ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
था जो भजकोंका भजनीय । तथा पूजकोंका पूजनीय । और याज्ञिकोंका यजनीय । सदा सर्वत्र ॥ ७७ ॥ वही तत्व जो पूर्ण । हुआ स्वयं निर्वाण । जो साधना कारण । सिद्ध तत्व ॥ ७८ ॥ तभी कर्म निष्ठोंमें वंद्य । तथा ज्ञानियोंमें है वेद्य । है वह तापसमें आद्य । तपोनाथ ॥ ७९ ॥ जीव और परमात्म-संगम । जिसका है ऐसा मनोधर्म । होती है उस तनकी महिमा । अपार यहां ॥ ४८० ॥ तभी मैं इस कारणसे । कहता हूं सदा तुझसे । योगी हो अंतःकरणसे । अर्जुन तू ॥ ८१ ॥ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनांतरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥ अजी योगी जो कहलाता । देवोंका वह देव होता । मेरा सुख सर्वस्व तथा । चैतन्य ही वह ॥ ८२ ॥ जिसके भजनसे भजनीय भजन । तथा यह भक्ति साधन स्वयं संपूर्ण । हुआ वह स्वयं अनुभवसे तू जान । अखंडित ॥ ८३ ॥ फिर हमारे प्रेमका । स्वरूप नहीं वाचाका । अनिर्वचन है उसका । विषय अर्जुन ॥ ८४ ॥ वह है जो प्रेम एकात्म । उसकी है योग्य उपमा । मैं शरीर और वह आत्मा । यही एक ॥ ८५ ॥ ऐसा भक्त चकोर-चंद्र । वह भुवनैक नरेंद्र । बोला सर्वगुण समुद्र । कहता संजय ॥ ८६ ॥ जहां पहलेसे ही पार्थ । जानना चाहता था सार्थ । जान लिया है यदुनाथ । हुआ अधीर ॥ ८७ ॥ श्रेष्ठ है योगियोंमें जो मुझमें प्राण रोपके । भजता मुझ श्रद्धासे मानता श्रेष्ठ मैं उसे ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी १९८
जान कर वह प्रमुदित मन । निरूपणका है यथार्थ ग्रहण । करता है यह जैसे सुदर्पण । कहेगा श्रीरंग ॥ ८८ ॥ ऐसा प्रसंग आगे आयेगा । वहां शांत रस खिला होगा । अब है वहां बोया जायेगा । प्रमेय बीज ॥ ८९ ॥ सत्वकी वर्षासे पिघला ढेला । हुआ चित्तका बाग गुलगुल । सहजतासे हुआ क्षेत्र कोमल । इस समय ॥ ४९० ॥ फिर अवधानकी क्यारी सुंदर । मिली स्वर्णमय इस अवसर । निवृत्त-चित्तने यह जान कर । प्रेरणा दी बुवाईकी ॥ ९१ ॥ चाह कर किया मुझे प्रेमसे । सद्गुरुने सहज लीलासे । बीज बोया आशीर्वादसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ९२ ॥ सो मेरी वाणीसे जो निकलेग । सन्त हृदयमें महुलायेगा । रहने दो अब क्या कहा कहियेगा । श्रीरंगने वहां ॥ ९३ ॥ किंतु वह मनके कानसे सुनना । शब्द है जो बुद्धि-नयनसे देखना । चित्तकी कीमत देकर ही है लेना । मेरे शब्द ॥ ९४ ॥ यह सब ध्यान देकर । ले जाना हृदय-भीतर । सज्जनोंको ये निरंतर । देंगे संतोष ॥ ९५ ॥ स्वहितको स्थिर करेंगे । पूर्णत्वको जगायेंगे । तथा लखौरी चढ़ायेंगे । जीव पर ये ॥ ९६ ॥ अब जो मुकुंद अर्जुनसे । बोलेगा सुंदर विनोदसे । वह सब ओवीके छंदसे । कहूंगा मैं ॥ ४९७ ॥ गीता श्लोक ४७ ज्ञानेश्वरी ओवी ४९७-
७ ज्ञानविज्ञानयोग भगवान उवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥ प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है, इसको सत्य मानना अज्ञान - सुन तू अब पार्थ । कहता है अनंत । हुआ है योग-युक्त । इस समय ॥ १ ॥ जानता तू मुझे पूर्ण रूपसे । हथेली पर रखे रत्नके जैसे । अब तुझे ज्ञान कहूंगा मैं वैसे । विज्ञान सह जो ॥ २ ॥ यहां विज्ञानका है क्या करना । ऐसी यदि तेरी मनो भावना । किंतु उसको पहले जानना । आवश्यक यहां ॥ ३ ॥ क्यों कि ससयमें स्वरूपज्ञानके । मिटता यह नयन पहुंचके । जैसे किनारेसे लगे जहाजके । नहीं है वेग ॥ ४ ॥ श्री भगवानने कहा .चित्ते आसरा मेरा लेके जो योग साधते । कसे समग्र निःशंक जानेंगे मुझसे सुन ॥ १ ॥ ˙ विज्ञान सह जो ज्ञान संपूर्ण कहता तुझे । जानके जो नहीं अन्य जगमें जानना रहा ॥ २ ॥
होती नहीं पहुंच वहां ज्ञानकी । पुच्छ प्रगति होती है विचारकी । भोथरा हो जाती है धार तर्ककी । उस समय ॥ ५ ॥ नाम है जिसका ज्ञान अर्जुन । उससे भिन्न प्रपंच विज्ञान । वहां सत्य बुद्धि ही है अज्ञान । जान तू यह ॥ ६ ॥ अन्त होगा जब अज्ञानका । निवारण होगा विज्ञानका । तब साक्षात् होगा ज्ञानका । अपनेमें पूर्ण ॥ ७ ॥ रहस्य है ऐसा जो गूढ । वह करूंगा शब्दरूढ । जिसका पूर्ण करूंगा कोड । मनका मैं ॥ ८ ॥ जिससे है मिटता प्रवचन । सुननेवालोंका भी व्यसन । मिटता है यह सब अज्ञान । ऊंच नीचका ॥ ९ ॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥ मुझे जाननेवाला कोई एकाद होता है— सहस्रो मनुष्योंमें कहीं एक । चाह करता इस विषयकी नेक । चाहनेवालोंमें भी कहीं एक । पाता है मुझे ॥ १० ॥ जैसे भरा हुआ भुवन । एकेक छंटके अर्जुन । करते संघटित सेना । लक्षाधिक ॥ ११ ॥ उसमें भी कहीं एक । सहते घात अनेक । पाता है विजयश्रीका । सिंहासन ॥ १२ ॥ आस्थाके इस महापूरमें । कूदते हैं जन करोडोंमें । पहुंचता है पैल-तीरमें । कोई एक ॥ १३ ॥ इसीलिये यह नहीं सामान्य । कहनेमें भी यह असामान्य । फिर कहेंगे तुझे वह अन्य । अब सुन विज्ञान ॥ १४ ॥ शत सहस्रमें एक मोक्षार्थ जुटता कभी । जुटते उसमें कोई तत्त्वता जानते मुझे ॥ ३ ॥ (26) २०१ ज्ञान विज्ञानयोग
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥ अब तू सुन हे धनंजय । है महदादिक मेरी माया । जैसे प्रतिबिंबित हो छाया । निजांगोंकी ॥ १५ ॥ यह विज्ञान है— इसे कहते प्रकृति जान । जान यह जो अष्टधा भिन्न । उत्पन्न होता है त्रिभुवन । इससे ही ॥ १६ ॥ यह है कैसी अष्टधा भिन्न । पूछता है यदि यह मन । कहता हूं अब विवेचन । सुन तू यह ॥ १७ ॥ आप तेज तथा गगन । धरणी मारुत औ' मन । बुद्धि अहंकार है भिन्न । ये भाग आठ ॥ १८ ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥ औ' इन आठोंकी जो समावस्था । मेरी परमप्रकृति है पार्थ । उसका नाम है सुन व्यवस्था । जीव ऐसा ॥ १९ ॥ जड़को जो है जिलाता । चेतनको है चेताता । मनसे है मनवाता । शोक मोहादिक ॥ २० ॥ बुद्धिमें जो शक्ति है जानना । उसके सान्निध्यके कारण । अहंकार कौशल्यके कारण । उसने धरा जगत ॥ २१ ॥ पृथ्वी आप तथा तेज वायु आकाश पांचवा । मन बुद्धि अहंकार मेरी प्रकृति है यह ॥ ४ ॥ हुई ये अपरा मेरी दूसरी जान तू परा । जीव रूप बनके जो धरता विश्वको सब ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी २०२
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ सूक्ष्म प्रकृति जब लीलासे । पाती स्थूलके परिणामसे । निकलती है टंकसालसे । भूत सृष्टि ॥ २२ ॥ उद्बीज, जारज, स्वेदज, अंडज । टंकसालसे निकलते सहज । उसके मूल्य है समान महज । आकार भिन्न ॥ २३ ॥ होते हैं चौरासी लक्षके आकार । उसकी सीमा न जानता भांडार । भर जाता है आदिशून्यका घर । इन नाणोंसे ॥ २४ ॥ पंच भौतिक ऐसे बहुतसे । रंग रूप धरते हैं एकसे । उसको लिखती है नियमसे । स्वयं प्रकृति ही ॥ २५ ॥ नाण्य आकृतिका प्रसार करती । फिर उसको घट्या भी करती । कर्माकर्म व्यवहारमें कराती । प्रवर्तन स्वयं ॥ २६ ॥ जाने दो यह रूपक कुशल । कहता हूं तुझको मैं सरल । नाम रूपका विस्तार विशाल । करती है प्रकृति ॥ २७ ॥ तथा प्रकृति मुझमें बिंबित । इसमें नहीं है अन्यथा बात । तभी सृष्टिका आदि मध्य अंत । जानो मुझको ही ॥ २८ ॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥ यह जो रोहिणीका जल । उसका देखनेसे मूल । रवि-रश्मि नहीं केवल । है वह भानु ॥ २९ ॥ इसी भांति सुन किरीटी । परा प्रकृतिसे जो सृष्टि । उस पार जाय तो दृष्टि । वहां हूं मैं ॥ ३० ॥ इन दोसे सभी भूत होते उत्पन्न जान तू । उसीसे विश्व है सारा मैं ही हूं मूल अंत भी ॥ ६ ॥ नहीं है दूसरा तत्व मुझसे पर जो रहे । पिरोया मुझमें सारा धागेमें मणि मान जो ॥ ७ ॥ २०३ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा हू मै सबका आधार । मुझमें सृष्टि स्थिति संहार । जैसा मणियोंमें होता डोर । आधार रूप ॥ ३१ ॥ जैसे सुवर्णके मणि किये । सुवर्ण सूत्रमें वे पिरोये । वैसे सृष्टिका धारण किये । रहा हूं मै ॥ ३२ ॥ रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥ इसीलिये उदकमें रस । अथवा पवनमें जो स्पर्श । तथा शशि सूर्यमें प्रकाश । वह मै ही जान ॥ ३३ ॥ वैसा ही नैसर्गिक शुद्ध । पृथ्वीमें रहता जो गंध । तथा गगनमें मै शब्द । प्रणव वेदमें ॥ ३४ ॥ नरमें जो होता नरत्व । अहंभावका जो है सत्व । वह पौरुष मैं औ' तत्व । कहता तुझे ॥ ३५ ॥ अग्निका भी अर्जुन ऐसा ही है । वह तेजका निरा कवच है । उसके परे जो निज तेज है । वह मै ही जान ॥ ३६ ॥ तथा जो नानाविध योनियोंमें । जनमके प्राणी त्रिभुवनमें । आचरण करते हैं जीवनमें । अपने पार्थ ॥ ३७ ॥ एक पवन ही है पीता । दूसरा तृणार्थ है जीता । कोई अन्नाधार रहता । जलपे एक ॥ ३८ ॥ सब भूतोंका जो है अन्न । प्रकृतिवश है जीवन । उन सबमें जो अभिन्न । मै ही केवल ॥ ३९ ॥ हुवा मैं रस पानीमें प्रकाश चंद्र-सूर्यमें । वेदमें ॐ 'ख' में शब्द नरोंमें पुरुषार्थ मैं ॥ ८ ॥ मैं पुण्य गंध पृथ्वीमें उष्णता अग्निमें बना । .आयुष्य प्राणि-मात्रोंमें तापसोंमें बना तप ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी २०४
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥ विश्वोत्पत्तिके कालमें जो था । गगन अंकुरसे खिलाथा । अंतमें अक्षर निगलाथा । प्रणव पटके ॥ ४० ॥ अब यह विश्वाकार रहता । विश्वके समानही है दीखता । महा-प्रलय दशामें है होता । निराकार ॥ ४१ ॥ ऐसा अनादि जो सहज । वह मैं ही हूं विश्व-बीज । हथेली पर वह आज । देता हूं तुझे ॥ ४२ ॥ इस पर पांडुकुमार । करेगा गंभीर विचार । इसका प्रभाव सुंदर । होगा श्रेष्ठ ॥ ४३ ॥ जाने दो अप्रासंगिक आलाप । अब न बोलूंगा ऐसा संक्षेप । जान तपस्वियोंमें है जो तप । वह रूप है मेरा ॥ ४४ ॥ बलियोंमें है जो बल । रहता है जो अचल । बुद्धिवंतोंमें केवल । बुद्धि है मैं ॥ ४५ ॥ भूतमात्रोंमें है जो काम । जिससे उत्कर्ष हो धर्म । मैं हूं कहता आत्माराम । जान निश्चल ॥ ४६ ॥ अन्यथा जो विकारोंके रूपमें । पडे इंद्रियानुकूल कर्ममें । किंतु धर्म-विरुद्ध पथमें । जाने नहीं देता ॥ ४७ ॥ शास्त्र निषिद्ध कर्मका जब कुपथ । तज चलता विहित कर्मका पथ । तब रहता नित मशालची साथ । धर्म-रूप ॥ ४८ ॥
बीज जो सब भूतोंमें वह हूं मैं सनातन । तेज मैं तेजस्वियोंमें बुद्धि मैं बुद्धिमानमें ॥ १० ॥ वैराग्य-युक्त निष्काम बल मैं बलवानका । धर्मसे अविरोधी मैं भूतोंकी काम-वासना ॥ ११ ॥ २०५ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा काम तेज देता चलता । जिससे होती धर्मकी पूर्णता । संसारमें मुक्ताफल भोगता । मोक्षतीर्थका वह ॥ ४९ ॥ तब श्रुति-गौरवके मांडवेपर । बढ़ाता काम सृष्टि-लताका अंकुर । सुकर्म फल सह पल्लव सुंदर । पहुंचते मोक्षतक ॥ ५० ॥ ऐसा जो काम है धर्म विहित । जिसमें सृष्टिका बीज निहित । वह हूं मैं कहता जगन्नाथ । अर्जुनसे ॥ ५१ ॥ कहना कितना भिन्न भिन्न । वस्तुमात्र मुझसे उत्पन्न । जिससे भरा है त्रिभुवन । जान तू पार्थ ॥ ५२ ॥ ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥ जो हैं ये सात्विक भाव । या रज-तमादि सर्व । वे मम रूप संभव । जान तू यहां ॥ ५३ ॥ हुए ये यदि मुझसे ही । इसमें मैं रहता नहीं । स्वप्न कुंडमें डूबे नहीं । जागृति जैसी ॥ ५४ ॥ नहीं तो बीज होता ठोस । जैसे जमा हुआ ही रस । फूटके कौपल सरस । बनता काष्ठ ॥ ५५ ॥ फिर कहो उस काष्ठमें सभी । बीजपन रहता है क्या कभी । वैसा दीखता विकार कर भी । नहीं मैं विकारमें ॥ ५६ ॥ अथवा गगनमें घिरते बादल । उनमें न रहता गगन केवल । अथवा बादलमें होता है सलिल । जलमें नहीं अभ्र ॥ ५७ ॥ फिर उस जलके आवेशसे । दीखता लखलख तेज जैसे । किंतु उस तेजमें जल वैसे । रहता है क्या ॥ ५८ ॥ जैसे अग्निसे है धूम होता । धूममें क्या अग्नि है रहता । वैसे विकरके भी नहीं होता । विकृत मैं कभी ॥ ५९ ॥ मुझसे हैं बने भाव सत्व राजस तामस । इनमें न रहता मैं रहते मुझमें यही ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी २०६
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥ मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ढक दिया है— जलसे हुई जलकुंभी जैसे । छिपा देती है सलिलको वैसे । झूठे ही घटोंके आवरणसे । छिपता आकाश ॥ ६० ॥ अजी ! स्वप्न यह मिथ्या सब । आप हुआ निद्रावश तब । आती उसकी प्रतीति जब । समरसता है क्या ॥ ६१ ॥ अजी ! पानी ही जो आंखका । रूप लेता जब झिल्लीका । देखना ही वह आंखका । मिटा देता ॥ ६२ ॥ ऐसी ही यह मेरी माया । बनी त्रिगुणात्मक छाया । उसने मुझे है छिपाया । आवरण बन ॥ ६३ ॥ प्राणिमात्र तभी मुझे नहीं जानते । मेरे होकर भी मद्रूप नहीं होते । जल होकर जलमें न गलते । मोति जैसे ॥ ६४ ॥ माटीसे बनाया हुआ जो मटका । तुरंत मिलानेसे होता मृत्तिका । किंतु आगमें जला हुआ मटका । रहता खपरा बन ॥ ६५ ॥ वैसे भूतमात्र सर्व । हैं मेरे ही अवयव । किंतु अविद्यासे .जीव । बने हैं जो ॥ ६६ ॥ तभी ये मेरे होकर भी मैं नहीं । मेरे होकर भी मुझे जानते नहीं । अहं ममताकी भ्रांतिमें ही यही । हुए विषयांध ॥ ६७ ॥ दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥ अहं ममताकी भ्रांतिके कारण जन्ममरण-चक्र—मायानदी—
इन्हीं त्रिगुण भावोंने किया है विश्व मोहित । जिससे मैं नहीं ज्ञात गुणातीत सनातन ॥ १३ ॥ दैवी गुणमयी माया मेरी है अति दुस्तर । मेरी शरण जो आते इसको तरते वही ॥ १४ ॥ २०७ ज्ञान-विज्ञानयोग
महदादि है यह मेरी माया । उसे पार करके धनंजय । होना है मद्रूपमें जो विलय । किस भांतिसे ॥ ६८ ॥ टूटे कगारसे जो ब्रह्माचलके । उमंगसे मूल संकल्प जलके । उठे हैं बुल्ले पंचमहाभूतोंके । छोटेसे वहां ॥ ६९ ॥ सृष्टि विस्तारके जो ओघसे । काल-ग्रास शक्तिके वेगसे । प्रवृत्ति निवृत्तिके कूलसे । बहती उमड़कर ॥ ७० ॥ जो गुण-घनकी महा-वृष्टिसे । भरी है मोहके महा-पूरसे । काटकर ले जाती है वेगसे । यम नियम नगर ॥ ७१ ॥ भरी है जो द्वेषावर्त्तोसे । मत्सरादि बडे मोड़ोंसे । तथा भयानक मीनोंसे । प्रलोभनके ॥ ७२ ॥ चक्कर हैं उसमें प्रपंचके । महापूर आते कर्माकर्मके । ऊपर तरते सुख दुःखके । झाग-पुंज ॥ ७३ ॥ वहां द्वीप पर हैं रतीके । टकराते तरंग कामके । दीखते हैं जीव समूहके । झाग पुंज ॥ ७४ ॥ अंतः प्रवाह अहंकारके । उबाल आते मदत्रयके । उठे तरंग विषयोर्मिके । पुनः पुनः ॥ ७५ ॥ जहां रेलेसे उदयास्तके । गढे पड़ते जन्म मृत्युके । बुल्ले उसमें पंच भूतके । उठते औ' फूटते ॥ ७६ ॥ संमोह विभ्रम हैं मीन जिसके । निगलते कौर सात्विक धैर्यके । वक्र गतिसे चलते अज्ञानके । भंवर भी जहां ॥ ७७ ॥ जहां भ्रांतिके गंदले जलमें । फंसता जीव आशाके पंकमें । रजोगुणकी खलबलीमें । गूंजता स्वर्ग ॥ ७८ ॥ वहां है तमकी तीव्रधार । सत्वकी है स्थिर औ' गंभीर । यह तैरनेमें भयंकर । माया-नदी ॥ ७९ ॥ पुनर्जन्मके उत्तंग तरंग । छूते सत्य-लोकके गिरिश्रृंग । ढलती जिससे शिला भी संग । ब्रह्मलोककी ॥ ८० ॥ महानदीका यह पूर । वह जाता जो भयंकर । करे कौन इसको पार । धनंजय ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी २०८
यहां है एक और आश्चर्य । करते हैं जो तरणोपाय । होता है वह सब अपाय । वह कैसा जान ॥ ८२ ॥ बुद्धि बाहूसे जो तरने गये । पता नहीं चला वे कहां गये । अभिमान डोहमें डूब गये । ज्ञानमानी जो ॥ ८३ ॥ लिया जिन्होंने वेदोंका आश्रय । साथ ही दिया मानको प्रश्रय । हुए वे मद-मीनमें ही लय । पूर्ण रूपसे ॥ ८४ ॥ जिसने किया तारुण्यका साथ । उसपे पड़ा मन्मथका हाथ । उसे विषय मगरके दांत । चबाते सदा ॥ ८५ ॥ फिर वृद्धावस्थाका जाल । मति-भ्रम कंप जंजाल । कसता जाता पल पल । चहूं ओरसे ॥ ८६ ॥ पटकता फिर शोक तीर पर । क्रोधावर्तमें नित उलझाकर । जब उठाते हैं उसमेंसे सिर । कोंचते विपद्गृध्र ॥ ८७ ॥ रुते फिर दुःख पंकमें । फंसे नित मृत्यु-पाशमें । गये जो काम आश्रयमें । गये व्यर्थ ही जो ॥ ८८ ॥ यज्ञ-क्रियाके साधनसे । लैस होकर तरनेसे । स्वर्ग-कंदरामें जा फंसे । यकायक ॥ ८९ ॥ मुक्ति-किनारा जो पाने गये । कर्म-बाहूंका आसरा लिये । चक्करमें ही उलझ गये । विधि-निषेधके ॥ ९० ॥ वहां वैराग्य नांव नहीं जाती । विवेकको थाह नहीं मिलती । योग-विद्या भी यदि काम आती । यदाकदा ही ॥ ९१ ॥ अपना बल लगाकर । माया-नदीको तैर कर । पार करनेका विचार । व्यर्थ ही है ॥ ९२ ॥ कुपथ्यशीलकी मिटे व्याधी । साधु जाने दुर्जनकी बुद्धि । अथवा लोभी त्यजे श्रीसिद्धि । हाथमें जो आयी ॥ ९३ ॥ अथवा दंड डरे चोरसे । कांटा निगला जावे मीनसे । तथा काय लडे भूतसे । वैसे ही पार्थ ॥ ९४ ॥ या जाल कुतरे मृग-छौना । चींटीका हिमगिरि लांगना । तभी है माया नदी तैरना । जीवसे साध्य ॥ ९५ ॥ २०९ ज्ञान-विज्ञानयोग (27)
अजी ! सुन तू पांडुसुता । कामी न जीतता वनिता । वैसी मायामय सरिता । न तैरता जीव ॥ ९६ ॥ किंतु सरते सहज लीलासे । भजते मुझे जो सर्व भावसे । सूखा उनके इसी तीरसे । मायाका जल ॥ ९७ ॥ सद्गुरु मांझी उनके साथ । प्रतीतिका बल उनके हाथ । आत्म-निवेदनकी है सतेज । डांगी ही जो ॥ ९८ ॥ अहंभावका जो तजकर भार । विकल्प आंधीका झांका ढालकर । अनुराग जलावेगका उतार । लेकर टोह ॥ ९९ ॥ फिर लिया ऐक्यका आधार । उसे जोडा बोधका उतार । तब निवृत्तिका पैल-तीर । जीत लिया ॥ १०० ॥ उपरतिका चप्पू मारकर । सोऽहंभावका साम्य साधकर । फिर चले निवृत्ति तट पर । सहज भावसे ॥ १ ॥ इस उपायसे जो मेरे हुये । वे सब मेरी माया तर गये । ऐसे भक्त भी क्वचित ही भये । नहीं अधिक ॥ २ ॥ न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥ चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ सभी अहंकारकी भूत-चेष्टामें आते हैं— अन्य जन हैं जो अवांतर । अहंकारका भूत संचार । होनेसे विस्मृत निरंतर । आत्म-बोधसे ॥ ३ ॥ हीन मूढ दुराचारी मेग आश्रय छोड़के । भ्रात होकर मयासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ १५ ॥ भक्त चार सदाचारी भजते मुझको नित । ज्ञानी तथैव जिज्ञासू अर्थार्थी पार्थ विव्हल ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी २१०
होता नियम-पटका विस्मरण । अधोगतिका रहता नहीं भान । किया जाता शास्त्र-निषिद्ध ही जान । अकार्य सब ॥ ४ ॥ क्यों किया शरीरका आश्रय । भूलकर ही मूल उद्देश्य । तदर्थ करणीय जो कार्य । छोडकर ॥ ५ ॥ इंद्रिय-ग्रामके चौराहेपर । अहं ममताके गप्पोंमें भर । विकारोंके समुदाय अपार । जुटाते रहते ॥ ६ ॥ दुःख-शोकके घावोंसे । प्रहारोंके विचारसे । बेभान माया-तमसे । ग्रस्त हैं जो ॥ ७ ॥ इसीलिये वे बिछुडे मुझसे । अन्य जो भजते चतुर्विधसे । उन्होंने आत्महित है जिससे । किया वृद्धिगत ॥ ८ ॥ चार प्रकारके मेरे भक्त --- पहला आर्त कहलाता । दूसरा जिज्ञासू बनता । तीसरा अर्थार्थी है होता । चौथा है जो ज्ञानी ॥ ९ ॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ दुःखी होनेसे भजता आर्त । जिज्ञासु भजता है ज्ञानार्थ । तीसरा है भजता अर्थार्थ । धनंजय ॥ ११० ॥ मत्प्रिय ज्ञानी भक्त— अब बात चौथेकी रही । उसको करणीय नहीं । वही एक भक्त है सही । ज्ञानी है जो ॥ ११ ॥ होता है जो ज्ञानके प्रकाशसे । मुक्त सदा भेदाभेद तमसे । रहता मद्रूप-समरससे । तथा भक्त भी जो ॥ १२ ॥ श्रेष्ठ है सबमें ज्ञानी नित्य-युक्त अनन्य जो । उसे मैं प्रिय अत्यंत वह भी प्रिय है मुझे ॥ १७ ॥ २११ ज्ञान-विज्ञानयोग
जैसे सामान्य दृष्टिसे स्फटिक । आभास होता है मानो उदक । वैसा लगता ज्ञानी सकौतुक । नहीं है ज्ञानी ॥ १३ ॥ पवन जब गगनमें घुल जाता । उसका अस्तित्व भिन्न नहीं रहता । ज्ञानीका समरसमें विलय होता । रहता जैसे ॥ १४ ॥ हिलकर देखा पवन । दीखता गगनसे भिन्न । वैसे स्वभावसे गगन- । जैसे रहता ॥ १५ ॥ ज्ञानी वैसे काया-कर्मसे । दीखता उपासक जैसे । आंतरिक अनुभावसे । मद्रूप है जो ॥ १६ ॥ किंतु वह ज्ञानके प्रकाशसे । अनुभवता तत्वमसि ऐसे । मैं भी कहता तब आनंदसे । है वह “मम आत्मा” ॥ १७ ॥ जो जीव भाव परका बोध पाकर । करना जानता शुद्ध व्यवहार । पानेसे वह केवल भिन्न शरीर । मुझसे भिन्न है क्या ॥ १८ ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥१८॥ ऐसे अपने स्वार्थके लोभसे । भक्त बनकर चिपकते मुझसे । किंतु मैं प्रेम करता जिनसे । वह है ज्ञानी मात्र ॥ १९ ॥ अजी ! दूध पय घृतकी जो आशा । उलझाती लोगोंसे गयको फांसा । किंतु उस पाशके बिन भी कैसा । दूध पाता है बछड़ा ॥ १२० ॥ क्यों कि वह तन मन प्राणसे । न जाने अन्य कुछ भी जिससे । जो सामनेसे दीखता है उसे । मानता माय मेरी ॥ २१ ॥ इस भांति जो हैं अनन्य गति । तभी करती है गाय भी प्रीति । इसलिये कहता लक्ष्मीपति । वह है यथार्थ ॥ २२ ॥ रहने दो फिर वे बोले । अब तुझसे हम बोले । वे तीन भक्त भी भले । भाते हैं मुझको ॥ २३ ॥ हैं ये उदार सारे ही ज्ञानी तो स्व-समान है । मुझमें स्थिर जो युक्त गति अंतिम जानके ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी २१२
किंतु जिसने मुझे जानकर । मुड़कर देखा नहीं संसार । सरिता सागरको प्राप्तकर । न मुड़ती जैसे ॥ २४ ॥ जिसके हृदय गह्वरमें उगम । अनुभव गंगाका मुझसे संगम । कैसे गायें फिर महिमा अनुपम । शब्दोंसे उसकी ॥ २५ ॥ अजी ! जो ज्ञानी कहलाता है । वह तो मेरा चैतन्य ही है । यह बात कहनेकी नहीं है । कहता हूं तुझसे ॥ २६ ॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥ ज्ञानी भक्तिका महान् अनुभाव— वह तो घने वनमें विषयोंके । आया है आतंकसे काम-क्रोधके । पाकर छुटकारा सद्वासनाके । पहाड़पर ॥ २७ ॥ फिर वह साधु-संगसे धनुर्धर । विहित कर्म-पथ पर चलकर । निषिद्ध-प्रवृत्ति पथ छोड़कर । कर्म-मार्गसे ॥ २८ ॥ शत-जन्मोंका है प्रवास करता । फलाशाका जूता नहीं पहनता । फल-हेतुका लेख कौन लिखता । ऐसी स्थितिमें ॥ २९ ॥ शरीर संयोगकी रातमें ऐसे । सर्व-संग त्यागकी सिद्धतासे । दौडनमें पौ फटी अनायाससे । कर्मक्षयकी ॥ १३० ॥ फिर चमकी उषा गुरु-कृपाकी । खिल फैली स्वर्ण-किरण ज्ञानकी । वहां प्रतीति हुई साम्य-सिद्धिकी । अंतर दृष्टिमें ॥ ३१ ॥ जिस ओर देखो तब मैं हूं । एकांत लोकांतमें मैं ही हूं । सदा सर्वत्र मैं एक ही हूं । मैं ही उसका ॥ ३२ ॥ उसके लिये सदा सर्वत्र कहीं । मैं छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं । तलावमें डूबी गगरीको कहीं । जैसे जल सर्वत्र ॥ ३३ ॥ होता है वह मेरे भीतर । उसको मैं बाहर भीतर । इसको शब्दोंमें गूंथकर । कहा नहीं जाता ॥ ३४ ॥ अनेक जन्मके पीछे पायो हैं शरणागति । विश्व देखें वासुदेव संत है अति दुर्लभ ॥ १९ ॥ २१३ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा होता वह ज्ञान-सागर । जिससे सदा बाहर भीतर । देखता आत्म-रूप निरंतर । विश्वमें आप ॥ ३५ ॥ यह समस्त है श्रीवासुदेव । प्रतीति रससे ढला है भाव । इसीलिये भक्तमें वह राव । तथा ज्ञानियोंमें भी ॥ ३६ ॥ उसका अनुभव भंडार । भरता है जंगम स्थावर । ऐसा महात्मा हे धनुर्धर । दुर्लभ मिलना ॥ ३७ ॥ नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे आराधना करनेवाले अनेक— ऐसे बहुत आते हैं अर्जुन । करते हैं जो भोगार्थ भजन । आशा तमसे जिनके नयन । हुए अति-मंद ॥ ३८ ॥ कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताःस्वया ॥ २० ॥ होती जब फलकी तीव्र आस । हृदयमें होता काम प्रवेश । बुझाता है उसका सहवास । ज्ञान-दीपको ॥ ३९ ॥ पडनेसे ऐसा उभय अंधार । समीपस्थ मुझको वे भुलाकर । होते हैं सर्व भावसे अनुचर । देवताओंके ॥ १४० ॥ पहलेसे जो दास है प्रकृतिके । उसीमें वश है भोग लालसाके । लोलुपतासे रचते हैं पूजाके । महोत्सव ॥ ४१ ॥ क्या है उसकी नियम-बुद्धि । कैसी है उपचार-समृद्धि । अर्पण करते हैं यथाविधि । विहित रूपसे ॥ ४२ ॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ भ्रांत जो कामना ग्रस्त पूजते अन्य दैवत । स्वभाव वश अज्ञानी उनके ही विधानसे ॥ २० ॥ पूजना चाहते जैसे श्रद्धासे जिस रूपको । जैसी है जिसकी श्रद्धा करता स्थिर मैं स्वयं ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी २१४
किंतु जो है अन्य देवता । भजनेकी चाह करता । इच्छा पूर्तिमें ही करता । उनकी भी ॥ ४३ ॥ देव-देवीमें मैं ही रहता । यह भी वह नहीं जानता । सबमें वह भाव धरता । भिन्न भिन्न ॥ ४४ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥ फिर है वह श्रद्धायुक्त । आराधनामें जो उचित । सिद्धि तक सब समस्त । करता रहता है ॥ ४५ ॥ जैसा है जिसका भाव । वैसा फल देता देव । मिलता वह सदैव । मेरे ही कारण ॥ ४६ ॥ अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥ अन्य देवताओं द्वारा पाये गये भोग नाशवंत होते हैं किंतु भक्त वे मुझे नहीं जानते । कल्पनाके बाहर नहीं पड़ते इसीलिये कल्पित फल हैं पाते । नाशवंत जो ॥ ४७ ॥ अजी ! ऐसा जो यह भजन । वह है संसारका ही साधन । यहां फल भोगका ही स्वप्न । दीखे क्षणभर ॥ ४८ ॥ फिर जो भाता है दैवत । जिसका यजन सतत । होता है वही जिसे प्राप्त । धनंजय ॥ ४९ ॥ यहां जिसके तनमन प्राण । करता सतत मेरा स्मरण । होता है जब उसका निर्वाण । पाता मद्रूप ॥ १५० ॥ उसी श्रद्धा-शक्तिसे तो पूजते उस रूपको । मांगे जो उससे भोग पाते मेरे विधानसे ॥ २२ ॥ नाशवंत फल पाते जन जो अल्प बुद्धिके । देवोंके भक्त देवोंको मेरे जो मुझसे मिले ॥ २३ ॥ २१५ ज्ञान-विज्ञानयोग
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥ किंतु ऐसा न करके प्राणिजात । व्यर्थ ही खोता है जो अपना हित । मानो तैरते हैं जलमें सतत । हथेलीके ही ॥ ५१ ॥ या अमृतकुंडमें डूबकर । होठोंको दृढतासे दबाकर । स्मरण करता है निरंतर । डबरेका पानी ॥ ५२ ॥ किसलिये यह ऐसा करना । अमृतमें डूबकर मरना । सुखसे अमर क्यों नहीं होना । अमृतमें ही ॥ ५३ ॥ फलशाका पिंजडा तजकर । अनुभव पंखसे धनुर्धर । क्यों न करें चिदंबर संचार । समर्थ भावसे ॥ ५४ ॥ चिदाकाशमें ऊंचाई पर । करें सुखसे उन्मुक्त संचार । उसका है अनंत विस्तार । अपनाही ॥ ५५ ॥ असीम पर क्यों सीमाका नियमन । मुक्त निराकारको आकार बंधन । स्वयंसिद्धका करना क्यों बलिदान । साधन पर ॥ ५६ ॥ किंतु मेरा यह कथन । विचारान्तमें भी अर्जुन । न करेगा जीवोंका मन । इसका स्वीकार ॥ ५७ ॥ नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नामिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥ मैं सर्वव्यापी हूं किंतु -- क्यों कि योगमायाके परदेसे । अंधत्व आनेके कारणसे । न देखता प्रकाश बलसे । मुझको कभी ॥ ५८ ॥ पूजते व्यक्त हो रूप बुद्धि-हीन न जानके । अव्यक्त श्रेष्ठ जो रूप मेरा अंतिम शाश्वत ॥ २४ ॥ घिरा मैं योग मायासे न हूं प्रकट विश्वसे । अजन्मा नित्य मैं ऐसा न जाने मूढ लोग जो ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २१६
ऐसा देखे तो मैं नहीं । ऐसी वस्तु नहीं कहीं । जैसा पानी होता नहीं । रसके बिना ॥ ५९ ॥ पवन किसको नहीं छूता । आकाश कहां नहीं रहता । वैसी ही सर्वत्र व्यापकता । एक मात्र मेरी ॥ ६० ॥ वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥ अतीतमें जितने भूत । मैं ही वे जान तू सतत । आज हैं विश्वमें जो पार्थ । वे भी मैं हूं ॥ ६१ ॥ भविष्यमें होंगे जितने ही । अलग मुझसे वे भी नहीं । यह बात है कहनेकी ही । वैसा न होता कछु ॥ ६२ ॥ अजी ! रज्जूके भुजंगको जैसे । काल पीला न कह सके ऐसे । भूतमात्र सब मिथ्यापनसे । हैं अनिश्चित ॥ ६३ ॥ सदा मैं सुन पांडुसुत । होने पर भी अखंडित । संसार ग्रस्त सब भूत । अन्य प्रकारसे ॥ ६४ ॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥ कहता हूं इसका कारण । अब तू ध्यान देकर सुन । अहंकार-तनका वरण । हुआ तब ॥ ६५ ॥ जन्म हुआ कुमारीका । आया उसे यौवन कामका । हुआ द्वेषसे ब्याह उसका । सुनो तब ॥ ६६ ॥ आपत्य हुआ उन दोनोंके । द्वंद्व मोह नाम हैं उनके । बड़े वह प्यारमें दादाके । जो था अहंकार ॥ ६७ ॥ हुये जो और जो होंगे भूत हैं आज जो यहां । सबको जानता हूं मैं मुझे कोयी न जानते ॥ २६ ॥ राग औ' द्वेषसे उठे चित्तमें मोह-द्वंद्व जो । जगतके सभी प्राणि घिरे हैं इससे यहां ॥ २७ ॥ २१७ ज्ञान-विज्ञानयोग (28)