ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा जो कुछ भी है हितका । रहा है इंद्रियोंके दुखका । ऐसे नहीं योगके सरीखा । सरल कछु ॥ ६३ ॥ यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवाऽऽत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥ सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥ तभी आसनकी दृढ़तासे । कहा सभी अभ्यास तुझसे । हुआ तो हो निरोध इससे । इंद्रियोंका ॥ ६४ ॥ अन्यथा जब इस योगसे । इंद्रियोंका निग्रह होनेसे । निकलता चित्त अपनेसे । मिलन हेतु ॥ ६५ ॥ जब वह विषयोंसे निवृत्त होता । अपनेमें अपनेको ही है देखता । पहचान करके तब है कहता । सोऽहम् ब्रह्म ॥ ६६ ॥ इसी पहचानमें । सुखके साम्राज्यमें । चित्त समरसमें । विलीन होता ॥ ६७ ॥ इससे भिन्न कुछ भी नहीं । इसे इंद्रियां जानती नहीं । वह अपनेमें आप वही । बन जाता मन ॥ ६८ ॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥ अवरुद्ध चित्तका है संचार मिटता सब । आत्मासे मिलके आत्मा तोषता निजमें स्वयं ॥ २० ॥ भोगके इंद्रियातीत बुद्धि-गम्य महा-सुख । डिगे नहीं जहां जाके तत्वज्ञ लेश-मात्र भी ॥ २१ ॥ न माने अन्य जो लाभ श्रेष्ठ है इस लाभसे । दुःखके भारसे भारी न कांपे रहके वहां ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी १८४