भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तब वह तृप्तिके तोषसे । गरल उगलती मुखसे । उस गरलके अमृतसे । जीता प्राण ॥ ४१ ॥ उस अग्निसे निकलता अमृत । करता वह अंतर बाह्य शांत । खिलते तब सब गात्र गलित । अर्जुन उसके ॥ ४२ ॥ रुकते हैं नाड़िके स्रोत । नव`विध वायुका द्वैत । मिटता और होता मुक्त । शरीर-धर्मसे ॥ ४३ ॥

  • इडा पिंगला एक होती । तीनो गांठे जो छूट जाती । छह्री झल्लियां टूट जाती । षट्चक्रोंकी ॥ ४४ ॥ अजी ! फिर शशि और भानु । ऐसी कल्पनाका अनुमान । कपास रखके भी पवन । दीखता नहीं ॥ ४५ ॥ बुद्धिका आकार तब गलता । परिमल जो घ्राणमें रहता । शक्ति संह वह है संचरता । मध्यमामें ॥ ४६ ॥ ढलता उपरकी ओर । चंद्रामृतका सरोवर। जाता जो बहकर फिर । शक्ति मुखमें ॥ ४७ ॥ उस शक्तिसे रस भरता । सर्वांगमें वह संचरता । जहांका वहां सगबगाता । प्राण पवन ॥ ४८ ॥ तपे हुए ढांचेमेंसे । मूम निकलता जैसे । भरती रससे वैसे । ढले हुए ॥ ४९ ॥ तब शरीरके आकारसे । विद्युल्लता उतरी है जैसे । ऊपर त्वचा आच्छादनसे । ढकी है जो ॥ २५० ॥ रविपर पड़ता मेघावरण । छिपते हैं तब प्रकाश किरण । फटता है फिर वह आवरण । न रुकता प्रकाश ॥ ५१ ॥ वैसा ही शुष्क है ऊपर । त्वचावरण तन पर । झडे जैसा वह चोकर । तन परसे ॥ ५२ ॥ चमकता वह फिर जैसे बिल्लोर । या रत्न बीजमें उग आया अंकुर वैसे अवयव कांति शोभा अपार । होती प्रस्फुटित ॥ ५३ ॥ अथवा संध्या-रागके रंग । लेकरके बनाया है अंग । अथवा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग । आत्माका जो ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी १७४