भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 257

फिर कुछ कालान्तरसे । उस स्थैर्यके कारणसे । पास आयेगा सहजसे । आत्म-स्वरूपके ॥ ८३ ॥ उसे देख मन होता तद्रूप । फिर डूबेगा अद्वैतमें द्वैत । होगा ऐक्य तेजसे प्रकाशित । त्रिभुवन सारा ॥ ८४ ॥ दीखते जो गगनमें भिन्न । होते वे भेद जब बिलीन । तब भरा रहता गगन । त्रिलोकमें जैसा ॥ ८५ ॥ जिसका जब ऐसा लय होता । तब मात्र चैतन्य ही रहता । ऐसी सुलभतासे प्राप्त होता । महासुख ॥ ८६ ॥ युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥ सर्वत्र परमात्म दर्शनका सहज मार्ग-- ऐसी सुगम योग-स्थितिका । अनुभव है बहुत जनका । संकल्पकी सब संपत्तिका । करके त्याग ॥ ८७ ॥ सब वे अनायाससे ऐसे । विलीन हुए पर-ब्रह्मसे । होता जैसे लवण पानीसे । अभिन्न रूप ॥ ८८ ॥ मिलन होता है इस रूपमें । समरसके महा-सदनमें । दीखता है तब त्रिभुवनमें । महा-दीपोत्सव ॥ ८९ ॥ यह है अर्जुन अपने ही पगसे । चलना अपनी ही पीठपर जैसे । यह है असंभव यदि तुझसे । कहता हूँ अन्य मार्ग ॥ ३९० ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥ ऐसा निष्पाप जो योगी आत्मामें स्थिर होकर । सुखसे भोगता नित्य ब्रह्मानंद अपार जो ॥ २८ ॥ भूतोंमें पूर्ण है आत्मा आत्मामें भूत है भरे । देखता योगसे युक्त सर्वत्र सम दर्शन ॥ २९ ॥ १८७ आत्म-संयमयोग