ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस निश्चलताके सम्मुख दुःख नहीं रहता -- फिर मेरुसे भी बहुत । यातनाके बडे पर्वत । पडनेपर भी चित्त । टूटता नहीं ॥ ६९ ॥ या शस्त्रसे तोड़ा तन । अग्निमें जला बदन । चित्त है सुखमें लीन । अविचल ॥ ३७० ॥ अपनेमें होकर रत । भूल जाता देहको चित्त । सुखरूप होके सतत । रहता अपनेमें ॥ ७१ ॥ तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ उस सुखमें होकर लीन । भूलता विषय-सुख मन । संसार सुखमें अनुदिन । उलझाया जो ॥ ७२ ॥ वह है योगिका सौभाग्य । स्वसंतोषका है साम्राज्य । ज्ञान भानका है उद्देश्य । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥ योगाभ्याससे वह सतत । देखना पडता मूर्तिमंत । देखनेसे बनता स्वगत । एकरूप ॥ ७४ ॥ संकल्प प्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥ जो वास्तविक हितका है वह इंद्रियोंको दुःखदायक लगता है— किंतु यह योग अर्जुन । एक ढंगसे आसान । संकल्पको दिखाता महान । पुत्रशोक ॥ ७५ ॥ उसको कहते योग दुःखका जो वियोग है । दृढ निश्चयसे पाना वह योग उमंगसे ॥ २३ ॥ संकल्पजन्य जो काम तजके पूर्ण रूपसे । मनसे ही इंद्रियोंको विषयोंसे निकालना ॥ २४ ॥ १८५ (24) आत्म-संयमयोग