ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 258, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं हूं जैसे सकल देहमें । वैसे हैं सकल ही मुझमें । विचार करना हे इसमें । कुछ नहीं अन्य ॥ ९१ ॥ यह है ऐसा ही बना हुआ । परस्पर सभी घुला हुआ । किंतु बुद्धिसे है माना हुआ । होना सब ॥ ९२ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥ नहीं तो भी अर्जुन । एकत्वकी भावना । सर्वभूत अभिन्न । भजते मुझे ॥ ९३ ॥ जीव-जातिका अनेकपन । न मानता जो अंतःकरण । सर्वत्र एकत्व अनुदिन । मानता मेरा ॥ ९४ ॥ वह है मुझमें ही विलीन । व्यर्थका ऐसा वचन । न कहने पर भी तू जान । वह है मैं ही ॥ ९५ ॥ जैसे दीप और प्रकाश । वैसे हैं दोनों समरस । उसका है मुझमें वास । मेरा उसमें ॥ ९६ ॥ जैसे पानीमें है भीनापन । या गगनमें है पोलापन । मेरे लावण्यसे लूनापन । पाता हे वह ॥ ९७ ॥ सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ जिसकी ऐक्यकी दृष्टिमें । मैं ही समस्त हूँ सबमें । जैसे दीखता है पटमें । सूत सर्वत्र ॥ ९८ ॥ सबमें मुझको देख मुझमें देखता सब । वियोग न उसे मेरा मुझे न उसका कभी ॥ ३० ॥ भजता है मुझे एक स्थिर हो सब भूतमें । कैसे भी रहता योगी रहता मुझमें वह ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी १८८