ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंBased on the provided image, here is the complete Devanagari transcription:
तात मात जब छोड गये हमें । छोटे थे हम पांडुरंग । निवृत्ति ज्ञानेश्वर भिक्षाअनमें जाते । संभाले सोपान मेरे पास ॥ इस समय ज्ञानेश्वर महाराजके अग्रज और श्रीगुरु निवृत्तिनाथ बारह वर्षके थे । ज्ञानेश्वर महाराज दस वर्षके, सोपानदेव आठ वर्षके और छ वर्षकी मुक्ताई । आजमी सारा महाराष्ट्र जिनके स्मरणमात्रसे रोमांचित होता है, अनेक प्रकारके कष्ट सहन करके जिनके समाधि-स्थानके दर्शन करने जाता है, जिनके समाधि दिन पर और समाधि स्थानपर लाखों लोगोंका मेला लगता है उनके जन्मसे उनके माता-पिताको समाजमें अनंत यातनाएं और अपमान सहना पडा था। इतना ही नहीं इनके माता-पिता तथा इन अबोध बालकोंका मुंह देखना असगुन माना जाता था, पाप माना जाता था ! ! क्यों किः— ज्ञानेश्वर महाराजके पिता विट्ठलपंत स्वभावसे ही विरक्त थे । अपना विद्याअध्ययन होते ही वे तीर्थ-यात्राके लिये निकल पडे थे। पुरानी पोथियोंमें उनकी यात्राओंका वर्णन देखनेको मिलता है । उन्होंने करीब करीब भारतके सभी पुण्यक्षेत्रोंका दर्शन किया था। सभी पुण्य-तीर्थोंका स्नान किया था । जब विट्ठलपंत भीमाशंकर आये, भीमा नदीका उगम-स्थान देखा, तब पंढरपुरके स्मरणसे पंढरपुरके लिये चल पडे। भीमाशंकरसे पंढरपुर जाते समय रास्तेमें एक छोटासा गांव पडता है आलंदी । आलंदी इंद्रायणी नदीके किनारे पर बसा हुआ एक छोटासा गांव है । किंतु अत्यंत प्राचीन । इस गांवको पहले अलकापुर कहा जाता था । यहां एक शिवालय है । इसको सिद्धेश्वर कहते हैं। यह अत्यंत प्राचीन शिवपीठमें एक है । विठ्ठलपंत आलंदी आये । इंद्रायणीमें स्नान किया । मंदिरके सामने एक पीपलके वृक्षकी छायामें बैठकर अपना नित्य-कर्म करने लगे । मंदिरके सामनेवाले अश्वत्थकी छायामें बैठकर, स्वच्छ मंत्रोच्चारसे धर्म-कार्यमें मग्न तेजस्वी युवकको देखकर सिध्देश्वर मंदिरके पुजारी, उसी गांव और पंचक्रोशीके ग्रामाधिकारी, सिध्देश्वर पंत प्रसन्न हुए । उन्होंने आग्रहसे विठ्ठलपंतको भोजन पर बुलाया । खाते खाते रहने करनेकी जानकारी ले ली । प्रवासका उद्देश जान लिया और मन ही मन मेरी कन्या रुक्मिणीके लिये योग्य वर होनेका निश्चय कर लिया । २ स्वप्न और विवाह — उसी दिन विठ्ठलपंत तथा सिद्धेश्वरपंतको एक-सा स्वप्न हुआ और स्वप्नमें पंढरपुरके विट्ठलने रुक्मिणी और विठ्ठलपंतके विवाहका आदेश दिया । प्रातःकाल उठते ही सरल स्वभावके दोनों ब्राह्मणोंने अपने अपने स्वप्नकी बात एक दूसरेसे कही और विट्ठलपंतने कहा “मैं रामेश्वरकी यात्राका संकल्प करके रामेश्वर जा रहा हूँ, दूसरी बात, बिना मातापिताकी आज्ञाके विवाह नहीं कर सकता !” तब सिद्धेश्वरपंतने कहा आप आजकी रात यही रहिए । आजकी रातको जो आज्ञा होगी वैसे कीजिये । विठ्ठलपंत यह बात मानकर उस दिन वहां रहे और उस रातको पुनः स्वप्नमें आदेश मिला “ तू भक्ति, ज्ञान, वैराग्यका घर बना हुआ है । ये इसके उदरमें जन्म लेना चाहते हैं । इसलिये तुझे मेरी आज्ञा है तू यह विवाह कर ” दूसरे दिन विट्ठलपंतने अपना स्वप्न सिद्धेश्वरपंतसे कहा ! ज्योतिषीको बुलाकर पत्रिका दिखायी गयी । छत्तीस गुण मिलते थे । बस उसी ज्येष्ठ महीनेमें रुक्मिणीसे विठ्ठलपंतका विवाह हुआ और थोडेही दिनोंमें पंढरपुर जानेवाले वैष्णवोंके झुंड देखते ही विट्ठलपंत पंढरपुर जानेके लिये उतावले हो गये । उन्होने सिद्धेश्वरपंतसे आज्ञा मांगी और सिद्धेश्वर पंतभी अपनी पत्नी और पुत्रीके साथ विट्ठलपंतको लेकर पंढरपुरके लिये रवाना हुये । पंढरपुरमें विट्ठल दर्शन करके विट्ठलपंत अपने संकल्पनुसार अकेले ही रामेश्वर गये । ज्ञानेश्वर ३