ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा होता वह ज्ञान-सागर । जिससे सदा बाहर भीतर । देखता आत्म-रूप निरंतर । विश्वमें आप ॥ ३५ ॥ यह समस्त है श्रीवासुदेव । प्रतीति रससे ढला है भाव । इसीलिये भक्तमें वह राव । तथा ज्ञानियोंमें भी ॥ ३६ ॥ उसका अनुभव भंडार । भरता है जंगम स्थावर । ऐसा महात्मा हे धनुर्धर । दुर्लभ मिलना ॥ ३७ ॥ नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे आराधना करनेवाले अनेक— ऐसे बहुत आते हैं अर्जुन । करते हैं जो भोगार्थ भजन । आशा तमसे जिनके नयन । हुए अति-मंद ॥ ३८ ॥ कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताःस्वया ॥ २० ॥ होती जब फलकी तीव्र आस । हृदयमें होता काम प्रवेश । बुझाता है उसका सहवास । ज्ञान-दीपको ॥ ३९ ॥ पडनेसे ऐसा उभय अंधार । समीपस्थ मुझको वे भुलाकर । होते हैं सर्व भावसे अनुचर । देवताओंके ॥ १४० ॥ पहलेसे जो दास है प्रकृतिके । उसीमें वश है भोग लालसाके । लोलुपतासे रचते हैं पूजाके । महोत्सव ॥ ४१ ॥ क्या है उसकी नियम-बुद्धि । कैसी है उपचार-समृद्धि । अर्पण करते हैं यथाविधि । विहित रूपसे ॥ ४२ ॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ भ्रांत जो कामना ग्रस्त पूजते अन्य दैवत । स्वभाव वश अज्ञानी उनके ही विधानसे ॥ २० ॥ पूजना चाहते जैसे श्रद्धासे जिस रूपको । जैसी है जिसकी श्रद्धा करता स्थिर मैं स्वयं ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी २१४