ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार । ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥ अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल । अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥ यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता । अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥ मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान । कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥ यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है । उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥ आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥ उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान । स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥ सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म । ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥ ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व । मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥ कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण । मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥ अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन । किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥ अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना । कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥
सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो । सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥ १८९ आत्म-संयमयोग
इसीलिये मैं तुझसे सतत । कहता हूं रहो साम्यमें रत । साम्यसे बड़ा नहीं कुछ प्राप्त । रहता त्रिभुवनमें ॥ ४१० ॥ अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ चंचल मनको कैसे स्थिर किया जाय-- कहता है “देव !” अर्जुन । तू कहता है सकरुण । किंतु मनकी उलझन । टिकने नहीं देती ॥ ११ ॥ यह कैसा कितना है मन । इसका नहीं होता है भान । किंतु छोटा माना त्रिभुवन । भटकनेमें इसके ॥ १२ ॥ तब यह ऐसा होगा जी कैसा । मर्कट समाधि लगाये कैसा । अंधड रोकनेसे रुके कैसा । लगता असंभव ॥ १३ ॥ अजी ! वह बुद्धिको है छलता । उसके निश्चयको है टालता । धीरजको छकाकर भागता । झांसा देकर ॥ १४ ॥ विवेकको है भरमाता । तृप्तिको चाहकी लव लगाता । आसनस्थको भी मटकाता । दश दिशामें ॥ १५ ॥ पकडनेसे जो अधिक उछलता । निग्रहको अपना साथी बना लेता । अपना स्वप्न छोडनेकी शक्यता । न दीखती मनकी ॥ १६ ॥ अर्जुनने कहा अब तू मुझसे बोला साम्य योग जनार्दन । दीखे न इसका स्थैर्य क्यों कि चंचल है मन ॥ ३३ मन चंचल अत्यंत प्रमत्त बलवान जो । दीखे दुष्कर वायुसा निग्रह उसका मुझे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १९०
ऐसा मन निश्चल होगा । हमें तब साम्य मिलेगा । ऐसा कुछ भी नहीं होगा । दीखता यह ॥ १७ ॥ भगवान उवाच संशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥ अभ्यास और वैराग्यसे मानवी-मन स्थिर होता है— कृष्ण कहता सच है बात । तू कहता है यह निश्चित । इस मनकी यही हालत । चंचल स्वभाव ॥ १८ ॥ किंतु लेकर वैराग्यका आधार । तथा अभ्याससे उसे मोडकर । परिश्रम करनेसे होगा स्थिर । कालांतरमें वह ॥ १९ ॥ मनकी बात है एक नेक । ललचे रसमें सकौतुक । दिखाना आत्मानुभव सुख । संकेतसे सतत ॥ ४२० ॥ असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥ जिनमें विरक्ति है नहीं । अभ्यासमें वे आते नहीं । उनका मन स्थिरता नहीं । यह जानते हम ॥ २१ ॥ राह न देखी यम नियमोंकी । कभी भेंट नहीं की वैराग्यकी । विषय सागरमें दे डुबकी । बैठ रहे जो ॥ २२ ॥ मनको कभी जन्मसे कहीं । युक्तिका चिमटा दिया नहीं । तब वह स्थिर होगा कहीं । कहांसे भला ॥ २३ ॥ श्री भगवानने कहा अवश्य मन दुःसाध्य कहता तू सही यह । जान तू साध्य होता है अभ्यास औ' विरागसे ॥ ३५ ॥ बिन संयमके योग मानता हूं असाध्य मैं । होता प्रयत्नसे साध्य संयमीको उपायंसे ॥ ३६ ॥ १९१ आत्म-संयमयोग
मनका निग्रह करना होगा । उपाय ऐसा करना पड़ेगा । तब वह स्थिर न कैसा होगा । देखेंगे हम ॥ २४ ॥ तब क्या सारे योगासन । व्यर्थके क्या ये अनुष्ठान । किंतु होती नहीं साधना । कहो हमसे ॥ २५ ॥ अपनेमें यदि होता है योग-बल । तब होता है कितना मन चंचल । यह महत्तत्व आदि जो सकल । आधीन अपने ॥ २६ ॥ अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥ एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥ अर्जुन कहता तब यह उचित । देव नहीं कहता है कभी गलत । योग बल सम्मुख होती क्या बात । मनके बलकी ॥ २७ ॥ किंतु न जानते हम योग है कैसा । उसके ज्ञानकी गंध भी नहीं जैसा । तभी कहते मन अनिर्बंध ऐसा । अयासके बिन ॥ २८ ॥ अर्जुनने कहा श्रद्धायुक्त यत्न-हीन योग-चलित चित्त जो । कौनसी गति पायेगा योगकी सिद्धिके बिना ॥ ३७ ॥ होगा क्या उभय भ्रष्ट भूलके ब्रह्म मार्गको । नाश पाता निराधार टूटे बादल-सा कहीं ॥ ३८ ॥ मेरा संशय श्रीकृष्ण मूलता दूर तू कर । तेरे बिन नहीं कोई करेगा दूर जो इसे ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी १९२
जन्म भरमें देव अभी हम । तब प्रसादसे पुरुषोत्तम । सुन सके योग विद्याका मर्म । इस क्षणमें यहां ॥ २९ ॥ साधना अधूरी रही तो ?— किंतु देव और एक । मनमें है अकथक । तुझसे कौन है नेक । दूर करेगा ॥ ४३० ॥ कह तू हे गोविंद । कोई जो मोक्ष-पद । चाहता है सबद । बिना युक्तिके ॥ ३१ ॥ निकला वह इंद्रिय-ग्रामसे । पथमें चला भी अति श्रद्धासे । आत्म-सिद्धिके महा उद्देश्यसे । आलिंगन करने ॥ ३२ ॥ किंतु न पहुंचा आत्म-सिद्धिको । लौट न सकता मूल स्थानको । गया बीचमें ही अस्ताचलको । आयुष्य-भानु ॥ ३३ ॥ अकालमें जैसे बादल । आ जाते हैं अति विरल । शायद आते हैं केवल । बरसते नहीं ॥ ३४ ॥ ऐसे खोये गये वे दोनोंसे । दूर हो अति मोक्ष-पदसे । पद न पानेकी निराशासे । श्रद्धाके कारण ॥ ३५ ॥ गया वह ऐसा समयाभावसे । तथा आत्म-सिद्धिकी महा-श्रद्धासे । उसकी गति अब बनेगी कैसे । कहना मुझे ॥ ३६ ॥ भगवान उवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥ सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती— कृष्ण कहते हैं तब पार्थ । जिसको मोक्ष-सुखकी आस्था । उसको मोक्ष बिन अन्यथा । नहीं गति ॥ ३७ ॥ श्री भगवानने कहा न होगा उसका नाश इस या उस लोकमें । कल्याण करके कोई नहीं पाता बुरी गति ॥ ४० ॥ १९३ आत्म-संयमयोग (25)
किंतु बीचमें इतना होता । उसे थोडा सुस्ताना पड़ता । इताना जो सुखमय होता । देवोंको भी दुर्लभ ॥ ३८ ॥ अभ्यास-पग यदि शीघ्र उठाता । फुर्तीसे वह डग यदि भरता । सहज वह आत्म-सिद्धि है पाता । समय रहते ही ॥ ३९ ॥ किंतु वेग नहीं जब उतना । होता है तब विवश सुस्ताना । फिर है निश्चित सिद्धि महान ।- धरोहर रूप ॥ ४४० ॥ प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥ सुन तू होता कैसा कौतुक । सायास करके शत-मख । पाते हैं जो वही पाता सुख । सहज कैवल्यका ॥ ४१ ॥ वहां भी फिर जो अमोघ । करता अलौकिक भोग । उससे उकताके तंग । लौटता वह ॥ ४२ ॥ विघ्न हैं क्यों यह यकायक । साधनामें जो बाधाकारक । स्वर्ग भोग भी तापदायक । मानता वह ॥ ४३ ॥ फिर वह संसारमें जन्म लेता । घर जो धर्मका सहारा रहता । सकल विभवश्रीका क्षेत्र होता । उसका अंकुर बन ॥ ४४ ॥ नीति पथसे जहां चलते । सत्य पूत ही उच्चारते । देखना है जो वही देखते । शास्त्र दृष्टिसे ॥ ४५ ॥ वेद ही जागृत देव जहां । सदाचार ही व्यापार वहां । सारासार विचारही जहां । बनता मंत्री ॥ ४६ ॥ जिस घरमें रहती चिंता । होकर ईश्वरकी पतिव्रता । जिससे रहती गृह देवता । आदि ऋद्धि ॥ ४७ ॥ निज पुण्यका जहां संचय होता । सकल सुखका व्यापार चलता । ऐसे कुलमें सुखसे जन्म लेता । योग-भ्रष्ट वह ॥ ४८ ॥ रहके पुण्य लोकोंमें जो योग-भ्रष्ट संतत । शुचि साधनवंतोंके घरोंमें जन्मता फिर ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी १९४
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥ या हैं जो ज्ञानग्निमें करते हवन । या ब्रह्मनिष्ठ वेदशास्त्रादि संपन्न । अथवा ब्रह्मसुखानुभूत महान । होते हैं पार्थ ॥ ४९ ॥ या सिद्धांत सिंहासनपे बैठकर । राज्य करते हैं त्रिभुवन पर । संतोष वनमें कोयल बनकर । कूकते रहते ॥ ४५० ॥ या विवेक ग्रामके हृदयमें । बैठ निरत हैं फलाहारमें । ऐसे महायोगियोंके घरमें । पाते हैं जन्म ॥ ५१ ॥ छोटीसी देहाकृतिमें ही उदित । निज ज्ञानका प्रातःकाल निश्चित । जैसे सूर्योदयके पूर्व होता नित । अरुणोदय वैसा ॥ ५२ ॥ वैसे अवस्थाकी राह न देखती । वयका गांव भी नहीं पूछती । बालपनमें ही है ब्याह लेती । सर्वज्ञता उसे ॥ ५३ ॥ सिद्ध प्रज्ञाके उसी लाभसे । सारस्वत प्रसवता है मनसे । फिर सकल शास्त्र हैं मुखसे । निकलते सहज ॥ ५४ ॥ ऐसा है वह दिव्य जन्म । जिसकेलिये हो सकाम । करते देव स्वर्गमें होम । सदा सर्वत्र ॥ ५५ ॥ अमरोंको है भाट बनना । मृत्यु-लोकके गुण हैं गाना । ऐसा है वह जन्म अर्जुन । पाता है जो ॥ ५६ ॥ अथवा प्राज्ञ योगीके कुलमें जन्मता वह । बडा दुर्लभ है ऐसा जन्म पाना जगतमें ॥ ४२ ॥ वहां जो पूर्व-जन्मके बुद्धि संस्कार पाकर । मोक्षार्थ करता यत्न पानेमें सिद्धि उत्तम ॥ ४३ ॥ १९५ आत्म-संयमयोग
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥ तथा पूर्व-जन्मकी जो सद्बुद्धि। जीवन पर्यंतकी जो अवधि। फिर वही आगे भी निरवधि। खिलती जाती ॥ ५७ ॥ पायालु है जो दैवयोगसे। औ' दिव्यांजन पडी आंखोंसे। देखती गुप्त संपदा जैसे। पातालकी भी ॥ ५८ ॥ वैसे दुर्भेद होते जो सिद्धांत। गुरु-करुणासे ही बुद्धिगत। करता है उन्हे ग्रहण चित्त। सहज भावसे ॥ ५९ ॥ इंद्रियां होती हैं मनके आधीन। मन होता है पवनमें विलीन। मूर्ध्न्याकाशमें सहज ही पवन। विलीन हो जाता ॥ ४६० ॥ होता है यह सहज भावसे। अभ्यास होता अपने आपसे। पूछने आती समाधि आपसे। मानसका घर ॥ ६१ ॥ मानो होता वह योगपीठका भैरव। अथवा हो कार्यारंभका गौरव। अथवा है वैराग्य सिध्दिक अनुभव। आया आकार लेकर ॥ ६२ ॥ जैसे यह संसार अंकनका नाप। अथवा अष्टांग योग साधन दीप। जैसे परिमलने ही लिया है रूप। चंदनका ॥ ६३ ॥ संतोषकी बनी मूर्तिसा। सिध्द समाजकी कीर्तिसा। होता योग्यताका पुंजसा। साधक दशामें ही ॥ ६४ ॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥ समय शतकोटिवर्षोंका। प्रतिबंध जन्म सहस्रका। लांघके पाया आत्म-सिध्दिक। किनारा वह ॥ ६५ ॥ पूर्वाभ्यास बलसे ही खींचे अवश होकर। योग-ज्ञान इच्छासे ही शब्दके पार शोधके ॥ ४४ ॥ यत्नसे रहके योगी दोषोंसे मुक्त होकर। अनेक जन्ममें पाता पूर्ण होके महापद ॥ ४५ ॥ ज्ञानेश्वरी १९६
तब है साधना मात्र संपूर्ण । करती उसका अनुकरण । जिससे पाता वह सिंहासन । विवेक राज्यका ॥ ६६ ॥ फिर वह गतिसे विवेककी । लांघ आता है सीमा विवेककी । बनता है वह विचारान्तकी । मूर्ति ही मानो ॥ ६७ ॥ मन-बादल वहां छटता । पवनका पवनत्व जाता । आकाशका भी विलय होता । अपनेमें ही ॥ ६८ ॥ होता पवनकी अर्धमात्रामें लीन । इतना वह शब्द-सुख संपन्न । जिससे होता है उसका शब्द मौन । अपने आप ॥ ६९ ॥ ऐसी है यह ब्राह्मी-स्थिति । सब गतिकी जो है गति । ऐसी वह अमूर्त मूर्ति । बनता स्वयं ॥ ७० ॥ अपने अनेक जन्मोंमें पूर्वके । जाल झटका दिये थे विक्षेपके । इसलिये क्षणमें ही जनमके । लग्न घटिका भरी ॥ ७१ ॥ किया तद्रूपतासे लग्न । उसने होकर अभिन्न । अभ्र लोपसे है गगन । होता एक रूप ॥ ७२ ॥ जहांसे होता विश्व उत्पन्न । तथा होता है जहां विलीन । प्राप्त करता है विद्यमान । शरीरके ही ॥ ७३ ॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥ जिस लाभकी करके आशा । धैर्य-बहुका किये भरोसा । कूदते हैं करके साहस । कर्मनिष्ठ ॥ ७४ ॥ अथवा जिस वस्तुकेलिये । ज्ञान-कवच पहन लिये । जूझे प्रपंचमें जिसलिये । ज्ञानी जन ॥ ७५ ॥ अथवा फिसड्डी निराधार । तप दुर्गकी टूटी दिवार । भिडे उसको चढ़ने घोर । तपस्वी जन ॥ ७६ ॥ ज्ञानी तापस कर्मिष्ठ इनसे जो विशेष है । माना है श्रेष्ठ योगीको योगी हो पार्थ तू तभी ॥ ४६ ॥ १९७ आत्म-दर्शनयोग
था जो भजकोंका भजनीय । तथा पूजकोंका पूजनीय । और याज्ञिकोंका यजनीय । सदा सर्वत्र ॥ ७७ ॥ वही तत्व जो पूर्ण । हुआ स्वयं निर्वाण । जो साधना कारण । सिद्ध तत्व ॥ ७८ ॥ तभी कर्म निष्ठोंमें वंद्य । तथा ज्ञानियोंमें है वेद्य । है वह तापसमें आद्य । तपोनाथ ॥ ७९ ॥ जीव और परमात्म-संगम । जिसका है ऐसा मनोधर्म । होती है उस तनकी महिमा । अपार यहां ॥ ४८० ॥ तभी मैं इस कारणसे । कहता हूं सदा तुझसे । योगी हो अंतःकरणसे । अर्जुन तू ॥ ८१ ॥ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनांतरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥ अजी योगी जो कहलाता । देवोंका वह देव होता । मेरा सुख सर्वस्व तथा । चैतन्य ही वह ॥ ८२ ॥ जिसके भजनसे भजनीय भजन । तथा यह भक्ति साधन स्वयं संपूर्ण । हुआ वह स्वयं अनुभवसे तू जान । अखंडित ॥ ८३ ॥ फिर हमारे प्रेमका । स्वरूप नहीं वाचाका । अनिर्वचन है उसका । विषय अर्जुन ॥ ८४ ॥ वह है जो प्रेम एकात्म । उसकी है योग्य उपमा । मैं शरीर और वह आत्मा । यही एक ॥ ८५ ॥ ऐसा भक्त चकोर-चंद्र । वह भुवनैक नरेंद्र । बोला सर्वगुण समुद्र । कहता संजय ॥ ८६ ॥ जहां पहलेसे ही पार्थ । जानना चाहता था सार्थ । जान लिया है यदुनाथ । हुआ अधीर ॥ ८७ ॥ श्रेष्ठ है योगियोंमें जो मुझमें प्राण रोपके । भजता मुझ श्रद्धासे मानता श्रेष्ठ मैं उसे ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी १९८
जान कर वह प्रमुदित मन । निरूपणका है यथार्थ ग्रहण । करता है यह जैसे सुदर्पण । कहेगा श्रीरंग ॥ ८८ ॥ ऐसा प्रसंग आगे आयेगा । वहां शांत रस खिला होगा । अब है वहां बोया जायेगा । प्रमेय बीज ॥ ८९ ॥ सत्वकी वर्षासे पिघला ढेला । हुआ चित्तका बाग गुलगुल । सहजतासे हुआ क्षेत्र कोमल । इस समय ॥ ४९० ॥ फिर अवधानकी क्यारी सुंदर । मिली स्वर्णमय इस अवसर । निवृत्त-चित्तने यह जान कर । प्रेरणा दी बुवाईकी ॥ ९१ ॥ चाह कर किया मुझे प्रेमसे । सद्गुरुने सहज लीलासे । बीज बोया आशीर्वादसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ९२ ॥ सो मेरी वाणीसे जो निकलेग । सन्त हृदयमें महुलायेगा । रहने दो अब क्या कहा कहियेगा । श्रीरंगने वहां ॥ ९३ ॥ किंतु वह मनके कानसे सुनना । शब्द है जो बुद्धि-नयनसे देखना । चित्तकी कीमत देकर ही है लेना । मेरे शब्द ॥ ९४ ॥ यह सब ध्यान देकर । ले जाना हृदय-भीतर । सज्जनोंको ये निरंतर । देंगे संतोष ॥ ९५ ॥ स्वहितको स्थिर करेंगे । पूर्णत्वको जगायेंगे । तथा लखौरी चढ़ायेंगे । जीव पर ये ॥ ९६ ॥ अब जो मुकुंद अर्जुनसे । बोलेगा सुंदर विनोदसे । वह सब ओवीके छंदसे । कहूंगा मैं ॥ ४९७ ॥ गीता श्लोक ४७ ज्ञानेश्वरी ओवी ४९७-
७ ज्ञानविज्ञानयोग भगवान उवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥ प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है, इसको सत्य मानना अज्ञान - सुन तू अब पार्थ । कहता है अनंत । हुआ है योग-युक्त । इस समय ॥ १ ॥ जानता तू मुझे पूर्ण रूपसे । हथेली पर रखे रत्नके जैसे । अब तुझे ज्ञान कहूंगा मैं वैसे । विज्ञान सह जो ॥ २ ॥ यहां विज्ञानका है क्या करना । ऐसी यदि तेरी मनो भावना । किंतु उसको पहले जानना । आवश्यक यहां ॥ ३ ॥ क्यों कि ससयमें स्वरूपज्ञानके । मिटता यह नयन पहुंचके । जैसे किनारेसे लगे जहाजके । नहीं है वेग ॥ ४ ॥ श्री भगवानने कहा .चित्ते आसरा मेरा लेके जो योग साधते । कसे समग्र निःशंक जानेंगे मुझसे सुन ॥ १ ॥ ˙ विज्ञान सह जो ज्ञान संपूर्ण कहता तुझे । जानके जो नहीं अन्य जगमें जानना रहा ॥ २ ॥
होती नहीं पहुंच वहां ज्ञानकी । पुच्छ प्रगति होती है विचारकी । भोथरा हो जाती है धार तर्ककी । उस समय ॥ ५ ॥ नाम है जिसका ज्ञान अर्जुन । उससे भिन्न प्रपंच विज्ञान । वहां सत्य बुद्धि ही है अज्ञान । जान तू यह ॥ ६ ॥ अन्त होगा जब अज्ञानका । निवारण होगा विज्ञानका । तब साक्षात् होगा ज्ञानका । अपनेमें पूर्ण ॥ ७ ॥ रहस्य है ऐसा जो गूढ । वह करूंगा शब्दरूढ । जिसका पूर्ण करूंगा कोड । मनका मैं ॥ ८ ॥ जिससे है मिटता प्रवचन । सुननेवालोंका भी व्यसन । मिटता है यह सब अज्ञान । ऊंच नीचका ॥ ९ ॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥ मुझे जाननेवाला कोई एकाद होता है— सहस्रो मनुष्योंमें कहीं एक । चाह करता इस विषयकी नेक । चाहनेवालोंमें भी कहीं एक । पाता है मुझे ॥ १० ॥ जैसे भरा हुआ भुवन । एकेक छंटके अर्जुन । करते संघटित सेना । लक्षाधिक ॥ ११ ॥ उसमें भी कहीं एक । सहते घात अनेक । पाता है विजयश्रीका । सिंहासन ॥ १२ ॥ आस्थाके इस महापूरमें । कूदते हैं जन करोडोंमें । पहुंचता है पैल-तीरमें । कोई एक ॥ १३ ॥ इसीलिये यह नहीं सामान्य । कहनेमें भी यह असामान्य । फिर कहेंगे तुझे वह अन्य । अब सुन विज्ञान ॥ १४ ॥ शत सहस्रमें एक मोक्षार्थ जुटता कभी । जुटते उसमें कोई तत्त्वता जानते मुझे ॥ ३ ॥ (26) २०१ ज्ञान विज्ञानयोग
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥ अब तू सुन हे धनंजय । है महदादिक मेरी माया । जैसे प्रतिबिंबित हो छाया । निजांगोंकी ॥ १५ ॥ यह विज्ञान है— इसे कहते प्रकृति जान । जान यह जो अष्टधा भिन्न । उत्पन्न होता है त्रिभुवन । इससे ही ॥ १६ ॥ यह है कैसी अष्टधा भिन्न । पूछता है यदि यह मन । कहता हूं अब विवेचन । सुन तू यह ॥ १७ ॥ आप तेज तथा गगन । धरणी मारुत औ' मन । बुद्धि अहंकार है भिन्न । ये भाग आठ ॥ १८ ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥ औ' इन आठोंकी जो समावस्था । मेरी परमप्रकृति है पार्थ । उसका नाम है सुन व्यवस्था । जीव ऐसा ॥ १९ ॥ जड़को जो है जिलाता । चेतनको है चेताता । मनसे है मनवाता । शोक मोहादिक ॥ २० ॥ बुद्धिमें जो शक्ति है जानना । उसके सान्निध्यके कारण । अहंकार कौशल्यके कारण । उसने धरा जगत ॥ २१ ॥ पृथ्वी आप तथा तेज वायु आकाश पांचवा । मन बुद्धि अहंकार मेरी प्रकृति है यह ॥ ४ ॥ हुई ये अपरा मेरी दूसरी जान तू परा । जीव रूप बनके जो धरता विश्वको सब ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी २०२
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ सूक्ष्म प्रकृति जब लीलासे । पाती स्थूलके परिणामसे । निकलती है टंकसालसे । भूत सृष्टि ॥ २२ ॥ उद्बीज, जारज, स्वेदज, अंडज । टंकसालसे निकलते सहज । उसके मूल्य है समान महज । आकार भिन्न ॥ २३ ॥ होते हैं चौरासी लक्षके आकार । उसकी सीमा न जानता भांडार । भर जाता है आदिशून्यका घर । इन नाणोंसे ॥ २४ ॥ पंच भौतिक ऐसे बहुतसे । रंग रूप धरते हैं एकसे । उसको लिखती है नियमसे । स्वयं प्रकृति ही ॥ २५ ॥ नाण्य आकृतिका प्रसार करती । फिर उसको घट्या भी करती । कर्माकर्म व्यवहारमें कराती । प्रवर्तन स्वयं ॥ २६ ॥ जाने दो यह रूपक कुशल । कहता हूं तुझको मैं सरल । नाम रूपका विस्तार विशाल । करती है प्रकृति ॥ २७ ॥ तथा प्रकृति मुझमें बिंबित । इसमें नहीं है अन्यथा बात । तभी सृष्टिका आदि मध्य अंत । जानो मुझको ही ॥ २८ ॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥ यह जो रोहिणीका जल । उसका देखनेसे मूल । रवि-रश्मि नहीं केवल । है वह भानु ॥ २९ ॥ इसी भांति सुन किरीटी । परा प्रकृतिसे जो सृष्टि । उस पार जाय तो दृष्टि । वहां हूं मैं ॥ ३० ॥ इन दोसे सभी भूत होते उत्पन्न जान तू । उसीसे विश्व है सारा मैं ही हूं मूल अंत भी ॥ ६ ॥ नहीं है दूसरा तत्व मुझसे पर जो रहे । पिरोया मुझमें सारा धागेमें मणि मान जो ॥ ७ ॥ २०३ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा हू मै सबका आधार । मुझमें सृष्टि स्थिति संहार । जैसा मणियोंमें होता डोर । आधार रूप ॥ ३१ ॥ जैसे सुवर्णके मणि किये । सुवर्ण सूत्रमें वे पिरोये । वैसे सृष्टिका धारण किये । रहा हूं मै ॥ ३२ ॥ रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥ इसीलिये उदकमें रस । अथवा पवनमें जो स्पर्श । तथा शशि सूर्यमें प्रकाश । वह मै ही जान ॥ ३३ ॥ वैसा ही नैसर्गिक शुद्ध । पृथ्वीमें रहता जो गंध । तथा गगनमें मै शब्द । प्रणव वेदमें ॥ ३४ ॥ नरमें जो होता नरत्व । अहंभावका जो है सत्व । वह पौरुष मैं औ' तत्व । कहता तुझे ॥ ३५ ॥ अग्निका भी अर्जुन ऐसा ही है । वह तेजका निरा कवच है । उसके परे जो निज तेज है । वह मै ही जान ॥ ३६ ॥ तथा जो नानाविध योनियोंमें । जनमके प्राणी त्रिभुवनमें । आचरण करते हैं जीवनमें । अपने पार्थ ॥ ३७ ॥ एक पवन ही है पीता । दूसरा तृणार्थ है जीता । कोई अन्नाधार रहता । जलपे एक ॥ ३८ ॥ सब भूतोंका जो है अन्न । प्रकृतिवश है जीवन । उन सबमें जो अभिन्न । मै ही केवल ॥ ३९ ॥ हुवा मैं रस पानीमें प्रकाश चंद्र-सूर्यमें । वेदमें ॐ 'ख' में शब्द नरोंमें पुरुषार्थ मैं ॥ ८ ॥ मैं पुण्य गंध पृथ्वीमें उष्णता अग्निमें बना । .आयुष्य प्राणि-मात्रोंमें तापसोंमें बना तप ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी २०४
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥ विश्वोत्पत्तिके कालमें जो था । गगन अंकुरसे खिलाथा । अंतमें अक्षर निगलाथा । प्रणव पटके ॥ ४० ॥ अब यह विश्वाकार रहता । विश्वके समानही है दीखता । महा-प्रलय दशामें है होता । निराकार ॥ ४१ ॥ ऐसा अनादि जो सहज । वह मैं ही हूं विश्व-बीज । हथेली पर वह आज । देता हूं तुझे ॥ ४२ ॥ इस पर पांडुकुमार । करेगा गंभीर विचार । इसका प्रभाव सुंदर । होगा श्रेष्ठ ॥ ४३ ॥ जाने दो अप्रासंगिक आलाप । अब न बोलूंगा ऐसा संक्षेप । जान तपस्वियोंमें है जो तप । वह रूप है मेरा ॥ ४४ ॥ बलियोंमें है जो बल । रहता है जो अचल । बुद्धिवंतोंमें केवल । बुद्धि है मैं ॥ ४५ ॥ भूतमात्रोंमें है जो काम । जिससे उत्कर्ष हो धर्म । मैं हूं कहता आत्माराम । जान निश्चल ॥ ४६ ॥ अन्यथा जो विकारोंके रूपमें । पडे इंद्रियानुकूल कर्ममें । किंतु धर्म-विरुद्ध पथमें । जाने नहीं देता ॥ ४७ ॥ शास्त्र निषिद्ध कर्मका जब कुपथ । तज चलता विहित कर्मका पथ । तब रहता नित मशालची साथ । धर्म-रूप ॥ ४८ ॥
बीज जो सब भूतोंमें वह हूं मैं सनातन । तेज मैं तेजस्वियोंमें बुद्धि मैं बुद्धिमानमें ॥ १० ॥ वैराग्य-युक्त निष्काम बल मैं बलवानका । धर्मसे अविरोधी मैं भूतोंकी काम-वासना ॥ ११ ॥ २०५ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा काम तेज देता चलता । जिससे होती धर्मकी पूर्णता । संसारमें मुक्ताफल भोगता । मोक्षतीर्थका वह ॥ ४९ ॥ तब श्रुति-गौरवके मांडवेपर । बढ़ाता काम सृष्टि-लताका अंकुर । सुकर्म फल सह पल्लव सुंदर । पहुंचते मोक्षतक ॥ ५० ॥ ऐसा जो काम है धर्म विहित । जिसमें सृष्टिका बीज निहित । वह हूं मैं कहता जगन्नाथ । अर्जुनसे ॥ ५१ ॥ कहना कितना भिन्न भिन्न । वस्तुमात्र मुझसे उत्पन्न । जिससे भरा है त्रिभुवन । जान तू पार्थ ॥ ५२ ॥ ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥ जो हैं ये सात्विक भाव । या रज-तमादि सर्व । वे मम रूप संभव । जान तू यहां ॥ ५३ ॥ हुए ये यदि मुझसे ही । इसमें मैं रहता नहीं । स्वप्न कुंडमें डूबे नहीं । जागृति जैसी ॥ ५४ ॥ नहीं तो बीज होता ठोस । जैसे जमा हुआ ही रस । फूटके कौपल सरस । बनता काष्ठ ॥ ५५ ॥ फिर कहो उस काष्ठमें सभी । बीजपन रहता है क्या कभी । वैसा दीखता विकार कर भी । नहीं मैं विकारमें ॥ ५६ ॥ अथवा गगनमें घिरते बादल । उनमें न रहता गगन केवल । अथवा बादलमें होता है सलिल । जलमें नहीं अभ्र ॥ ५७ ॥ फिर उस जलके आवेशसे । दीखता लखलख तेज जैसे । किंतु उस तेजमें जल वैसे । रहता है क्या ॥ ५८ ॥ जैसे अग्निसे है धूम होता । धूममें क्या अग्नि है रहता । वैसे विकरके भी नहीं होता । विकृत मैं कभी ॥ ५९ ॥ मुझसे हैं बने भाव सत्व राजस तामस । इनमें न रहता मैं रहते मुझमें यही ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी २०६
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥ मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ढक दिया है— जलसे हुई जलकुंभी जैसे । छिपा देती है सलिलको वैसे । झूठे ही घटोंके आवरणसे । छिपता आकाश ॥ ६० ॥ अजी ! स्वप्न यह मिथ्या सब । आप हुआ निद्रावश तब । आती उसकी प्रतीति जब । समरसता है क्या ॥ ६१ ॥ अजी ! पानी ही जो आंखका । रूप लेता जब झिल्लीका । देखना ही वह आंखका । मिटा देता ॥ ६२ ॥ ऐसी ही यह मेरी माया । बनी त्रिगुणात्मक छाया । उसने मुझे है छिपाया । आवरण बन ॥ ६३ ॥ प्राणिमात्र तभी मुझे नहीं जानते । मेरे होकर भी मद्रूप नहीं होते । जल होकर जलमें न गलते । मोति जैसे ॥ ६४ ॥ माटीसे बनाया हुआ जो मटका । तुरंत मिलानेसे होता मृत्तिका । किंतु आगमें जला हुआ मटका । रहता खपरा बन ॥ ६५ ॥ वैसे भूतमात्र सर्व । हैं मेरे ही अवयव । किंतु अविद्यासे .जीव । बने हैं जो ॥ ६६ ॥ तभी ये मेरे होकर भी मैं नहीं । मेरे होकर भी मुझे जानते नहीं । अहं ममताकी भ्रांतिमें ही यही । हुए विषयांध ॥ ६७ ॥ दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥ अहं ममताकी भ्रांतिके कारण जन्ममरण-चक्र—मायानदी—
इन्हीं त्रिगुण भावोंने किया है विश्व मोहित । जिससे मैं नहीं ज्ञात गुणातीत सनातन ॥ १३ ॥ दैवी गुणमयी माया मेरी है अति दुस्तर । मेरी शरण जो आते इसको तरते वही ॥ १४ ॥ २०७ ज्ञान-विज्ञानयोग
महदादि है यह मेरी माया । उसे पार करके धनंजय । होना है मद्रूपमें जो विलय । किस भांतिसे ॥ ६८ ॥ टूटे कगारसे जो ब्रह्माचलके । उमंगसे मूल संकल्प जलके । उठे हैं बुल्ले पंचमहाभूतोंके । छोटेसे वहां ॥ ६९ ॥ सृष्टि विस्तारके जो ओघसे । काल-ग्रास शक्तिके वेगसे । प्रवृत्ति निवृत्तिके कूलसे । बहती उमड़कर ॥ ७० ॥ जो गुण-घनकी महा-वृष्टिसे । भरी है मोहके महा-पूरसे । काटकर ले जाती है वेगसे । यम नियम नगर ॥ ७१ ॥ भरी है जो द्वेषावर्त्तोसे । मत्सरादि बडे मोड़ोंसे । तथा भयानक मीनोंसे । प्रलोभनके ॥ ७२ ॥ चक्कर हैं उसमें प्रपंचके । महापूर आते कर्माकर्मके । ऊपर तरते सुख दुःखके । झाग-पुंज ॥ ७३ ॥ वहां द्वीप पर हैं रतीके । टकराते तरंग कामके । दीखते हैं जीव समूहके । झाग पुंज ॥ ७४ ॥ अंतः प्रवाह अहंकारके । उबाल आते मदत्रयके । उठे तरंग विषयोर्मिके । पुनः पुनः ॥ ७५ ॥ जहां रेलेसे उदयास्तके । गढे पड़ते जन्म मृत्युके । बुल्ले उसमें पंच भूतके । उठते औ' फूटते ॥ ७६ ॥ संमोह विभ्रम हैं मीन जिसके । निगलते कौर सात्विक धैर्यके । वक्र गतिसे चलते अज्ञानके । भंवर भी जहां ॥ ७७ ॥ जहां भ्रांतिके गंदले जलमें । फंसता जीव आशाके पंकमें । रजोगुणकी खलबलीमें । गूंजता स्वर्ग ॥ ७८ ॥ वहां है तमकी तीव्रधार । सत्वकी है स्थिर औ' गंभीर । यह तैरनेमें भयंकर । माया-नदी ॥ ७९ ॥ पुनर्जन्मके उत्तंग तरंग । छूते सत्य-लोकके गिरिश्रृंग । ढलती जिससे शिला भी संग । ब्रह्मलोककी ॥ ८० ॥ महानदीका यह पूर । वह जाता जो भयंकर । करे कौन इसको पार । धनंजय ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी २०८