भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किंतु जो है अन्य देवता । भजनेकी चाह करता । इच्छा पूर्तिमें ही करता । उनकी भी ॥ ४३ ॥ देव-देवीमें मैं ही रहता । यह भी वह नहीं जानता । सबमें वह भाव धरता । भिन्न भिन्न ॥ ४४ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥ फिर है वह श्रद्धायुक्त । आराधनामें जो उचित । सिद्धि तक सब समस्त । करता रहता है ॥ ४५ ॥ जैसा है जिसका भाव । वैसा फल देता देव । मिलता वह सदैव । मेरे ही कारण ॥ ४६ ॥ अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥ अन्य देवताओं द्वारा पाये गये भोग नाशवंत होते हैं किंतु भक्त वे मुझे नहीं जानते । कल्पनाके बाहर नहीं पड़ते इसीलिये कल्पित फल हैं पाते । नाशवंत जो ॥ ४७ ॥ अजी ! ऐसा जो यह भजन । वह है संसारका ही साधन । यहां फल भोगका ही स्वप्न । दीखे क्षणभर ॥ ४८ ॥ फिर जो भाता है दैवत । जिसका यजन सतत । होता है वही जिसे प्राप्त । धनंजय ॥ ४९ ॥ यहां जिसके तनमन प्राण । करता सतत मेरा स्मरण । होता है जब उसका निर्वाण । पाता मद्रूप ॥ १५० ॥ उसी श्रद्धा-शक्तिसे तो पूजते उस रूपको । मांगे जो उससे भोग पाते मेरे विधानसे ॥ २२ ॥ नाशवंत फल पाते जन जो अल्प बुद्धिके । देवोंके भक्त देवोंको मेरे जो मुझसे मिले ॥ २३ ॥ २१५ ज्ञान-विज्ञानयोग