ मुख न लगाता । उस फलको ॥ ९३ ॥ कहता तब अर्जुन हो चमत्कृत । तारागण ये जलमें प्रति-बिंबित । ऐसे हैं तेरे ये वाक्फल सुशोभित । इसमें मैं उलझा ॥ ९४ ॥ नहीं ये तेरे साधारण शब्द । है अनुभव-गगन विषद । थाह न पाती बुद्धि भाव-पद । डूब जाती है ॥ ९५ ॥ मनमें जान यह गोष्ट । कृपार्थ पुनः किरीटी । पुनरपि घुमाता दृष्टि । कृष्ण चरणमें ॥ ९६ ॥ विनय करता अर्जुन । ये सात ही पद नवीन । ग्रहण न करते कान । आश्चर्यकारक ॥ ९७ ॥ श्रवण करके ही ये केवल । इनके प्रमेयोंका जो है जाल । करेगा मन इन्हें करतल । ऐसे लगा था ॥ ९८ ॥ ऐसा नहीं यह निश्चय । देख अक्षर समुदाय । है साश्चर्य-जीव आश्चर्य । देव मेरा ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी २२०

कानोंके इन गवाक्षोंसे । शब्द-किरण प्रवेशसे । मन हुआ चमत्कृतिसे । चकित मेरा ॥ २०० ॥ चाहता मैं भावको जानना । कहनमें समयको खोना । कष्ट कर प्रभु निरूपण । कर तू सत्वर ॥ १ ॥ पीछेका कर अवलोकन । अगले पर रख नयन । स्व-इच्छाका भी कर दर्शन । पूछना चतुराइसे ॥ २ ॥ देख अर्जुनका चतुरपन । न कर मर्यादाका उल्लंघन । करता हृदयका आलिंगन । श्रीकृष्णके ॥ ३ ॥ कैसे पूछना है प्रश्न । रखकर अवधान । जानता यह अर्जुन । भली भांति ॥ ४ ॥ अर्जुनका है ऐसा पूछना । श्रीकृष्णका भाव समझाना । संजयको भाये ये वचन । कहेगा वह प्रेमसे ॥ ५ ॥ सुनो उस संवादको दे ध्यान । करूंगा देश भाषामें कथन । कानसे आगे करके नयन । जानेंगे वह ॥ ६ ॥ बुद्धि-जिव्हासे चखनेसे पूर्व अक्षर । देखकर नयन उनका अलंकार । अनुभवेंगे इंद्रिय अपरंपार । सुख संतोषको ॥ ७ ॥ जैसे मालतीका फूल । घ्राणसे है परिमल । लेनेसे पूर्व कोमल । सुख लेते नयन ॥ ८ ॥ वैसे है देशीका जो सौंदर्य । करायेगा इंद्रियसे राज्य । फिर करेगा वह प्रमेय- । सुधा-पान ॥ ९ ॥ जहां होती है वाचा मौन । वह करूंगा मैं कथन । यह ज्ञानदेव-वचन । जो हैं निवृत्ति-दास ॥ २१० ॥ गीता श्लोक ३० ज्ञानेश्वरी ओवी २१०.

८ सातत्ययोग अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥ अर्जुनके सात प्रश्न -- फिर कहा अर्जुनने । जी सुनलिया मैंने । अब जो पूछा मैने । कहो वह ॥ १ ॥ कहो क्या है वह ब्रह्म । किसका नाम है कर्म । अथवा क्या है अध्यात्म । कहो मुझे ॥ २ ॥ प्रभो ! अधिभूत यह है कैसे । औ' अधिदैवत कहते किसे । यह सुनाओ प्रकट रूपसे । जो मैं समझूं ॥ ३ ॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥ प्रभो अधियज्ञ क्या है । इस देहमें कौन है । समझमें न आता है । अनुमानके भी ॥ ४ ॥ अर्जुनने कहा किसको कहते ब्रह्म तथा अध्यात्म-कर्म क्या । अधिभूत कहो क्या है तथा क्या अधिदैव भी ॥ १ ॥ अधियज्ञ यहां कौन कैसा है इस देहमें । कैसे प्रयाणमें योगी निग्रही जानते तुझे ॥ २ ॥

तथा कैसे किया नियतांतःकरण । प्रयाण-कालमें कैसे हो तव ज्ञान । वह कैसे कहो तुम मुझे श्रीकृष्ण । पूर्ण-रूपसे ॥ ५ ॥ ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु— कोई सोया घरमें चिंतामणिके । यदि योगसे ही अपने भाग्यके । बोल भी उसके बड़बड़ानेके । न जाते व्यर्थ ॥ ६ ॥ अर्जुनके शब्दके साथ । मनमें कहते हैं नाथ । “तूने पूछा यही उचित ।” सुन तू अब ॥ ७ ॥ शावक है अर्जुन कामधेनुका । आसरा है ऊपर कल्पतरुका । होना उसके मनोरथ सिद्धिका । आश्चर्य क्या ॥ ८ ॥ क्रोधसे देता प्रभु जिसको मार । उसको होता है ब्रह्म साक्षात्कार । जिसको देता वह सीख कृपाकर । उसको क्या न मिलेगा ॥ ९ ॥ जब होते हम श्रीकृष्ण-शरण । कृष्ण होता अपना अंतःकरण । तब अपना संकल्पका अंगन । भरता महा-सिद्धिसे ॥ १० ॥ किंतु ऐसा जो प्रेम । पार्थमें है निःसीम । तभी उसका काम । सदा फलता ॥ ११ ॥ इस कारण ही वह अनंत । जानकर उसका मनेरथ । भर रखता थाली पकवानयुत । ज्ञानान्नसे आप ॥ १२ ॥ आपत्य जब स्नेहसे दूर होता । भूख उसकी अनुभवती माता । नहीं तो क्या वह शब्दसे कहता । मुझे दूध दे री ॥ १३ ॥ कृपालू गुरुदेवके यहां । आश्चर्य नहीं इसका जहां । जाने दो यह प्रभुने वहां । कहा क्या सुनो ॥ १४ ॥ भगवान उवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥ श्री भगवानने कहा ब्रह्म अक्षर है श्रेष्ठ अध्यात्म निज-भाव जो । भूत-सृष्टि सजाता जो वह व्यापार कर्म है ॥ ३ ॥ २२३ सातत्ययोग

सभी साकार वस्तुओंमें ओतप्रोत अविनाशी-सत्त्व है ब्रह्म -- कहता है तब सर्वेश्वर । टूटे हुए हैं सब आकार । उसमें भी जो ठूंसने पर । टूटता नहीं ॥ १५ ॥ देखने पर बैसी उसकी सूक्ष्मता । शून्य किंतु शून्य नहीं है स्वभावता । गगनसे वह है छननेमें आता । जो है सूक्ष्मतम ॥१६॥ इस भांती यह विरल होकर । विज्ञान-पटमें भर हिलने पर । चूता नहीं जो वह पांडुकुमार । परब्रह्म है जान ॥ १७ ॥ सहज नित्यत्व है आध्यात्म तथा जो आकारके साथ । न जानता जन्मकी बात । आकार-लोपमें समस्त । न जानता नाश ॥ १८ ॥ जो है अपना ही सहजत्व । जिसको है ब्रह्मका नित्यत्व । यही है जो सहज-नित्यत्व । कहलाता अध्यात्म ॥ १९ ॥ बिना कर्ताके अव्यक्तमें दीखनेवाली हलचल कर्म है--- जैसे गगनमें निर्मल । न जाने कैसे किसी काल । उमड फैलते बादल । नाना रंगके ॥ २० ॥ उस विशुद्ध अमूर्तमें जैसे । महत्तत्त्वादि जो भूत भेदसे । ब्रह्मांडके विभिन्न अंकुरसे । फूटने लगते ॥ २१ ॥ निर्विकल्पके उस ऊसर पर । फूटता आदि संकल्पका अंकुर । फिर बनते जाते घने आकार । ब्रह्म-गोलके ॥ २२ ॥ देखनेसे एकेकके भीतर । भरा है बीजसे ही भरपूर । होने-जाने वाले जीवोंकी अपार । गणना ही नहीं ॥ २३ ॥ फिर उन ब्रह्मगोलकोंके जो अंशांश । जानते आदि संकल्प असम साहस । जिससे बढ़ती ही जाती है अनायास । सृष्टि सर्वत्र ॥ २४ ॥ पर एक ही है दूसरेके बिन । पर-ब्रह्म ही भर रहा संपूर्ण । यहां अनेकत्वका आया महान । पूर जैसा ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २२४

न जाने सब विषम आये कैसे । व्यर्थ ही चराचर रचते ऐसे । औ' प्रसव योनिके अनंत जैसे । दीखते प्रकार ॥ २६ ॥ यहां है जीव-भावके कोंपल । गगनातीत दीखते सकल । देखें तो इनके जन्मका मूल । वहां है शून्य ॥ २७ ॥ मूलमें कर्ता कोई दीखता नहीं । तथा कारण कुछ नहीं कहीं । किंतु कार्य आप रुकता ही नहीं । बढ़ता जाता ॥ २८ ॥ ऐसे कर्ताके बिन गोचर । अव्यक्तमें जो यह आकार । निपजता है यह व्यापार । उसका नाम कर्म ॥ २९ ॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥ बादलके समान जो बनता और बिगडता है वह अधिभूत — अब जो अधिभूत कहलाता । वह भी संक्षेपमें हूं कहता । जो है बनता और बिगड़ता । बादल जैसा ॥ ३० ॥ ऐसा व्यर्थ है अस्तित्व जिसका । न होता सहज-रूप जिसका । पांच मिल लाते रूप जिसका । धनुर्धर ॥ ३१ ॥ पंच भूतोंका आश्रय लेकर । उनके संयोगसे ले आकार । और वियोगमें है जाता मर । नाम रूपादिक ॥ ३२ ॥ अहंकारसे अलग-सा बना आत्मा ही अधिदैव— यह है अधिभूत कहलाता । पुरुष अधिदैव कहलाता । जो प्रकृति उपार्जित भोगता । भोग सर्व ॥ ३३ ॥ चक्षु है जो चेतनका । अध्यक्ष है इंद्रियोंका । वृक्ष संकल्प-पक्षिका । देहांतमें ॥ ३४ ॥ परमात्मा ही है जो किंतु भिन्न । है अहंकार निद्रामें मगन । इसीलिये स्वप्नमें होता खिन्न । अथवा प्रसन्न भी ॥ ३५ ॥ अधि-भूत विनाशी जो जीवत्व अधि-दैवत । अधि-यज्ञ स्वयं मैं हूं देहमें यज्ञ-पूत जो ॥ ४ ॥ २२५ सातत्ययोग (29)

अध्याय ६: आत्मसंयमयोग / ध्यानयोग

कहलाता यह जीव। जैसा इसका स्वभाव। इसे जान अधिदैव। पंचायतनका ॥ ३६ ॥ शरीर भाव रहित आत्मा अधियज्ञ -- यहां शरीर-ग्राममें जान। शरीर-भाव उपशमन । करता हूँ अधियज्ञ बन। पांडुकुमार ॥ ३७ ॥ यह सब मैं ही हूँ, अविद्याके कारण भिन्नता दीखती है— यहां अधिदैवाधिभूत। यह सब मैं हूँ समस्त। वंगयुत स्वर्ण जो नित। हीन होता जैसे ॥ ३८ ॥ फिर भी न मलता कांचन। नहीं होता वंगके समान। किंतु मिल वंगसे हीन। कहलाता है ॥ ३९ ॥ वैसे अधिभूतादि सब। अविद्या सहित हो तब। अलग मानते हैं जब। धनंजय ॥ ४० ॥ अविद्याका पटल उठता। भेद-भावका अंत है होता। और दोनोंका एक रूप होता। तो वे दो थे क्या ? ॥ ४१ ॥ सलौनी अलक लट एक। स्फटिक शिलातलमें रख। ऊपरसे उसे जब देख। लगती टुटी हुई ॥ ४२ ॥ जैसे अलक-लट हटायी। न जाने दरक कहां गयीं। अंक देकर की क्या जुड़ायी। स्फटिक-शिलाकी ॥ ४३ ॥ मूलकी वह जो अखंडित थी। केश-संगसे खंडित हुई थी। उसके हटनेसे ही आयी थी। मूल रूपमें ॥ ४४ ॥ ऐसा अहंभाव जब जाता। मूलमें रहती है एकता। जहां हो ऐसी वास्तविकता। वह अधियज्ञ मैं ॥ ४५ ॥ किंतु हमने अब तुझ। सकल-यज्ञ हैं कर्मज। कहा धरकर जो काज। मनमें पार्थ ॥ ४६ ॥ विश्राम जो जीव-जातिका। निधान नैष्कर्म्य-सुखका। प्रकट रूप मैं उसका। कहता पार्थ ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी २२६

वैराग्य और अभ्याससे अविद्या-मल दूर करो—अधियज्ञ वैराग्य ईंधनसे भरपूर । इंद्रियानल प्रज्वलित कर । विषय-द्रव्य आहुति देकर । उसमें तब ॥ ४८ ॥ वज्रासन धरातल बनाकर । आधार-मुद्रा-वेदिका रचकर । शरीर-मंडपका शोधन कर । अनंतर पार्थ ॥ ४९ ॥ कुंडमें संयमाग्निके । मंत्र-घोषसे युक्तिके । देना इंद्रिय-द्रव्यके । शाकल्य नित्य ॥ ५० ॥ फिर मन-प्राण तथा संयम । है हवन संप्रदाय संभ्रम । इससे तुष्ट करना निर्धूम । ज्ञानानल ॥ ५१ ॥ ऐसा यह सकल-साधन । ज्ञानाग्निमें करनेसे अर्पण । ज्ञेयमें लय होकर ज्ञान । ज्ञेय ही रहता ॥ ५२ ॥ इसका नाम अधियज्ञ । ऐसा बोला है जब सर्वज्ञ । तब पार्थने जो अति प्राज्ञ । जान लिया पूर्ण ॥ ५३ ॥ अंतकालकी स्थितिका वर्णन— जानकर यह बोले कृष्ण । कर रहा है न तू श्रवण । देख कृष्णका मुदित मन । खिल उठा पार्थ ॥ ५४ ॥ सन्तानकी तृप्तिसे तृप्त होना । या शिष्यकी पक्वतासे खिलना । जानते मात्र सद्गुरु महान । या जन्मदात्री ॥ ५५ ॥ तब खिल उठे सात्त्विक-भाव । नारायणमें नरसे भी पूर्व । किंतु समता-बुद्धिसे ही देव । संयत आप ॥ ५६ ॥ पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृत-कल्लोल । वैसे कोमल तथा सरल । बोले शब्द ॥ ५७ ॥ श्रोतृ-श्रेष्ठ तू अर्जुन । मेरी बात यह सुन । जलानेवाला जो ज्ञान । अलाता मायाको ॥ ५८ ॥ अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् यः प्रयाति सम्मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥ प्रयाण कालमें भी जो मेरे ही ध्यानमें रत । जाते हैं तजके देह मिलता मुझ निश्चित ॥ ५ ॥ २२७ सातत्ययोग

मेरे स्मरण-पूर्वक जो शरीर छोड़ता है वह मद्रूप होता है— अधियज्ञ कहते हैं जिसे। अभी कहा था तुझसे ऐसे। जीवनमें जो जानते उसे। औ' मरते समय भी ॥ ५९ ॥ शरीर एक झोल मानकर। अपनेमें ही आप होकर। मठ जैसे व्योमसे भर कर। रहता उसीमें ॥ ६० ॥ इस प्रतीतिके अंगनमें। निश्चलताके अंतःकक्षमें। सोते हैं सो विषयोंको उनमें। नहीं प्रवेश ॥ ६१ ॥ अंतर्वाह्य ऐसा ऐक्य भरा है। जो आप मद्रूप बन गया है। पंच-भूतोंका झोल उतरा है। अनजाने बाहर ही ॥ ६२ ॥ जीवनमें उभयत्व नहीं जिसके। मरणमें संकर कैसे जी उनके। तभी न हिले अनुभूति उदरके। निश्चय रूप जो ॥ ६३ ॥ वह है ऐक्य रससे ढली हुई। या नित्यता हृदयमें बसी हुई। या समरस-सिंधुसे धुली हुई। न होती जो मलिन ॥ ६४ ॥ मटका अथाह पानीमें डूब कर। जलसे भरकर अंदर बाहर। दैव गतिसे मानो टूटा वहीं पर। तब होगा क्या रीता ? ॥ ६५ ॥ या सांपने केंचुला उतारा। या किसीने कपडा उतारा। इससे टूटा क्या अंग सारा। या अवयव ॥ ६६ ॥ वैसा है भासमान शरीराकार। गिरता तब आत्मवस्तु अंतर। भरा है बोधसे जहां भरपूर। अपनेमें आप ॥ ६७ ॥ मुझे इस प्रकार। अंतमें जानकर। छोड़ते हैं शरीर। होते हैं मद्रूप ॥ ६८ ॥ इसलिये तू मेरे स्मरण पूर्वक युद्ध-रत हो जा— अथवा वैसे भी साधारण। जिसे स्मरता अंतःकरण। प्राप्त करता है जो मरण। तद्रूप होता ॥ ६९ ॥ कोई एक अकुलाहटसे। भागते हुए वायु-वेगसे। सहसा फिसलकर जैसे। गिरा कुएमैं ॥ ७० ॥ गिरनेसे पहले गिरनेसे-। बचानेका उपाय न होनेसे। . गिरना ही पड़ता है वैसे। किसी मनुष्यको ॥ ७१ ॥ ज्ञानेश्वरी २२८

वैसे मृत्युके अवसरपर । बढता जो जीव सम्मुख आकर । उसमें ही चित्तका उलझकर । तद्रूप होना पड़ता ॥ ७२ ॥ जागृतिमें जिसकी लगन । करता मन उसका ध्यान । देखता वही निद्रामें स्वप्न । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मा मेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥ वैसे ही जीवनमें सतत । जीव रहता चावसे नित । जिसमें आसक्त वही बात । आती मृत्यु समय ॥ ७४ ॥ मरणमें जिसका जो स्मरण । उसकी होती वही गति जान । इसलिये कर सदा स्मरण । मेरा ही तू ॥ ७५ ॥ आंखोंसे जो देखना । कानोंसे जो सुनना । मनमें जो भावना । बोलना वाणीसे ॥ ७६ ॥ संपूर्ण हो अंदर बाहर । मद्रूप ये सभी व्यवहार । फिर सहज ही निरंतर । मै ही हूं ॥ ७७ ॥ अजी ! हुआ इस भांति ही जब । न मरता देह गिरा थी तब । संग्राम करने पर भी अब । भय रहा कहां ॥ ७८ ॥ मन बुद्धि तू संपूर्ण । मुझमें कर अर्पण । मद्रूप होगा तत्क्षण । प्रण है मेरा ॥ ७९ ॥ लीन हो जिसमें जीव अंतमें देह त्यागता । पाता है जो वही भाव जिसमें नित्य ही रत ॥ ६ तभी अखंड ही मेरा स्मरण कर जूझ तू । मन-बुद्धि मुझे देके पायेगा मुझ निश्चित ॥ ७ ॥ २२९ सातत्ययोग