भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार । ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥ अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल । अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥ यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता । अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥ मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान । कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥ यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है । उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥ आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥ उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान । स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥ सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म । ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥ ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व । मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥ कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण । मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥ अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन । किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥ अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना । कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥

सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो । सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥ १८९ आत्म-संयमयोग